पाकिस्तान के अखबारों में पिछले दिनों एक बदलाव दिखा, जब पाकिस्तान के एक बुजुर्ग की मौत की खबर सुर्खियों में थी। शुक्र है, उनकी मौत बुढ़ापे में प्राकृतिक कारणों से हुई। अब्दुल सत्तार ईदी की मौत पर दुनिया भर में शोक मनाया जा रहा है। उनका व्यक्तित्व ऐसा था कि पाकिस्तान के दो लोगों की आंखों की रोशनी लौट आई, जब ईदी की आंखें उनमें प्रत्यारोपित की गई। इस तरह के व्यक्ति को नोबल पुरस्कार की जरूरत नहीं होती, जो कि अब ज्यादा से ज्यादा राजनीतिक पसंद की चीज बन गया है। आर्थिक रूप से कमजोर पाकिस्तानी या हताश नागरिक ईदी या उनके ईदी फाउंडेशन की सराहना करते हैं।
पाकिस्तान के गांव या शहर में किसी को भी अगर कभी मरीजों को अस्पताल पहुंचाने या मृतक के शरीर को ले जाने के लिए एंबुलेंस चाहिए, तो वे ईदी फाउंडेशन के निकटतम केंद्र का टेलीफोन नंबर डायल करते थे। यहां तक कि मुल्क की विभिन्न हुकुमतें भी, जिन्होंने सड़क मार्गों और एफ-16 विमानों पर अरबों रुपये खर्च कर दिए, पूरे मुल्क में एंबुलेंस का इतना बड़ा नेटवर्क नहीं दे सकीं। ईदी फाउंडेशन की एंबुलेंस जब सड़कों पर सायरन बजाती हुई गुजरतीं, तो लोग सम्मान से उसे रास्ता देने के लिए अपनी कार को किनारे कर लेते। हर ईदी केंद्र के बाहर बच्चों के खाली पालने को देखना एक अनूठा नजारा होता था। अंधेरी रातों में नवजात बच्चों को मारने या कूड़े के ढेर पर फेंकने के बजाय लोग उन पालनों में उन्हें सावधानी से रख देते थे। कवि और लेखक हरीश खलीक के अनुसार, ईदी समाजसेवा और परोपकार की परंपरा से आते थे, जो इस उप-महाद्वीप के गुजराती और काठियावाड़ी समुदायों में आम बात है-चाहे वे मुसलमानों में मेमन, इस्मायली और बोहरा हों या पारसी या हिंदू हों।
ईदी ने न केवल अपने गांव में अपने हाथों से अपने लिए कब्र खोदी, बल्कि उनकी इच्छा थी कि उन्हें उन्हीं पुराने कपड़ों में दफनाया जाए, जिनमें उनकी मौत हो। मुसलमानों में अंतिम विदाई के वक्त मृतक को स्नान कराया जाता है और फिर उसे साफ-सुथरे सफेद कपड़ों में ताबूत में लिटाकर दफनाया जाता है। पर ईदी का ऐसे धार्मिक रीति में यकीन नहीं था और उन्होंने साबित किया कि उनका मजहब 'मानवता' है। मोहम्मद अली जिन्ना ऐसा ही पाकिस्तान बनाना चाहते थे, जहां हर किसी के पंथ का सम्मान हो, चाहे वे किसी भी मजहब या संस्कृति को मानते हों। ईदी को राजकीय सम्मान के साथ दफनाया गया, उनका ताबूत जब गुजरा, तो पूरे सैन्य व असैन्य नेतृत्व ने उन्हें सलामी दी। विशिष्ट लोगों की इतनी भीड़ सुरक्षा मानकों के लिहाज से पाकिस्तान के लिए दुर्लभ बात थी, लेकिन हर कोई उस व्यक्ति को आखिरी विदाई देना चाहता था, जो फिर कभी पाकिस्तान में नहीं जन्मेगा।
ईदी से मिलना आपके लिए एक सुखद आश्चर्य की तरह होता था। उनकी आंखें हमेशा चमकती रहती थीं और जब वह रोजाना अनाथ बच्चों के साथ समय बिताते थे, तो बेहद खुश होते थे। वे अनाथ बच्चे कभी कूदकर उनकी गोद में बैठ जाते, तो कभी उनकी दाढ़ी से खेलते।
