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तीन तेरह में चौदह का गणित

Mon, 08 Apr 2013 11:09 PM IST
कमर वहीद नकवी
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पल-छिन, पल-छिन, धक-धक, धुक-धुक! नमो-नमो, नको-नको! रथों के रथी क्यों नहीं? रागा-रागा कि मसि-मसि? दिल्ली की राजनीतिक चौपड़ पर हर दिन नया थियेटर चालू आहे। तेरह के कैलेंडर की तारीखें जैसे-जैसे चौदह की तरफ बढ़ रही हैं, वैसे-वैसे नए-नए गुल और गुलफाम सामने आ रहे हैं।
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आडवाणी जी को अचानक राममनोहर लोहिया अच्छे लगने लगे, तो 'मौलाना' मुलायम को श्यामाप्रसाद मुखर्जी सुहाने नजर आने लगे। अजीब चकरघिन्नी है भाई! ऐसा लगता है कि तेरह के इस साल ने सबका तीन-तेरह कर दिया है। मुलायम नए-नए मंतर ढूंढ रहे हैं, कांग्रेस अकबकाई हुई है। नीतीश अपने पासे टटोल रहे हैं, तो भाजपा अपने ही तीरों से घायल दिख रही है। अगले चुनावों जैसा अबूझ चुनाव शायद ही देश में कभी हुआ हो।

भाजपा में घमासान इस पर है कि पार्टी में किस 'लाल' की गोटी लाल हो? नमो भाई, यानी गुजरात की धरती के तीसरे लाल (जैसा कि राजनाथ जी बता गए कि गुजरात की धरती से सरदार पटेल न उठ खड़े हुए होते, तो भारत आज 'अखंड' न होता और गुजरात की धरती के दूसरे लाल महात्मा गांधी के सपनों का भारत बनाने के लिए गुजरात की धरती के एक और लाल, नमो भाई नरेंद्र मोदी को ही देश का कर्ज उतारना है) की लाली भाजपा के कई महारथियों को रास नहीं आ रही है।
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इन सभी महारथियों के रथी और छह-छह रथ-यात्राओं की जुगाली कर रहे लालकृष्ण आडवाणी मुलायम और लोहिया के कसीदे पढ़ते हुए अचानक अयोध्या कांड का पाठ करने लग गए! क्योंकि अगर मोदी आ गए, तो फिर इन महारथियों की औकात इतनी भी नहीं रह जाएगी कि वे मोदी के रथ में पहियों की तरह भी काम आ सकें। उधर, युवराज राग गा रहे कांग्रेसी अचानक अचकचा गए हैं कि 'रागा' यानी राहुल गांधी की तान ठीक रहेगी या 'मसि' यानी मनमोहन सिंह की लिखी कहानी का ही तीसरा संस्करण छापने की जुगत भिड़ाई जाए। हाथ वालों को वह हाथ नहीं सूझ रहा है, जिसे थाम कर वे चुनावी वैतरणी की तरफ बढ़ें? इत्ती दुविधा क्यों है बंधु?

भाजपा और आरएसएस को तो कोई दुविधा अब तक नहीं थी। उन्हें लग रहा था कि इस बार मोदी के 'सुदर्शन चक्र' से वे मैदान मार लेंगे। और सच कहें, तो भाजपा और संघ के पास मोदी से बेहतर कोई और पत्ता है ही नहीं। सब जानते हैं कि मोदी की तमाम सीमाएं हैं, अंतर्राष्ट्रीय मंचों से लेकर राष्ट्रीय राजनीति तक तरह-तरह के सवाल हैं। ब्रिटेन और यूरोपीय संघ की तरफ से तो दरवाजे खुल गए, लेकिन अभी बहुत-कुछ बाकी है। अमेरिका का रुख नरम पड़ भी जाए, तो अरब देशों के साथ संबंध कैसे होंगे, इसका कोई संकेत अब तक नहीं मिला है।

