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मोहब्बत और अमन का पैगाम

मरिआना बाबर Updated Fri, 23 Nov 2018 06:51 PM IST
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जावेद अख्तर

इस हफ्ते भारत की दो अत्यंत लोकप्रिय शख्सियतों ने लाहौर में एक कार्यक्रम में शिरकत की। ये हैं, बॉलीवुड के गीतकार और पटकथा लेखक जावेद अख्तर और उनकी आकर्षक अभिनेत्री पत्नी शबाना आजमी, जिन्हें देखने-सुनने के लिए पाकिस्तान के विभिन्न शहरों से काफी लोग लाहौर पहुंचे थे। मौका था, पाकिस्तान के मशहूर कवि फैज अहमद फैज की याद में होने वाले चौथे फैज इंटरनेशनल मेले का। हर किसी को पता है कि खासतौर से इन दिनों दोनों देशों के वीजा की व्यवस्था बहुत कड़ाई से पेश आ रही है और इसे सुरक्षा प्रतिष्ठान नियंत्रित करते हैं। इसलिए ऐसे समय, जब दोनों देशों के रिश्ते न्यूनतम स्तर पर हैं और दोनों पक्षों से बहुत कम लोगों के लिए वीजा मंजूर किए जा रहे हैं, इस आयोजन में जावेद अख्तर और शबाना आजमी को देखकर लोगों को सुखद आश्चर्य हुआ।



फैज मेले का आयोजन फैज अहमद फैज के परिवार ने किया था, जिसमें उनकी बेटी मोनिजा हाशमी भी शामिल थीं, जो कि खुद इसी वर्ष में मई में 15वें 'एशिया मीडिया समिट' को संबोधित करने के लिए दिल्ली गई थीं। लेकिन उन्हें उस समिट में हिस्सा लेने की मंजूरी नहीं दी गई और उन्हें तुरंत वहां से वापस भेज दिया गया था। हालांकि महान कवि की इस बेटी ने इसकी कोई शिकायत नहीं की। दोनों देशों के मीडिया ने इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया था, लेकिन मोनिजा हाशमी ने एक मित्र को लिखा, 'आपका और आपके मित्रों का समर्थन देने के लिए शुक्रिया। मैं इस मुद्दे को आपके विवेक पर छोड़ रही हूं। हम फैज के परिजन और फैज फाउंडेशन लगातार दोनों देशों के बीच अमन के लिए काम करते रहेंगे। जैसा कि फैज ने कहा था, लंबी है गम की शाम मगर शाम ही तो है।' 


जावेद अख्तर ने फैज अहमद फैज के अवदान के बारे में कहा और उन्होंने उनकी कुछ नज्में भी पढ़ीं। पाकिस्तानी कवि और नाटककार अमजग इस्लाम अमजद और लेखिका यास्मीन हामिद ने कविता और साहित्य की दूसरी विधाओं और इस दौर की चुनौतियों के बारे में गंभीर विमर्श किया। उनकी चिंता यह थी कि आज के युवा अपनी जुबान और संस्कृति को अपनाना छोड़कर पश्चिम के पीछे भाग रहे हैं। उन्होंने कहा, न सिर्फ संगीत और कला, बल्कि आज की पीढ़ी अपने हर संवाद के लिए अंग्रेजी का तेजी से और अधिकाधिक इस्तेमाल कर रही है। जावेद अख्तर ने कहा, रुझानों और लोगों का मिजाज बदलने में कविता महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इसलिए आज के कवियों, शायरों और गीतकारों की यह जिम्मेदारी है कि वे समाज की कठोर सच्चाइयों को सामने लाएं। कविता में लोगों का विश्वास बदलने की क्षमता होती है, इसलिए कवियों को अपनी जिम्मेदारी को गंभीरता से लेना चाहिए। वह यहीं नहीं रुके। उन्होंने आगे फरमाया, 'अमन और प्यार से महत्वपूर्ण कोई और चीज नहीं है। शबाना और मैं प्यार का संदेश लेकर पाकिस्तान आए हैं और सभी कलाकारों को लोगों के बीच प्यार का प्रसार करना चाहिए।' 


पाकिस्तान की युवा पीढ़ी ने शबाना आजमी से उनके मशहूर शायर पिता कैफी आजमी के बारे में बहुत दिलचस्पी से सुना। शबाना ने यहां 'कैफ और फैज' नामक एक सत्र को संबोधित करते हुए कहा, मेरे वालिद और फैज अहमद फैज, दोनों ही प्रोग्रेसिव थे और क्रांतिकारी कवि थे और अपनी नज्मों में जमीनी हकीकत को बयान करते थे।

 

खाली कुर्सियां


इस मेले की खासियत यह है कि इसमें विभिन्न विचारों के लोगों को आमंत्रित किया जाता है। लेकिन हैरत है कि इस बार चार ऐसे आमंत्रित विद्वान वक्ताओं को बोलने की इजातत नहीं दी गई, जिन्हें सत्ता प्रतिष्ठान से असहमत माना जाता है। ये हैं, डॉ तैमूर रहमान, डॉ अमर अली जान, पूर्व संपादक रशीद रहमान और नेशनल एसेंबली के सदस्य अली वजीर। मंच पर उनके लिए खाली कुर्सियां रखी गईं, ताकि लोगों को पता लग सके कि सुरक्षा प्रतिष्ठान किस हद तक आगे बढ़ गया है कि अब वह यह भी तय करने लगा है कि किसी कॉन्फ्रेंस में कौन बोल सकता है और कौन नहीं बोल सकता। रशद रहमान ने अपने कॉलम में इसकी जानकारी देते हुए लिखा 'पाकिस्तान में ये काले दिन हैं। मीडिया और अभिव्यक्ति की आजादी पर जिस तरह से प्रतिबंध लाद दिए गए हैं और उनकी सीमाएं तय की जा रही हैं, उससे यही निष्कर्ष निकलता है कि अब हम एक नियंत्रित लोकतंत्र के अधीन रह रहे हैं, जहां सत्ता का गिरोह (सैन्य प्रतिष्ठान) राष्ट्रीय कथानक में अपना प्रभुत्व कायम करने के लिए हर चीज पर नियंत्रण चाहता है।'


पाकिस्तानियों को हैरत हुई कि फैज अहमद फैज की याद में होने वाले कार्यक्रम में विरोधी नजरिया रखने वाले लोगों को सुरक्षा प्रतिष्ठान ने बोलने और अपने परचे पढ़ने से रोक दिया। लेखक और कवि प्रोफेसर रवीश नदीम कहते हैं, फैज अहम फैज को उत्पाद बना दिया गया है, और वह अपनी कविताओं और अपने संघर्ष से, जिनसे जिंदगी भर लड़ते रहे, उन्हें बेचा जा रहा है।


एक प्रतिबद्ध मार्क्सवादी के रूप में फैज ने तानाशाही के मोहपाश से मुक्ति के लिए आवाज उठाई। इस क्रांतिकारी कवि को जानबूझकर एक रोमांटिक और सूफी कवि के रूप में कमतर कर दिया गया। विरोध की उनकी नज्मों को हमारी स्मृति से भी मिटा देनी कोशिशें हो रही हैं। इससे पहले फैज अहमद मेले में राजनीतिक कार्यकर्ता, कामगार, किसान और छात्र भी हिस्सा लेते थे, लेकिन अब यह कुलीन लोगों का इंटरनेशनल फेस्टिवल बन गया है। अनेक लोग यह महसूस करते हैं कि फैज हमारे सांस्कृतिक औक साहित्यिक जीवन में अमिट छाप छोड़ गए हैं। कामगार वर्ग के लिए उनका संघर्ष पीढ़ियों को प्रेरणा देता रहेगा। जब तक उर्दू जुबान रहेगी, फैज को हमेशा याद किया जाएगा। फैज ने ऐसी नज्में लिखीं, जो हमारी आज की चिंताओं से सीधे जुड़ती हैं। 

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