भगत सिंह ने अपने युग में भारतीय क्रांतिकारी आंदोलन को विचार और संघर्ष की अद्भुत संपदा सौंपी, जो भविष्य के विप्लवमार्गियों के लिए रोशनी सौंपती है। उनके साथ पूरी क्रांतिकारी पार्टी थी, लेकिन हम प्रायः उन्हें स्मरण करते हुए उनके दल और उसके अभियान को ओझल कर जाते हैं। उनके साथ चंद्रशेखर आजाद, भगवतीचरण वोहरा, सुरेश चंद्र भट्टाचार्य, बटुकेश्वर दत्त, सुशीला दीदी, दुर्गा भाभी, विजय कुमार सिन्हा, शिव वर्मा, जितेंद्रनाथ सान्याल, धन्वंतरि, अजय घोष जैसे कितने ही क्षमतावान संगी-साथियों की बड़ी टोली का अद्भुत सहयोग और संचालन था। इन लोगों को भुलाकर हम कहीं भगत सिंह को उस तरह का तो नहीं बनाए दे रहे हैं, जहां उन्हें अकेला खड़ा करके सिर्फ उनकी तस्वीर को फूल-मालाएं पहनाई जा सकें। यह पूजावाद भविष्य के क्रांतिकारी संग्राम के लिए बड़ा नुकसानदायक पहलू है, क्योंकि इतिहास के परिप्रेक्ष्य में संघर्ष की पूरी और सही तस्वीर को देख पाने में हम सर्वथा असमर्थ होंगे। यह जान लिया जाना चाहिए कि भगत सिंह को देवत्व सौंपा जाना अंततः एक खतरनाक और दुखद प्रक्रिया है। सत्तर साल लंबे क्रांतिकारी संघर्ष के विकास का प्रतीक बना यह क्रांतिकारी हमारी चूकों से कहीं मिथक और पूजावाद की गुंजलक में तब्दील न हो जाए।
इन दिनों सबसे बड़ा प्रहार भगत सिंह की धर्मनिरपेक्षता या उनकी नास्तिक विचारधारा को लेकर हो रहा है, जो अत्यंत चिंतनीय है। भगत सिंह के ‘मैं नास्तिक क्यों हूं’ निबंध को किनारे रखकर उनके चिंतन पर बात करने का कोई अर्थ नहीं है। ऐसी कोशिशें बेहद गैरजिम्मेदाराना हैं। ऐसा करके उस विचार संपन्न शहीद को, जिसने अपने धर्मनिरपेक्ष चिंतन के चलते केश कटवा दिए थे और जिसकी कारगुजारियों के चलते संपूर्ण भारतीय क्रांतिकारी संग्राम को अपने समय में धर्म की भूलभुलैयों से बाहर आकर विचार की सर्वोच्च ऊंचाई प्राप्त हुई, जो फांसी चढ़ने से पूर्व तक प्रतिक्षण वैज्ञानिक चेतना के लिए अडिग और हौसलापूर्ण बना रहा, उसे फिर से किसी संप्रदाय या धार्मिकता के संकीर्ण घेरे में कैद करना इतिहास विरोधी साजिश है। आखिर इतिहास के सही संरक्षण और प्रस्तुतीकरण का दायित्व भी हम सबका है।
भगत सिंह को हिंसा के मार्ग का अनुयायी मानना भी सर्वथा गलत निष्कर्षों पर आधारित इतिहास और इस क्रांतिकारी नायक के जीवन की आधी-अधूरी व्याख्या है। केंद्रीय असेंबली में भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने जो बम गिराए, वे कम शक्ति के और जानबूझकर ऐसी जगहों पर फेंके गए थे, जिनसे कोई हताहत न हो। भगत सिंह सचमुच एक विचारवान क्रांतिकारी थे, जो शोषणविहीन, धर्मनिरपेक्ष और समाजवादी समाज के निर्माण के सपने को लेकर अपने साथी राजगुरु और सुखदेव के साथ 23 मार्च, 1931 को लाहौर की जेल में फांसी चढे़।