राष्ट्रीय राजनीति में भी सवाल बने ही हुए थे। नीतीश कुमार तो पहले से ही लाल झंडी दिखा रहे हैं, लेकिन चुनावों के बाद अगर सहयोगियों की जरूरत पड़ी (जो कि पड़ेगी ही), तो नए सहयोगी कहां से आएंगे? एक जयललिता को मोदी अपने पाले में गिन सकते हैं, लेकिन क्या ममता बनर्जी, नवीन पटनायक, जगन रेड्डी या चंद्रबाबू नायडू, मुलायम या मायावती में से कोई मोदी का कमल खिलाने को तैयार होगा? ये सारे सवाल थे, इसके बावजूद संघ अगर मोदी को अपना 'ब्रह्मास्त्र' मान रहा था, तो वह कुछ भी गलत नहीं सोच रहा था। मोदी के अलावा आज भाजपा के पास ऐसा कौन-सा नेता है, जिसके नेतृत्व में चुनाव लड़ कर पार्टी उम्मीद कर सके कि कम से कम वह उतनी सीटें तो जीत सके, जितनी इस लोकसभा में उसके पास हैं।

यही कारण है कि तमाम असहजताओं के बावजूद संघ के लिए मजबूरी का नाम मोदी है। मोदी के पास कम से कम तीन बड़े हथियार हैं, जिनसे संघ को बड़ी उम्मीदें हैं। पहला विकास, दूसरा हिंदुत्व की अंतर्निहित छवि (जिसके लिए मोदी को किसी नए हिंदुत्ववादी नारे की जरूरत नहीं है) और तीसरा 'दबंग' नेता के तौर पर प्रस्तुत किया जा सकने वाला व्यक्तित्व। यहां तक तो सब ठीक था, लेकिन पार्टी के बाकी नेताओं को जो बात पच नहीं रही है, वह है, मोदी का 'मैं' और 'मेरे सिवा कोई नहीं'।

मोदी पिछले दस वर्षों से गुजरात में भाजपा और संघ को जेब में रखकर टहलते रहे हैं। किसी को उन्होंने कभी कुछ नहीं समझा। पार्टी का जो भी नेता कभी गुजरात गया, वह मोदी की दया पर ही वहां रहा। ऐसे में मोदी अगर राष्ट्रीय राजनीति में आते हैं, तो सबको डर है कि वह बाकी दिग्गजों को एक-एक कर ठिकाने लगा देंगे और यह डर बेबुनियाद भी नहीं। जैसे-जैसे पार्टी के बाकी नेताओं को इस 'खतरे' का एहसास होता गया, वैसे-वैसे मोदी के दिल्ली कूच को रोकने की कोशिशें शुरू हो गईं। और अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि संघ, भाजपा और मोदी इस नई चुनौती से कैसे निपटें? इस बात की क्या गारंटी है कि मोदी के नेतृत्व में अगर चुनाव लड़ा गया, तो पार्टी में बड़े पैमाने पर अंतर्घात नहीं होगा? अब बीजेपी की सबसे बड़ी धुकधुकी यही है।

उधर, कांग्रेस में भी संभवतः सहसा ही कोई आत्मबोध हुआ लगता है कि चुनावी शतरंज में ' रागा' को राजा की तरह उतारा जाए या नहीं? अगर उन्हें भविष्य के प्रधानमंत्री के तौर पर पेश करते हुए कांग्रेस चुनाव लड़ती है, तो इससे दो बड़े खतरे हैं। पहला यह कि लड़ाई मोदी बनाम राहुल हो सकती है, जो नाक की लड़ाई बन सकती है। दूसरा यह कि नतीजे अगर कहीं बिहार और उत्तर प्रदेश के पिछले चुनावों की तरह ही खराब आ गए, तो युवराज की बड़ी छीछालेदर होगी। इसलिए मजबूरी का नाम 'मसि' यानी फिलहाल मनमोहन सिंह की पर्ची लेकर चलिए, आगे की बात चुनाव बाद देखी जाएगी! राहुल या मनमोहन सिंह- कांग्रेस की धुकधुकी यही है। और मुलायम और नीतीश टकटकी लगाए देख रहे हैं, आगे-आगे होता है क्या?
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