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शरद पवार को सामने लाने का मतलब, इस दांव में है कितना दम 

  रशीद किदवई Published by: रशीद किदवई Updated Wed, 16 Dec 2020 03:20 AM IST
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Sonia Gandhi, Sharad Pawar - फोटो : PTI

इतिहास खुद को दोहराता है। 1996 एवं 1998 के घटनाक्रम खुद को दोहराते दिख रहे हैं, जब कुछ वरिष्ठ कांग्रेसी नेता क्रमशः पी वी नरसिंह राव एवं सीताराम केसरी से छुटकारा पाने के लिए एकजुट हो गए थे। दोनों ही अवसरों पर सोनिया गांधी प्रकट तौर पर इन सबसे दूर थीं, लेकिन पूरी तरह से सक्रिय थीं। इसके कई वर्षों बाद सोनिया और उनके पुत्र राहुल गांधी एक ऐसा विद्रोह देख रहे हैं, जिसमें रंग, पंच और संख्या की भले ही कमी हो, लेकिन यह दिखा रहा है कि चुनाव जीतने में नेतृत्व की अक्षमता के कारण पार्टी में अधीरता और मोहभंग बढ़ता जा रहा है। 



सोनिया के लिए अनुकूल स्थिति यह है कि असंतुष्टों के पास 2020 में सोनिया जैसी शख्सियत नहीं है, जो घिसे-पिटे नेतृत्व से छुटकारा पा सके। यूपीए की कमान शरद पवार को सौंपने की अटकलें या कांग्रेस के भीतर असंतुष्ट गुट की बढ़ती सक्रियता आधारहीन नहीं है। मगर अस्सी बरस के पवार उतने ऊर्जावान, महत्वाकांक्षी और एकाग्र नहीं रह गए हैं, जैसा कि वह 1978 में थे, लिहाजा अब यह उनके लिए बहुत मुश्किल है। इसकी कीमत महाराष्ट्र विकास अघाड़ी सरकार को चुकानी पड़ सकती है, जिसे उन्होंने बहुत ध्यान से और अनूठे ढंग से बनाया है। प्रफुल्ल पटेल के हालिया रहस्योद्घाटन के मुताबिक, पवार राजीव गांधी की हत्या के बाद 1991 में भारत के प्रधानमंत्री बनने के अपने सपने के करीब आ गए थे। राजीव की मृत्यु के बाद लोकसभा की जिन सीटों पर चुनाव हुए थे, उनमें से बड़ी संख्या में कांग्रेस उम्मीदवारों के लिए पवार ने फंडिंग की थी। 


कांग्रेस कार्यसमिति की सर्वसम्मत पसंद सोनिया गांधी थीं (पवार इससे अलग थे), लेकिन जब दुखी विधवा ने इनकार कर दिया, तो पार्टी में बिना नियम-कायदे के लॉबिंग एवं छल-छद्म का सिलसिला शुरू हुआ। पवार खेमा रात्रिभोज आयोजित करने में सक्रिय हो गया था। पांच सितारा होटलों में इन रात्रिभोजों का आयोजन पवार के प्रवक्ता सुरेश कलमाड़ी द्वारा किया गया था। इस दीर्घकालिक लड़ाई में पवार और अर्जुन सिंह के बीच विवाद शुरू हो गया, जबकि नरसिंह राव, जिन्होंने दावेदार के रूप में खुद को पेश करने से परहेज किया, बाजी मार ले गए, क्योंकि पवार, अर्जुन सिंह, तिवारी और माधवराव सिंधिया जैसे आकांक्षी एक दूसरे की संभावनाओं को काटने में व्यस्त थे। 


बड़ा सवाल यह है कि क्या अस्सी वर्ष की उम्र में पवार हर तरह का जोखिम उठा सकते हैं। ताजा खबर यह है कि कांग्रेस के भीतर उनके समर्थक और शुभचिंतक विकल्प तलाश रहे हैं। जमीनी हकीकत अनुकूल नहीं है, पर कुछ लोग सोचते हैं कि इसके लिए कोशिश की जा सकती है। इसका एक कारण है। कांग्रेस भले ही पस्त है, मगर वास्तविक राजनीतिक अर्थ में देश की सबसे पुरानी पार्टी में जो कुछ भी चल रहा है, वह दिलचस्प है। 23 लोगों का विद्रोही या असंतुष्ट गुट (कुछ लोग कहते हैं कि यह संख्या 43 तक पहुंच गई है) सोनिया गांधी के साथ आमने-सामने बातचीत करना चाहता है। 1996 के राव और 1998 के प्रारंभ के सीताराम केसरी की तरह सोनिया के पास उनके साथ बैठक करने में देरी का विकल्प है। पर कब तक वह विलंब कर सकती हैं? या वह अनुशासन की चाबुक चला सकती हैं, जैसा कि 1986-87 में राजीव गांधी ने वी पी सिंह, अरुण नेहरू, आरिफ मोहम्मद खान, विद्याचरण शुक्ला, मुफ्ती मोहम्मद सईद और अन्य के खिलाफ चलाया था। वर्तमान में वह (सोनिया गांधी) राव या केसरी से बेहतर स्थिति में हैं, क्योंकि एक औसत कांग्रेस कार्यकर्ता नेहरू-गांधी परिवार से भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ है, लेकिन हैदराबाद के नगर निकाय चुनाव से लेकर उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार विधानसभा के चुनावी झटकों ने निष्ठावान कार्यकर्ताओं को परेशान कर दिया है। 


