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मध्यवर्ग और खरबूजा

Sun, 01 Mar 2015 07:15 PM IST
सुधाकर आशावादी
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मैं जब-जब खरबूजे की गति देखता हूं, मेरी आंखों में मध्यवर्ग का रुआंसा चेहरा उभर आता है। वह अपने काम से काम रखता है, जिसे खुद के लिए भी फुर्सत नहीं होती। न जाने, कहां-कहां की चिंता उसे घेरे रहती है। वह अपने लिए नहीं जीता, बल्कि लोगों को यह जताने के लिए जीता है कि वह जी रहा है। पिछले कुछ महीनों से वह अच्छे दिनों की कल्पना कर रहा था। उसकी नजर देश के नीति नियंताओं पर टिकी थी कि वे उनके अच्छे दिनों के सूत्रधार बनेंगे। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ। उससे कह दिया गया कि वह अपनी व्यवस्था खुद कर सकता है।
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वह समझ गया कि फिर उसे उसकी व्यस्तताओं का दुष्परिणाम भोगने को विवश किया जा रहा है। उसने सरकार से बहुत अधिक उम्मीदें पाल ली थी। जबकि यह समझने की जरूरत थी कि अब सरकार को उसकी जरूरत नहीं थी, क्योंकि लोकसभा चुनाव में अभी बहुत समय है। उस समय फिर उसका वोट लेने के लिए कुछ किया जाएगा। लेकिन सबके प्रति उदासीनता तो नहीं बरती जा सकती। अपने यहां गरीब आदमी का भला सोचा जाता है, क्योंकि उसकी आकांक्षाएं ज्यादा बड़ी नहीं होतीं। यहां उस अभिजात वर्ग का भला सोचा जाता है, जिसकी कृपा के बिना चुनावी व्यवस्था संभव नहीं है। किसी से कुछ लिया है, तो वह सूद समेत लौटाया जाएगा या नहीं? बता, तूने क्या दिया अपनी तनख्वाह में से? तनिक-सा टैक्स क्या दे दिया, तो अपने को महान समझने लगा। पगले, वह तो तेरा फर्ज था। देश के लिए तेरे उस योगदान को भुलाया नहीं जा सकता, किंतु हर समय उसे याद भी नहीं रखा जा सकता।

अब तू चाहे, तो कबीर का दोहा याद कर, कि चलती चाकी देखकर दिया कबीरा रोय, दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय। वैसे भी खरबूजे की गति और दो पाटन के बीच फंसने वाले की गति में खास अंतर नहीं होता। एक को छुरी से हलाल किया जाता है, और दूसरे का कुचल-कुचल कर कचूमर निकाला जाता है। तेरे लिए एक तरफ कुआं है, दूसरी तरफ खाई। आम आदमी बने रहने पर तू इसी नियति को प्राप्त होगा।
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