भारत की हिंदू लड़की गीता को पनाह देने की बात को भला कौन भूल सकता है! उन्होंने न सिर्फ उसे गोद लिया, बल्कि उसे एक अलग कमरा दिया, जहां वह विभिन्न हिंदू देवी-देवताओं की मूर्तियों की पूजा करती थी। यहां एक बार फिर जिन्ना की याद आती है, जिनके मन में अल्पसंख्यकों के लिए काफी सम्मान था।
जैसा कि लोग याद करते हैं, ईदी ने जो कुछ किया, वह पाकिस्तान की क्रूर और अन्यायपूर्ण व्यवस्था के प्रति प्रतिक्रिया थी। हरीश बताते हैं, हमारे ताकतवर कुलीन वर्ग ने, जिसमें सैन्य व असैन्य शासकों, व्यवसाय और उद्योग जगत, प्रभावी और शिक्षित पेशेवर और राजनीतिक संस्थाएं शामिल हैं, जो किया, ईदी ने उसके प्रति प्रतिक्रिया दी। दुर्घटनाओं, नागरिक संघर्ष, प्राकृतिक आपदा, आतंकवादी घटनाओं या कराची में गैंगवार के दौरान हर बार ईदी ने उदाहरण पेश किया। वह लाशों, यहां तक सड़ चुकी लाशों को आकर उठाते और खुद उसे नहलाकर सम्मानपूर्वक दफना देते थे।
ईदी ने कभी सरकारी पैसे को छुआ तक नहीं, लेकिन जब उन्हें धन की कमी पड़ जाती, तो वह दान कार्यों के लिए सड़क किनारे खड़े होकर लोगों से भीख मांगते थे। इसके चलते कभी-कभी वहां ट्रैफिक जाम की समस्या पैदा हो जाती, क्योंकि लोगों को उन पर भरोसा था और वे बिना कोई सवाल किए दान देते थे। मैंने लोगों का ऐसा भरोसा केवल तभी देखा, जब क्रिकेटर से राजनेता बने इमरान खान ने कैंसर अस्पताल के लिए लोगों से दान मांगा था।
पाकिस्तान के लोग, खासकर गरीब इस अर्थ में सौभाग्यशाली हैं कि ईदी लंबी उम्र तक जिए और उन्हें किसी जेहादी आतंकवादी ने नहीं मारा। खासकर तब, जब कट्टरपंथी अनाथ बच्चों को पालने-पोसने के ईदी के काम की आलोचना करते थे और उन्होंने उन्हें धमकाया भी था। लेकिन ईदी ने इसकी परवाह नहीं की और भय को किनारे रखकर लोगों को उम्मीद के साथ जीना सिखाया।
अब सवाल यह है कि उनके जाने के बाद ईदी फाउंडेशन का क्या होगा? ईदी के बेटे फैसल ईदी और उनकी जीवन संगिनी बिलकिस ईदी का कहना है कि उनकी मौत के बाद से उन्हें धमकियां मिल रही हैं और लोगों को दान देने से हतोत्साहित किया जा रहा है। उनके नाम पर हवाई अड्डों और सड़कों का नाम रखने के सुझाव और बड़बोलेपन के बजाय पाकिस्तान के लोगों को इस चुनौती के खिलाफ खड़ा होकर यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ईदी फाउंडेशन निःस्वार्थ भाव से अपना काम करता रहे।
अंग्रेजी दैनिक डॉन ने अपने संपादकीय में ठीक ही लिखा है कि ईदी का वैश्विक नजरिया दुनियावी था और उस देश के विपरीत था, जहां वह बूढ़े हुए। ईदी ने जिन लोगों की सेवा की, उनके मजहब, जाति, नस्लीयता और नागरिकता से उन्हें कोई मतलब नहीं था। उनकी नजर में सभी समान थे और वह सबके साथ बराबरी का व्यवहार करते थे। अगर ईदी के मूल्यों को पाकिस्तान में अपनाया जाए, तो यह मुल्क निर्विवाद रूप से अपने संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना के दर्शन के करीब होगा।
लेखिका पाकिस्तान की वरिष्ठ पत्रकार हैं