एक औसत कांग्रेस कार्यकर्ता की राजनीतिक प्रवृत्ति को नहीं बदला जा सकता है। वे नरेंद्र मोदी शासन के प्रति बढ़ती असहमति को स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। चाहे वह किसान हों या दलित, अनुसूचित जाति, अति निर्धन, जाट और मराठा जैसी बिचली जातियां, एनडीए सरकार के प्रति असंतोष को केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार के खिलाफ किसी बड़े आंदोलन में नहीं बदला जा रहा है। यह समझना होगा कि धर्म के विपरीत राजनीति में वफादारियां सशर्त और व्यावहारिक होती हैं। जब 1977 के चुनाव में इंदिरा गांधी को सत्ता से बाहर कर दिया गया था, तो डी के बरुआ ने एक नारा दिया था, इंदिरा इज इंडिया ऐंड इंडिया इज इंदिरा, जिसके अच्छे और बुरे दोनों पक्ष थे। विद्याचरण शुक्ला और अंबिका सोनी को शाह जांच आयोग से पहले अपदस्थ किया गया था। दिसंबर, 1997 में जब सीताराम केसरी कांग्रेस अध्यक्ष थे, तो नेहरूवादी मणिशंकर अय्यर तृणमूल कांग्रेस में शामिल हो गए थे। हालांकि मणिशंकर बाद में अपने मूल संगठन कांग्रेस में यह आरोप लगाते हुए लौट आए कि ममता के नेतृत्व में तृणमूल कांग्रेस बंगाल के चौथे फुटबॉल क्लब के अलावा कुछ नहीं है।


गांधी-नेहरू परिवार पर निशाना साधने वाले असंतुष्ट कद्दावर नेता के अभाव में बड़ी ही चतुराई से पवार को सामने खड़ा कर रहे हैं। उनके मुताबिक वह राहुल से बेहतर ढंग से यूपीए का नेतृत्व कर सकते हैं। यूपीए एक समरूप राजनीतिक इकाई नहीं है। केरल में यूडीएफ गठबंधन के विपरीत, 2014 से अब तक यूपीए ने गैर कांग्रेसी गुटों को जुड़ने के बजाए छिटकते देखा है। आम तौर पर गठबंधन में बहुमत वाली पार्टी को यूपीए जैसे समूहों का नेतृत्व दिया जाता है। लेकिन राष्ट्रीय मोर्चा के दिनों में (1989) में एन टी रामाराव मोर्चे के अध्यक्ष थे, जबकि वह एक क्षेत्रीय पार्टी तेलुगू देशम पार्टी से संबद्ध थे। यह बात पवार के पक्ष में जाती है। 


इस खेल की पहली योजना सोनिया को यूपीए प्रमुख के पद से मुक्त करना है। एक बार जब ऐसा हो जाएगा, तब पवार महाराष्ट्र मॉडल (शिव सेना, कांग्रेस और राकांपा की एकजुटता) के लिए कोशिश करेंगे, ताकि विभिन्न विचारधारा समूह की पार्टियों को राष्ट्रीय स्तर पर एकजुट किया जा सके। पवार के करीबी सूत्रों को प्रफुल्ल महंत, के चंद्रशेखर राव, ममता बनर्जी और यहां तक कि नवीन पटनायक को मोदी विरोधी मंच पर उतारने का भरोसा है। राहुल और सोनिया के नेतृत्व में कांग्रेस कुछ भी करने में नाकाम रही है। एक बार जब किसानों, पिछड़ी जातियों और क्षेत्रीय क्षत्रपों को एक ही छतरी के नीचे लाने का काम पूरा होगा, कांग्रेस के भीतर गांधी परिवार की प्रासंगिकता घट जाएगी और वे कमजोर हो जाएंगे। इस तरह की योजना आकर्षक तो लगती है, पर इसे लागू करना चुनौतीपूर्ण है। 

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