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उतर गया सऊदी शहजादे का नकाब

तस्लीमा नसरीन
Updated Mon, 17 Dec 2018 07:08 PM IST
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सऊदी महिला

थोड़े दिनों पहले तक भी मैं सोचती थी कि खूबसूरत सऊदी शहजादे मोहम्मद बिन सलमान वहां की लड़कियों और महिलाओं के लिए वरदान बनकर आए हैं। नारी-विरोधी समाज में परिवर्तन वही लाएंगे। और किसी ने तो इस दिशा में ध्यान दिया नहीं। शहजादे ने जब सऊदी अरब में महिलाओं को गाड़ी चलाने का अधिकार दिया, तब मुझे यकीन हुआ था कि वहां महिला-विरोधी कानूनों को धीरे-धीरे वही खत्म करेंगे। तब उनके लिए मेरा सिर श्रद्धा से झुक गया था। मुझे लगा कि एक कट्टरवादी देश में पैदा होने के बावजूद सऊदी शहजादे उदारवादी हैं। सोशल मीडिया पर उनके पक्ष में लिखते हुए मैंने यह भी लिखा कि यही शहजादे एक दिन वहां राजतंत्र की जगह लोकतंत्र की स्थापना करेंगे। उनके प्रति मेरा यह विश्वास निराधार नहीं था। बुर्के के खिलाफ उन्होंने ही तो कहा था, इस्लाम ने कभी यह नहीं कहा कि लड़कियों-महिलाओं के लिए बुर्का अनिवार्य है। अगर कोई बुर्का पहनना चाहती है, तो पहनेगी, अगर नहीं चाहती, तो नहीं पहनेगी। इसमें कोई जबर्दस्ती नहीं है। सिर्फ मैं ही क्यों, समतावादी समाज के इच्छुक बहुतेरे लोगों ने उनकी उस बात की प्रशंसा की थी। वह सुखद आश्चर्य का अवसर इसलिए भी था, क्योंकि सऊदी राजप्रसाद से इससे पहले कभी ऐसी बातें सुनने को नहीं मिली थीं। मुझे भी लगा था कि सऊदी महिलाओं को आखिकार बुर्के से मुक्ति का अवसर मिला।



लेकिन थोड़े दिन बाद और थोड़ी गहराई में जाने के बाद शीशे की तरह साफ हो गया कि सऊदी शहजादे ने लोगों को बेवकूफ बनाने के लिए वे बातें की थीं। वहां महिलाओं के लिए बुर्का आज भी अनिवार्य है। बगैर बुर्के के कोई भी महिला घर से बाहर कदम नहीं रख सकती। उस दिन कुछ लड़कियों ने वहां की सड़कों पर बुर्के के अधिकार से मुक्ति पाने के लिए उल्टा बुर्का पहनकर प्रदर्शन किया, लेकिन आखिर में उन्हें समझ में आ गया कि इस तरह के विरोध प्रदर्शन से उन्हें कुछ हासिल होने वाला नहीं है। यह बात भी समझ लेनी चाहिए कि सऊदी महिलाओं को गाड़ी चलाने का अधिकार उनके आंदोलन के आधार पर नहीं, बल्कि सऊदी बादशाह और शहजादे द्वारा फैसला लिए जाने के कारण ही मिला है। देश में कोई औरत यह न कहे कि गाड़ी चलाने का अधिकार औरतों को उनके आंदोलन के कारण मिला है, यह भी सऊदी राजप्रासाद की तरफ से साफ-साफ बता दिया गया है। महिलाओं को गाड़ी चलाने का अधिकार मिलने से कुछ दिन पहले ही आंदोलन कर रहीं ग्यारह औरतों को गिरफ्तार किया गया था। अभी तक उन ग्यारह महिलाओं में से सिर्फ चार को रिहा किया गया है। शेष सात औरतों को इसलिए रिहा नहीं किया गया है, क्योंकि वे पुरुष अभिभावकों के खिलाफ घर और देश से बाहर कदम न रखने के कानून को रद्द किए जाने की मांग कर रही थीं। अब कहा यह जा रहा है कि आजादी की मांग करती उन औरतों को पच्चीस साल की कैद की सजा हो सकती है। यानी जिन सऊदी शहजादे को वहां औरतों की मुक्ति का प्रतीक माना जा रहा था, वह मूलतः यथास्थितिवाद के पोषक ही हैं। चूंकि इक्कीसवीं सदी में भी गुलामी की बेड़ियों में जकड़ी सऊदी महिलाएं सड़कों पर उतरकर आजादी की मांग कर रही हैं, इसलिए दुनिया की आंखों में धूल झोंकने के लिए सऊदी शहजादे को सुनियोजित तरीके से उदारवाद के प्रतीक के तौर पर दिखाया गया। जबकि वहां स्थिति अब भी पहले जैसी ही है।


पिछले साल वहां के कुछ लेखकों और बुद्धिजीवियों ने शहजादा मोहम्मद बिन सलमान की आलोचना की थी। इस कारण तीस लेखकों-बुद्धिजीवियों को गिरफ्तार कर लिया गया और उन्हें अब भी रिहा नहीं किया गया है। पत्रकार जमाल खशोगी गिरफ्तारी से बचने के लिए ही देश छोड़कर भाग गए थे। वाशिंगटन पोस्ट में वह सऊदी शहजादे की नीतियों का विरोध कर रहे थे। उन्होंने कतर के साथ आर्थिक और कूटनीतिक रिश्ते तोड़ने, लेबनान के प्रधानमंत्री का तख्तापलट करने और सऊदी राजसत्ता से भिन्न मत रखने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने की तीखी आलोचना की थी। तब बेचारे खशोगी को मालूम नहीं था कि सऊदी शहजादा उनकी हत्या की साजिश रच रहे हैं। उस साजिश के तहत ही तुर्की के सऊदी दूतावास में उनकी हत्या कर दी गई। ऐसी कोशिश की गई कि इस हत्या के बारे में दुनिया को ज्यादा कुछ मालूम न चले। लेकिन जब सच्चाई सामने आ गई और इसके पीछे सऊदी शहजादे की भूमिका का भी पता चल गया, तब से वह झूठ बोलकर इस हत्या में अपनी लिप्तता से इनकार करते आ रहे हैं। दरअसल इस हत्या ने अमेरिका को बेहद नाराज किया और सीआईए ने गहन जांच करके पता लगाया कि खशोगी की हत्या सऊदी शहजादे ने करवाई है।


इस तरह मोहम्मद बिन सलमान के चेहरे से नकाब आखिरकार उतर गया है। उन्होंने साबित कर दिया है कि सऊदी राजशाही की प्रथा के अनुरूप वह भी लोकतंत्र और जनता के अधिकार में विश्वास नहीं करते। सऊदी अरब में अब भी अपराधियों को दंड देने के नाम पर सार्वजनिक तौर पर सिर काट लेने की बर्बर प्रथा मौजूद है। खुद सऊदी शहजादे उसी बर्बरता में यकीन करते हैं। तभी तो उन्होंने खशोगी की हत्या के लिए पंद्रह सरकारी हत्यारों को रियाद से तुर्की भेजा था। जो व्यक्ति अपने विरोधी की इस बर्बरता से हत्या करवा सकता है, जिसका मानवाधिकार के प्रति थोड़ा भी विश्वास नहीं है, वह भला महिलाओं को क्या अधिकार देगा?


लिहाजा यह मानने का कारण है कि सऊदी शहजादे ने महिलाओं को गाड़ी चलाने का अधिकार वैश्विक दबाव के तहत ही दिया है। अगर वह सचमुच सऊदी महिलाओं को बंधनों से मुक्त करने के अभिलाषी होते, तो उन्हें उनकी पसंद की पोशाक पहनने का अधिकार देते, उन्हें बगैर किसी पुरुष अभिभावक के घर से बाहर कदम रखने का अधिकार देते। अफसोस की बात यह है कि जमाल खशोगी की हत्या पर रियाद से नाराज अमेरिका सऊदी महिलाओं की गुलामी के खिलाफ कुछ नहीं कहता। यानी सऊदी महिलाओं को गुलामी से मुक्ति की अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी होगी। पूरी दुनिया में पुरुषवर्चस्ववादी समाज के खिलाफ महिलाओं की लड़ाई वैसे ही कोई कम कठिन है। तिस पर मुस्लिम महिलाओं की यह लड़ाई तो और भी विकट है। 

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