तो नरेंद्र मोदी सरकार के विरुद्ध पहला अविश्वास प्रस्ताव आ गया है। पहले आंध्र प्रदेश से वाईएसआर कांग्रेस की ओर से अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया गया और उसके बाद कल तक राजग का हिस्सा रही तेलुगू देशम पार्टी (तेदेपा) ने भी ऐसी ही घोषणा कर दी। वास्तव में यह अविश्वास प्रस्ताव आंध्र प्रदेश की आंतरिक राजनीति की प्रतिस्पर्धा की पैदाइश है। वाईएसआर कांग्रेस के नेता जगनमोहन रेड्डी के बारे में कहा जाता था कि वह भाजपा के संपर्क में हैं। राजग से नाता तोड़ते समय तेदेपा ने यही कहा कि भाजपा जगनमोहन रेड्डी एवं जनसेना पार्टी के प्रमुख पवन कल्याण के माध्यम से उसे कमजोर करने की कोशिश कर रही थी। अगर वाईएसआर कांग्रेस मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दे रही है, तो यह नहीं कहा जा सकता कि भाजपा से उसके तार जुड़े हुए थे। अगर ऐसा होता, तो वह तेदेपा के जाने के बाद राजग में आने की कोशिश करती।
सच यह है कि जगनमोहन ने आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने के मुद्दे पर चंद्रबाबू नायडू की नाक में दम कर दिया था। उन पर वाईएसआर कांग्रेस लगातार आरोप लगा रही थी कि नायडू मोदी सरकार में भागीदार होते हुए भी आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा नहीं दिलवा पा रहे हैं। वह सत्ता के लिए आंध्र के लोगों के साथ विश्वासघात कर रहे हैं। हालांकि अभी चुनाव में एक वर्ष से ज्यादा की देरी है, पर दोनों पार्टियों की गलत राजनीति से यह इतना बड़ा मुद्दा बन गया है कि इस मामले में दोनों एक दूसरे को पीछे छोड़ना चाहती हैं। इस प्रतिस्पर्धी राजनीति का परिणाम जो हो, पर तत्काल यह प्रश्न तो उठेगा कि आखिर अविश्वास प्रस्ताव का औचित्य क्या है? क्या आंध्र प्रदेश के हक के लिए यही एकमात्र रास्ता बचा था? क्या इसका परिणाम आंध्र प्रदेश के लिए लाभकारी होगा?
लोकसभा का जो अंकगणित है, उसमें फिलहाल भाजपा के लिए अविश्वास प्रस्ताव कतई चिंता का कारण नहीं है। उसके पास अकेले 273 सांसद हैं। इसलिए मतदान में उसे बहुमत मिल जाएगा। वैसे भी अभी राजग में तेदेपा के 16 सांसदों के जाने के बावजूद शिवसेना के 18, लोजपा के छह, अकाली दल के चार, राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी के तीन, जदयू के दो, अपना दल के दो एवं अन्य दलों के चार सांसद शामिल हैं। इनमें शिवेसना को लेकर थोड़ा संदेह हो सकता है, क्योंकि वह लंबे समय से राजग का भाग होते हुए भी विपक्षियों की भाषा ही बोलती है।
सच यह है कि कोई पार्टी आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा नहीं दे सकती। यह अब संभव ही नहीं। जिन 11 राज्यों को पहले से विशेष राज्य का दर्जा मिला हुआ है, उसके बाद किसी अन्य को मिलना 14 वें वित्त आयोग की रिपोर्ट के बाद असंभव है। वैसे भी कई राज्य इसकी मांग कर रहे हैं। आंध्र कोई ऐसा गरीब राज्य भी नहीं है कि उसके विशेष राज्य का दर्जा देने की मांग के साथ कोई सहानुभूति पैदा हो। हां, राजधानी के विकास से लेकर राजस्व में कमी आदि की भरपाई होनी चाहिए। केंद्र की ओर से वित्त मंत्री ने आंकड़े देकर यह बताया कि किस तरह केंद्र ने आंध्र की वित्तीय मदद की है और विशेष दर्जे वाले राज्यों की तरह उसे सहायता देने के लिए सरकार तैयार है। हां, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एवं भाजपा के लिए यह चिंता का विषय अवश्य है कि आंध्र प्रदेश में उनका एक साथी तथा एक संभावित साथी विरोध में चला गया है। सरकार के लिए यह भी चिंता का कारण है कि इससे विपक्ष की आक्रामकता बढ़ेगी और संसद के संचालन तथा विधेयक पारित कराने में कठिनाइयां आएंगी।