फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

इस्राइल से दोस्ती के मायने

Wed, 05 Jul 2017 07:26 PM IST
मनोज जोशी
विज्ञापन
मनोज जोशी
विज्ञापन
नरेंद्र मोदी विगत 28 वर्षों में श्रीलंका और 17 वर्षों में नेपाल जाने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री थे। विगत 25 वर्षों में इस्राइल की यात्रा पर जाने वाले वह पहले भारतीय प्रधानमंत्री हैं। इस्राइल से भारत के रिश्ते को रेखांकित करने की सिर्फ यही वजह नहीं है। वास्तव में इस्राइल के साथ हमारे रिश्ते शुरुआत से ही अच्छे हैं, बावजूद इसके कि हमने सिर्फ 25 वर्ष पहले उसके साथ राजनयिक संबंध स्थापित किए। मोदी का वहां काफी स्वागत हुआ है। पर ध्यान रहे, इस्राइल और खासतौर से उसके प्रधानमंत्री नेतन्याहू की छवि इतनी खराब है कि कई विदेशी नेता इस्राइल को नजरंदाज करते हैं। 
विज्ञापन


इसके बावजूद मोदी की इस्राइल यात्रा भू-राजनीति और भू-रणनीति के लिहाज से अहम है। वह खुद इस देश की यात्रा करने को उत्सुक रहे हैं, जिसकी भाजपा आतंकवाद के खिलाफ कड़ा रुख अपनाने की वजह से प्रशंसक रही है। उनकी यात्रा एक अवसर की तरह है, क्योंकि दुनियाभर में वैचारिक सीमाएं धुंधली होती जा रही हैं और हम एक ऐसी विश्व व्यवस्था को उभरता देख रहे हैं, जिसमें विभिन्न राष्ट्रों के संबंध तेजी से कारोबारी और सौदेबाजी पर आधारित होते जा रहे हैं। इस्राइल के साथ हमारे संबंध का यही आधार है। मोदी और नेतन्याहू की मौजूदगी में दोनों देशों के बीच सात समझौते हुए हैं, जिनमें अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी, जल प्रबंधन, कृषि और रोजगार शामिल हैं। 

हम इस्राइल के जरिये उच्च गुणवत्ता वाली अमेरिकी सैन्य प्रौद्योगिकी हासिल करना चाहते हैं, जिसे अमेरिका सीधे हमें देने से इंकार कर देगा। बदले में इस्राइल हमें बाजार की तरह देख रहा है, जहां वह हमसे सौदा कर सकता है। भारत-इस्राइल संबंधों का सबसे बड़ा क्षेत्र रक्षा ही है, 2012-2016 के दौरान इसके कुल निर्यात का 41 फीसदी भारत ने खरीदा। मगर इस्राइल 7.2 फीसदी हिस्सेदारी के साथ तीसरा बड़ा आपूर्तिकर्ता देश है, जबकि हमें सर्वाधिक 68 फीसदी आपूर्ति रूस करता है और अमेरिका 14 फीसदी।
विज्ञापन


इस्राइल हमें उच्च प्रौद्योगिकी से जुड़े यूएवी, प्रतिरोधक मिसाइल और अवाक्स प्रणाली (वायुक्षेत्र चेतावनी एवं नियंत्रण प्रणाली) की आपूर्ति करता है। हमें जल्द ही उससे एंटी टैंक मिसाइल स्पाइक भी मिलने वाली है। इस्राइल के साथ हमारे रक्षा संबंध 1960 के दशक से हैं, जब उसने 1962 में चीन युद्ध के समय हमें सैन्य मदद की थी। इस्राइल ने भारत को आणविक हथियारों से जुड़े कार्यक्रम में भी मदद की है, हालांकि इस बारे में कुछ स्वाभाविक कारणों से अधिक बात नहीं की जाती। 

