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केवल झंडा फहराना ही काफी नहीं: एक बार मिली आजादी हमेशा के लिए सुरक्षित नहीं हो जाती...उसे बचाकर रखना पड़ता है

सार

आजादी एक बार मिल जाने के बाद हमेशा के लिए सुरक्षित नहीं हो जाती...उसे बचाकर रखना पड़ता है।
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स्वतंत्रता दिवस - फोटो : अमर उजाला प्रिंट / एआई-एजेंसी
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विस्तार
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सुभद्रा कुमारी चौहान की खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी कविता में हमारे भीतर आजादी की तड़प को बेहद सुंदरता से व्यक्त किया गया है। इस तड़प के साथ हमें जो आजादी मिली, उसमें लाखों-करोड़ों लोगों का योगदान है। हमारा भारत एक विशाल देश है, यहां बहुत-सी भाषाएं हैं। आजादी के उत्सव के प्रति देश के हर प्रांत में हमें उत्साह देखने को मिलता है। इस आजादी के लिए न जाने कितने लोगों ने बलिदान दिया, इसलिए हम उनके बलिदान को नमन करते हुए अपना राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा फहरा कर स्वाधीनता का उत्सव मनाते हैं।

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हिंदी के एक बड़े कवि रघुवीर सहाय बार-बार कहते थे कि आजादी एक बार मिल जाने के बाद हमेशा के लिए सुरक्षित नहीं हो जाती, उसे बचाकर रखना पड़ता है। उसके लिए बार-बार लड़ना पड़ता है। हर प्रकार की आजादी के लिए संघर्ष करना पड़ता है। स्त्री शिक्षा को ही देख लीजिए। एक लंबी लड़ाई के बाद ही आज स्त्री शिक्षा यहां तक पहुंच पाई है। इसलिए 15 अगस्त और 26 जनवरी मेरे लिए उन सभी संघर्षों को याद करने के दिन हैं।

व्यक्ति के स्वाभिमान के लिए, बोलने की आजादी के लिए, लिखने-पढ़ने की आजादी के लिए अनेक संघर्ष हुए हैं। मैं आज इन बातों को इसलिए याद कर रहा हूं, क्योंकि यदि आज नहीं याद करेंगे, तो फिर कब करेंगे? आजादी के बाद इस देश में बहुत कुछ हुआ है, लेकिन अब भी बहुत कुछ होना बाकी है। यही वह दिन है, जो भौगोलिक रूप से विशाल भारत को भावनात्मक रूप से भी जोड़ता है। पूरे देश में लोग अलग-अलग भाषाओं में भाषण देते हैं, तिरंगे के नीचे खड़े होते हैं, अलग-अलग वेशभूषा पहनते हैं।
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यह विविधता हमारी सबसे बड़ी शक्ति है और उसका सम्मान करना भी आजादी के सेनानियों का सम्मान है। रवींद्रनाथ ठाकुर की गीतांजलि के एक गीत का मैंने बांग्ला से हिंदी में अनुवाद किया है-हो चित्त जहां भयशून्य, मस्तक हो उन्नत, हो ज्ञान जहां पर मुक्त, खुला यह जग हो-घर की दीवारें बनें न कोई कारा....अंत में एक पंक्ति आती है- हे पिता! मुक्त व स्वर्ग रचाओ हममें, बस उसी स्वर्ग में जागे देश हमारा। आज का भारत इन सब बातों को याद करते हुए विवेक, अच्छे भावों और सबके प्रति प्रेम के साथ आगे बढ़े, यही हमारा संकल्प होना चाहिए।

आज के दिन मुझे रामचंद्र शुक्ल की एक बात विशेष रूप से याद आती है। उन्होंने लिखा था कि राष्ट्र केवल मनुष्यों से नहीं बनता। वह नदियों से बनता है, पर्वतों से बनता है, वनस्पतियों से बनता है, फूलों और पौधों से बनता है। कितनी सुंदर बात है! वाकई राष्ट्र केवल मनुष्यों का नहीं होता। आज पर्यावरणविदों और अनेक लोगों के संघर्ष को भी हमें याद करना चाहिए, जो जंगलों, नदियों को बचाने के लिए आंदोलन कर रहे हैं। आजादी पाने के लिए हमने जो संकल्प किए थे, वे कितने पूरे हुए हैं, आज हम इसका भी मूल्यांकन करें।

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