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अपनी जिम्मेदारी समझे मीडिया

तवलीन सिंह Updated Sun, 04 Mar 2018 07:20 PM IST
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तवलीन सिंह

श्रीदेवी के दुखद देहांत की खबर को टीवी पत्रकारों ने ऐसे पेश किया कि मुझे खुद के पत्रकार होने पर शर्म आती है। मेरे दोस्त वीर संघवी ने ट्वीट करके याद दिलाया कि हम सबको शर्मिंदा होना चाहिए। वीर ने अपने ट्वीट में कहा, ‘गिद्धों और टीवी समाचार चैनलों में अंतर क्या है? गिद्धों की आंख में शर्म होती है।’ दिल को छू गया वीर का यह ट्वीट, क्योंकि तब तक श्रीदेवी के बारे में और उनके देहांत के बारे में मैं टीवी समाचार चैनलों पर इतनी बेतुकी बातें सुन चुकी थी, कि मुझे शर्म के साथ गुस्सा भी आने लगा था।



खोजी पत्रकारिता के बहाने कुछ टीवी पत्रकारों ने यह साबित करने का पूरा प्रयास किया कि श्रीदेवी की मृत्यु के पीछे दोष उनका खुद का है। शराब न पी होती, तो शायद बेहोश होकर पानी भरे टब में न गिरतीं। अपनी सुंदरता कायम रखने के लिए अगर उन्होंने इतनी बार ऑपरेशन न करवाए होते, तो शायद उनकी सेहत इतनी बुरी हालत में न होती। डायटिंग करने का आरोप भी उन पर लगाया गया और आत्महत्या और हत्या की भी बातें की गईं, जैसे ये चीजें तय करना हम पत्रकारों का काम हो।

 

फिर जब उनका पार्थिव शरीर मुंबई पहुंचा और उनकी अंतिम यात्रा शुरू हुई, तो उसे ऐसे दर्शाया गया, जैसे कोई क्रिकेट मैच या फिल्मी अवार्ड शो हो। अभी देखिए, शाहरुख खान पहुंच गए हैं, अमिताभ बच्चन उस लाल गाड़ी में हैं, विद्या बालन आ गई हैं, शबाना आजमी और जावेद अख्तर आ गए हैं, इत्यादि-इत्यादि। मेरे पत्रकार साथियों से अच्छे थे श्रीदेवी के अनगिनत फैन, जो लाखों की तादाद में महानगर की सड़कों पर निकल आए थे सिनेमा की इस देवी को अपनी श्रद्धांजलि पेश करने।


शर्म आनी चाहिए हम पत्रकारों को, लेकिन आएगी नहीं, क्योंकि टीवी पत्रकारिता का स्तर इतना गिर गया है कि नौजवान पत्रकार अपने आपको ईश्वर समझने लग गए हैं। एक-दो उदाहरण काफी हैं। शशि थरूर को अपनी पत्नी का हत्यारा साबित करने में कुछ चैनलों ने कोई कसर नहीं छोड़ी है। इसी तरह कुछ वर्ष पहले टीवी पत्रकारों ने तय कर डाला था कि आरुषि तलवार की हत्या उसके माता-पिता ने ही की थी। मेरा मानना है कि अगर मेरे पत्रकार बंधुओं ने ऐसा न किया होता, तो उन्हें निर्दोष पाए जाने से पहले इतने साल जेल में न काटने पड़ते।


सच पूछिए, तो टीवी पत्रकारिता का स्तर इतना गिर गया है आज कि मुझे कई लोग मिलते हैं, जो याद करते हैं, वह पुराना जमाना, जब दूरदर्शन के अलावा भारत में कोई और टीवी चैनल नहीं हुआ करता था। माना कि समाचार कम और सरकारी प्रचार अधिक हुआ करते थे उन दिनों, लेकिन कम से कम किसी दिवंगत अभिनेत्री की इस तरह दुर्गति तो नहीं होती थी। अंग्रेजी में कहावत है कि किसी संस्था की शक्ति जितनी ज्यादा होती है, उस संस्था के कंधों पर उतना ही बोझ होता है, कि वह अपनी शक्ति का सोच समझ कर, जिम्मेदारी के साथ इस्तेमाल करे।


भारतीय मीडिया आज राजनेताओं और सरकारों से भी अधिक शक्तिशाली है। इतनी शक्ति है मीडिया के पास कि हम लोगों का जीवन बर्बाद कर सकते हैं, लेकिन अभी तक एक, दो समाचार चैनलों को छोड़कर ज्यादातर ऐसे समाचार चैनल हैं, जिनको न अपनी शक्ति का एहसास है और न ही अपनी जिम्मेदारी का। लोकतांत्रिक देशों में मीडिया पर पाबंदियां लगाना बुरी बात है, लेकिन शायद समय आ गया है कि हम पत्रकार स्वयं तय करें कि हमारा दायरा कहां तक होना चाहिए।

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