मोदी की इस्राइल यात्रा में दूसरा अहम क्षेत्र कृषि और पानी से जुड़ा है। इस्राइल को उच्च प्रौद्योगिकी के लिए जाना जाता है, और इन दो क्षेत्रों में इस्राइल का सहयोग बहुमूल्य साबित हो सकता है। इस्राइल में भारत की तुलना में बहुत कम वर्षा होती है, मगर जल प्रबंधन नीतियां और कृषि के मामले में उसकी गिनती दुनिया के सबसे विकसित देशों में होती है। लेकिन सिर्फ प्रौद्योगिकी ही इलाज नहीं है, इसके लिए निवेश की भी जरूरत होती है। इस मामले में कर्ज से लदे भारतीय किसान काफी पीछे हैं। इसलिए भारत को प्रौद्योगिकी के साथ ही जल प्रबंधन और कृषि के विस्तार की प्रणाली विकसित करने की जरूरत है, ताकि प्रभावी तरीके से हमारे यहां खेती में बदलाव आ सके। दोनों देशों के बीच सहयोग का तीसरा क्षेत्र मेक इन इंडिया है। नवोन्मेष के लिए चार करोड़ डॉलर के कोष की स्थापना एक महत्वपूर्ण कदम है, क्योंकि स्टार्ट अप के लिए इस्राइल में दुनिया का सबसे उर्वर वातावारण है। 

इस्राइल से जब भी संबंधों की बात आती है, तो आतंकवाद का मुद्दा महत्वपूर्ण हो जाता है। मोदी और नेतन्याहू की मौजूदगी में दोनों देशों ने अपने रणनीतिक हितों की सुरक्षा के लिए सहयोग बढ़ाने पर सहमति जताई और आतंकी समूहों और उनके प्रायोजकों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई का आह्वान किया। मगर इस्राइल और भारत के लिए आतंकवाद के मायने अलग हैं। इस्राइलियों के लिए आतंकवाद का मतलब ऐसे लोगों के भय से है, जिनकी जमीन पर इस्राइल राज्य की स्थापना हुई है और जहां वह विस्तार करना चाहता है। इनमें से अधिकांश लोग मुस्लिम हैं। भारत के लिए आतंकवाद का मतलब पाकिस्तान से संचालित आतंकवाद से है। इस्राइली पाकिस्तान या लश्करे तइबा या तालिबान को लेकर फिक्रमंद नहीं हैं। उनका ध्यान अरब दुनिया पर केंद्रित है और समय के साथ उन्होंने अधिकांश अरब देशों के साथ अच्छे रिश्ते भी बना लिए हैं, जिन्होंने फलस्तीन को उसके हाल पर छोड़ दिया है। आतंकवाद के संदर्भ में इस्राइल का समाधान भारत के लिए बहुत उपयोगी नहीं है, क्योंकि दोनों के संदर्भ भिन्न हैं। 

इस्राइल का सबसे अहम संबंध अमेरिका से ही है, जोकि उसका संरक्षक है और उसे सुरक्षा देने की गारंटी देता है। अमेरिका उसे आर्थिक मदद भी करता है, जिसे किसी भी दृष्टि से गरीब नहीं कहा जा सकता। पिछले वर्ष अमेरिका ने इस्राइल के लिए 38 अरब डॉलर का सैन्य मदद का दस वर्ष का पैकेज मंजूर किया। इस्राइल का चीन के साथ भी अच्छा संबंध है। इस वर्ष की शुरुआत में इस्राइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू बीजिंग गए थे और वहां उन्होंने संकेत दिए थे कि उनका देश वन बेल्ट वन रोड प्रोजेक्ट का समर्थन करेगा। अमेरिकी नियमों के कारण इस्राइल चीन को सैन्य प्रौद्योगिकी की मदद नहीं कर सकता, मगर चीन को इस्राइल से खेती संबंधी प्रौद्योगिकी की सर्वाधिक आपूर्ति होती है। एक हजार इस्राइली स्टार्ट अप कंपनियां चीन में हैं। इस्राइल-चीन का द्विपक्षीय व्यापार 13 अरब डॉलर का है, वहीं भारत-इस्राइल सिर्फ पांच अरब डॉलर का है। 

कुछ हद तक मोदी और भाजपा का इस्राइल प्रेम एकतरफा है। भारत के साथ इस्राइल का संबंध का आधार विचारधारा नहीं, बल्कि व्यावहारिकता है। सरकार फलस्तीन की समस्या के समाधान के लिए दो राज्य के सिद्धांत से अलग नहीं हो सकती, क्योंकि अरब जगत में हमारे बहुत से हित जुड़े हुए हैं। 
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें