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चिकित्सा शिक्षा: चिकित्सकों के अनुभव को कमतर न आंकें, 15 वर्ष की सेवा के बाद मेडिकल कॉलेज में पढ़ाना अच्छी पहल

डॉ. विवेक एस अग्रवाल Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Thu, 25 Sep 2025 06:58 AM IST

सार

राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग का यह निर्णय कि 15 वर्ष तक सेवा दे चुके डॉक्टर मेडिकल कॉलेज में पढ़ा सकेंगे, विरोध नहीं, स्वागत योग्य है।
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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला प्रिंट


मौजूदा चिकित्सा शिक्षक मानते हैं कि अन्य चिकित्सा सेवाओं से शिक्षण कार्य में सम्मिलित किए जाने पर चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता पूरी तरह प्रभावित हो जाएगी। कुछ लोगों का मानना है की मेडिकल कॉलेज स्तरहीन हो जाएंगे। वहीं, चिकित्सा सेवाओं में संलग्न चिकित्सक मानते हैं कि कठिन परिस्थितियों एवं अभावों में काम कर उनके पास भी समान अनुभव हो गया है। अत: चिकित्सा शिक्षक के रूप में उनकी भर्ती पर सवाल उठाने का कोई औचित्य ही नहीं है। यह पहली बार नहीं हो रहा है, इससे पहले राजस्थान में अन्य सेवाओं में कार्यरत चिकित्सकों को चिकित्सा शिक्षक तैनात करने का प्रयोग हो चुका है।


इसका गहराई से तथ्यात्मक विश्लेषण करें, तो मोटे तौर पर यह उभरकर आता है कि बड़े शहरों में स्थित मेडिकल कॉलेजों में कार्यरत चिकित्सा शिक्षक फैकल्टी के रूप में काम करने को अपना एकाधिकार समझने लगे हैं, वही वर्षों से ग्रामीण एवं शहरी भेद के चलते बाहरी इलाकों में काम करने वाले चिकित्सकों को अपेक्षाकृत कम आंकते हैं। वर्तमान निर्णय के विश्लेषण में उन सभी प्रश्नों का उत्तर स्वतः ही मिल जाता है, जो विगत 10 वर्षों से ‘हर जिला एक मेडिकल कॉलेज’ की स्थापना को लेकर चलाए जा रहे अभियान पर लगते रहे हैं।


इस निर्णय से पूर्व बड़े शहरों में कार्यरत चिकित्सा शिक्षक यह कहकर सरकार की दूरदृष्टि का मखौल उड़ाया करते थे कि जिला मुख्यालयों में खोले जाने वाले मेडिकल कॉलेजों के लिए फैकल्टी कहां से आएगी, वे ही लोग इस बाबत विकल्प के रूप में सेवारत चिकित्सकों को एसोसिएट प्रोफेसर बनाने की तय नीति का विरोध करने लगे हैं। यह दीगर है कि वर्तमान में शिक्षक के रूप में नियुक्त चिकित्सक अपना लगभग 80 फीसदी समय मरीज देखने और उनके उपचार में लगाते हैं। यह तथ्य किसी से छिपा हुआ नहीं है कि आम तौर पर मेडिकल शिक्षकों में से लगभग 20 फीसदी ही शिक्षण कार्यों में संलग्न हैं, शेष को तो मेडिकल प्रैक्टिस से ही फुर्सत नहीं रहती है।


मेडिकल कॉलेजों में कार्यरत शिक्षकों के लिए शिक्षण कार्य प्राथमिकता का विषय भी नहीं है। दूसरा तर्क यह है कि बाहरी क्षेत्रों से चिकित्सकों को यदि मेडिकल कॉलेज में संकाय रूप में नियुक्त किया गया, तो शोध गतिविधियां प्रभावित हो जाएंगी। यदि मेडिकल कॉलेज में वर्तमान में हो रही शोध गतिविधियों का आकलन करें, तो स्पष्ट होता है कि एमडी या एमएस छात्रों द्वारा की जाने वाली थीसिस के अलावा मात्र सात फीसदी चिकित्सा शिक्षक ही किन्हीं अनुसंधान का हिस्सा रहे हैं। ऐसे में अन्य चिकित्सकों की योग्यता को नकार देना मात्र शहरी-ग्रामीण अथवा टीचिंग-नॉन टीचिंग चिकित्सकों के मध्य उत्पन्न श्रेष्ठता की लड़ाई ही साबित होता है।


हालांकि, नए विनियमों में गैर शैक्षणिक सेवा से नियुक्त मेडिकल शिक्षकों के लिए नियुक्ति से दो वर्षों में मेडिकल शिक्षा एवं बायोमेडिकल शोध पर कोर्स करने की बाध्यता रखी गई है, ताकि वे एक बेहतर शिक्षक के रूप में भी अपना दायित्व निभा सकें। यह अनिवार्यता सीधे शिक्षक के रूप में नियुक्त होने वालों के लिए नहीं है। यह उपयुक्त समय है कि मेडिकल कॉलेज में किसी भी स्तर पर नियुक्ति से पूर्व शिक्षण कौशल विकास हेतु बीएड जैसा कोर्स करना अनिवार्य किया जाए, ताकि बेहतर तरीके से कक्षाओं का संचालन हो। वहीं, चीन, रूस, युगांडा, सूडान, उज्बेकिस्तान, जॉर्जिया आदि देशों में उनकी भाषा में बिना उपयुक्त प्रायोगिक अध्ययन के भर्ती होने वालों का कहीं कोई विरोध नहीं है, लेकिन अपने ही राज्य में 15 वर्षों तक मरीजों का इलाज करने वाले साथियों द्वारा अर्जित ज्ञान को आगे साझा करने को उपयुक्त नहीं माना जा रहा है।


इसी संदर्भ में एक और तथ्य गौर करने लायक है कि सरकारों में नियुक्ति सामान्यतया किसी संस्था विशेष के लिए न होकर संपूर्ण राज्य के लिए होती है, ऐसे में क्या वर्तमान में मेडिकल शिक्षक के रूप में कार्य कर रहे चिकित्सक छोटे जिलों में बने मेडिकल कॉलेज में फैकल्टी का दायित्व निर्वहन के लिए तैयार हो पाएंगे।
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विरोध का हिस्सा बनने वाले चिकित्सक, तो उसी शहर में एक से दूसरे स्थान पर स्थानांतरण होने पर ही असहज हो जाते हैं और प्रताड़ना के रूप में प्रदर्शित करते हैं। राजस्थान में विभिन्न सरकारों द्वारा मेडिकल कॉलेज के शिक्षकों की सेवाएं शहर के अन्य हिस्सों में स्थापित चिकित्सालयों अथवा मेडिकल कॉलेज में स्थानांतरित करने के यत्न किए गए, लेकिन गहन प्रयास के बावजूद भी उन्हें अपने मूल स्थान से टस से मस कर पाने में अक्षम रही। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग का यह निर्णय सबको स्वास्थ्य सुलभ करवाने के लक्ष्य को हासिल करने में मील का पत्थर साबित होगा। चिकित्सकों को भी इस संदर्भ में निर्णय का स्वागत करते हुए तथा संतुलित रुख अपनाते हुए वर्ग संघर्ष से बचना चाहिए।

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