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सिर्फ आक्रोश से रास्ता नहीं बनता: ‘जेन जी’ के सामने असली चुनौती अंतर्विरोध मुक्त वास्तविक नैतिक बल सिद्ध करना

सार

असली चुनौती केवल सड़क की ताकत से कुछ बातें मनवाना नहीं, अंतर्विरोधों से मुक्त वास्तविक नैतिक बल को सिद्ध करना है।  
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जंतर मंतर का जेन-जी आंदोलन चर्चा में बरकरार (सांकेतिक) - फोटो : अमर उजाला प्रिंट- ग्राफिक्स
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विस्तार
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दिल्ली के जंतर-मंतर पर हुए कॉकरोच जनता पार्टी आंदोलन का सबसे बड़ा हासिल क्या रहा? शिक्षा मंत्री का इस्तीफा, एक नए दबाव समूह का जन्म या छात्र आंदोलन के बहाने विपक्षी दलों में दिखाई दी एकजुटता? या पेपर लीक रोकने के लिए व्यवस्था में सुधार के लिए बना दबाव?  

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असल में बड़ी बात यह हुई कि नई सहस्राब्दी में युवा अचानक भारतीय राजनीति के केंद्र में आ गए। बीते 25 वर्षों में देखें, तो अन्ना आंदोलन, निर्भया आंदोलन, सीएए विरोधी प्रदर्शनों और किसान आंदोलन में भी युवा थे, लेकिन ताजा घटनाओं के बाद सिर्फ युवा केंद्रित माहौल बन गया है। आंदोलन खत्म होते ही संघ प्रमुख मोहन भागवत ने जहां मुंबई में करीब दो हजार ‘जेन जी’ से बात की, तो वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस के भाषण में ‘युवा’ और ‘नौजवान’ शब्द दर्जनों बार आए। राहुल गांधी ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम कर रहे है। पार्टियों ने बाकायदा एक विशेष संपर्क टीम भी बना दी है। उत्तर प्रदेश में युवा आयोग बनाने के अलावा युवाओं को 25 लाख मुफ्त टैबलेट देने की घोषणा हुई है। महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना ने अपने अभियान को ‘मिशन जेन जी’ नाम ही दे दिया है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव कह रहे हैं कि उनकी पार्टी सत्ता में आई, तो बंद किए गए 26 हजार स्कूल दोबारा खोल देगी। यह होड़ दरअसल 2029 की तैयारी है।

 रॉयटर्स  के मुताबिक, 2029 तक भारत में करीब 40 करोड़ ‘जेन जी’  मतदाता हो सकते हैं। 2024 में ही देश में करीब 98 करोड़ पंजीकृत मतदाताओं में 18 से 29 वर्ष वालों की हिस्सेदारी 22.78 फीसदी थी। 2019 में 18 से 25 वर्ष के 41 फीसदी मतदाताओं ने भाजपा को वोट दिया था, जबकि पार्टी का राष्ट्रीय वोट शेयर करीब 37 फीसदी था। 2024 में भी भाजपा को इस आयु वर्ग के 39 फीसदी वोट मिले, जबकि उसका कुल वोट शेयर 36.6 फीसदी रहा। ऐसे में, जेन जी को लेकर सत्ता की बेचैनी और विपक्ष का उत्साह समझा जा सकता है।
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युवाओं का आक्रोश सिर्फ जंतर-मंतर पर पैदा नहीं हुआ था। परीक्षा में धांधली, बेरोजगारी, भर्ती में देरी, महंगी शिक्षा और भविष्य की अनिश्चितता ने युवाओं में लंबे समय से बेचैनी बढ़ाई है। अब सिर्फ उस आक्रोश को तेवर देने की कोशिश हो रही है। पर, सवाल यह है कि युवाओं की आवाज को सही दिशा कौन देगा? यह सवाल इसलिए है, क्योंकि देश ने 1974 में भी एक बड़ा छात्र आंदोलन देखा था। महंगाई, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू हुए छात्र आंदोलन की कमान जयप्रकाश नारायण (जेपी) ने संभाली थी। जेपी के पीछे दशकों का राजनीतिक अनुभव, त्याग और सबसे बढ़कर नैतिक बल था। वही छात्र आंदोलन आगे चलकर ‘संपूर्ण क्रांति’ बना, जिसने देश की राजनीति में बड़े बदलाव की नींव रखी। आज क्या कोई जेपी है? इसके अलावा, जंतर-मंतर के बाद छात्र आक्रोश का पहला अंतर्विरोध झारखंड में ही दिखाई दे गया। दिल्ली के आंदोलन में प्रमुखता से दिखाई दिए चेहरे वहां नजर नहीं आए। तो क्या जंतर-मंतर पर छात्रों की युवा चेतना भ्रामक थी?

2026 में सोशल साइंसेज एंड ह्यूमैनिटीज ओपन जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, सोशल मीडिया की ‘एल्गोरिदमिक सिफारिशें’ और समान विचार वाले लोगों के नेटवर्क ‘इको चैंबर’ को मजबूत करते हैं और इनका राजनीतिक ध्रुवीकरण से संबंध है। इसी साल नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक अलग प्रयोग के नतीजों में एल्गोरिदमिक फीड कुछ राजनीतिक मुद्दों पर लोगों की राय को प्रभावित करता पाया गया। यानी हम सोशल मीडिया पर सिर्फ सामग्री नहीं चुनते, कई बार सामग्री भी धीरे-धीरे हमें चुन रही होती है।

सोशल मीडिया पर एकजुट हुए छात्रों के आक्रोश के जरिये सत्ता को चुनौती देने के कई उदाहरण हैं, पर आंदोलन के बाद कैसी राजनीति पैदा होगी, इसकी कोई गारंटी नहीं है। बांग्लादेश में छात्र आंदोलन ने शेख हसीना की सत्ता को उखाड़ फेंका, पर अब वहां क्या हो रहा है, यह छिपा नहीं है। नेपाल में जेन जी के भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ने सत्ता पलटी, लेकिन अब नई सरकार अपने अंतर्विरोधों में उलझ गई है। ‘अरब स्प्रिंग’ ने दिखाया था कि सोशल मीडिया युवाओं को सत्ता गिराने की ताकत तो दे सकता है, पर सत्ता के बाद की राजनीति का विकल्प नहीं। अब ‘अरब स्प्रिंग’ गायब है, मिस्र में आंदोलन के बाद अधिनायकवादी सत्ता लौटी, जबकि लीबिया, सीरिया और यमन लंबे संघर्ष और अस्थिरता में फंसे हुए हैं।

भारत के संदर्भ में बड़ा सवाल यह भी है कि क्या युवाओं के आक्रोश की लहर वास्तव में जमीन पर है या सोशल मीडिया पर उपजा एक बुलबुला भर? आरोप है कि लंबे समय से अप्रासंगिक हो चुके कुछ संगठन और एफसीआरए जैसे कानूनों से सीमित हुए समूह छात्र असंतोष में अपने लिए नई जमीन तलाश रहे हैं। जहां तक विपक्ष का सवाल है, उसका इस कथित आक्रोश में संभावनाएं तलाशना लाजिमी है। इसलिए कथित ‘जेन जी’ की असली चुनौती केवल सड़क की ताकत से कुछ बातें मनवाना नहीं, अंतर्विरोधों से मुक्त वास्तविक नैतिक बल को सिद्ध करना है।

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