मंदी से आहत बाजार अब उत्सव की ओर निगाहें लगाए बैठा है। दिवाली दस्तक दे रही है, ऐसे में ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक, एफएमसीजी कंपनियां ग्राहकों की प्रतीक्षा कर रही हैं। लगभग साल भर से मंदी झेलती कंपनियों के लिए यह त्योहार एक मौका है कि बड़ी मात्रा में खरीदारी हो और कारखानों के पहियों में तेजी आए।
देश के जीडीपी के विकास की दर में गिरावट का यह प्रमुख कारण था कि खरीदारी घटती चली गई। महंगाई और उससे निपटने के लिए बढ़ाई गई ब्याज दरों ने ग्राहकों की जिंदगी कठिन बना दी, जिसका परिणाम बाजार को भुगतना पड़ा, जहां से ग्राहक दूर जाने लगे। मंदी ने कई उद्योगों की जान निकाल दी, कच्चे माल के बढ़ते दाम और महंगी मजदूरी ने उनकी हालत खराब कर दी। रही-सही कसर मांग की कमी से पूरी हो गई।
नतीजतन कंपनियों का विकास बंद हो गया। अब इसका सबसे बड़ा असर रोजगार पर पड़ रहा है। उन कंपनियों के लिए तो मुसीबत और बड़ी रही, जो विदेशों से आयातित माल पर निर्भर हैं, क्योंकि रुपये का बेहिसाब अवमूल्यन हुआ। सरकार और रिजर्व बैंक के भी छक्के छूट गए।
रिजर्व बैंक के पिछले गवर्नर सुब्बा राव के पास ले-देकर एक हथियार था-रुपये की उपलब्धता को कठिन बना देना, सो उन्होंने वैसा ही किया था। तरलता संकट से जूझ रही कंपनियों के लिए वह दोहरी मार थी। पिछले गवर्नर ने महंगाई रोकने के नाम पर जो किताबी कदम उठाए, वे भारतीय अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचाते रहे। इतिहास में किसी भी देश में पंद्रह महीनों में तेरह बार ब्याज दरें नहीं बढ़ी होंगी। उसका खामियाजा पूरे देश ने भुगता।
भारत की प्रगति में उसके 35 करोड़ मध्यवर्गीय जनता का बड़ा योगदान रहा है। इस वर्ग ने अर्थव्यवस्था में चमक बिखेरी। उसकी खरीदारी और अमीर दिखने-बनने की महत्वाकांक्षा ने भारत की ओर सारी दुनिया की कंपनियों को खींचा। कंज्यूमर गुड्स, टेक्सटाइल, लग्जरी प्रॉडक्ट्स, ऑटोमोबाइल सभी ने यहां अच्छा कारोबार किया, जिससे सरकार का खजाना तो भरा ही, विकास के पहिये भी तेज हुए। इसी ने विकास दर को नौ प्रतिशत तक पहुंचाया और चीन के बाद भारत दुनिया में सबसे तेज गति से तरक्की करने वाला देश बन गया।
लेकिन पिछले कुछ समय से हालात बदल गए हैं। देश का मध्यवर्ग सिकुड़ता जा रहा है। महंगाई, करों की मार, बढ़ी हुई किस्त और मकानों के बढ़ते किरायों ने उसकी इच्छाओं पर अंकुश लगा दिया। सर्वे रिपोर्ट भी कह रही है कि दिल्ली-एनसीआर, जो देश का सबसे बड़ा बाजार है, इस बार तेजी नहीं दिखा पाएगा। इस बार यहां के लोग अपने खर्चों में 40 प्रतिशत की कटौती करेंगे। इसका असर कंपनियों पर काफी पड़ेगा, क्योंकि पिछली दिवाली से इस दिवाली तक सभी तरह के सामान की कीमतों में काफी इजाफा हो चुका है। जो सोना पिछले साल 22,000 रुपये प्रति 10 ग्राम था, वह बढ़कर 30,000 रुपये हो गया है।
इसके बावजूद बेहतर मानसून, सरकारी कर्मचारियों के वेतन में बढ़ोतरी और रेलवे सहित कई कंपनियों के कर्मचारियों को बोनस मिलने से बाजार में खरीदार बड़ी संख्या में उतरेंगे। सरकार की तरफ से तो कोई ऐसा कदम उठता नहीं दिख रहा है, जिससे बाज़ार में तेजी आएगी। लेकिन कुछ बैंकों ने ब्याज दरें घटाकर बड़ा कदम उठाया है। इससे ग्राहकों में खरीदारी की इच्छा जगती दिख रही है।
ऑटो इंडस्ट्री, जिस पर इस मंदी की सबसे ज्यादा मार पड़ी है, पिछले दो महीनों से थोड़ा जगता दिख रहा है। उम्मीद है कि त्योहारी सीजन में वाहनों की मांग बढ़ेगी। यह जरूरी भी है, क्योंकि इस उद्योग ने बड़े पैमाने पर लोगों को रोजगार दिया और देश की आर्थिक स्थिति सुधारी है। लेकिन ब्याज दरों में अभूतपूर्व बढ़ोतरी ने इस उद्योग को जबर्दस्त धक्का पहुंचाया। रही-सही कसर कच्चे माल और पेट्रोल की कीमतों ने पूरी कर दी। पेट्रोल के दाम तो अभी घटे नहीं हैं, पर सस्ती दरों पर कर्ज मिलने से लोगों के लिए गाड़ियां खरीदना संभव हो जाएगा।
सरकारी बैंकों ने खरीदारी को बढ़ावा देने के लिए न केवल कार, फ्रिज, टीवी लोन के ब्याज में कटौती की है, बल्कि सैलरी अकाउंट वालों को कंज्यूमर गुड्स और दोपहिये खरीदने के लिए अग्रिम देने की भी व्यवस्था की है। यह एक बड़ा कदम है, जिसके सकारात्मक परिणाम आने की उम्मीद है। सरकार ने रिजर्व बैंक के साथ मिलकर बैंकों को 14,000 करोड़ रुपये की अतिरिक्त पूंजी देने की भी व्यवस्था की है। इससे तरलता बढ़ेगी और बैंक आसानी से कर्ज दे सकेंगे, जो समय की मांग है।
रिजर्व बैंक के नए गवर्नर रघुराम राजन का रवैया उदारवादी है और वह बाजार को साथ लेकर चलने में विश्वास करते हैं। उन्होंने तीन वर्षों की जो योजना बनाई है, उससे उन्हें उम्मीद है कि देश में अरबों डॉलर का निवेश होगा। इसके अलावा वह बचत को बढ़ावा देने की बात कह रहे हैं, ताकि देश में फिर से वित्तीय स्थिरता आए। हम भारतीयों की बचत की आदत ने ही 2009 में हमें संकट से उबारा था। अब आगे भी यही काम आएगा।
बचत करने वालों को उनके बचत का अगर सही प्रतिदान मिले, तो वे उत्साहित होते हैं और उन्हें आगे बचत करने तथा बचे हुए धन से खरीदारी करने में आसानी होती है। मानसून के बढ़िया होने और अनाज के रिकॉर्ड उत्पादन के कारण यह उम्मीद की जा रही है कि इस दिवाली में ग्रामीण इलाकों से अच्छी मांग आएगी। इससे इलेक्ट्रॉनिक सामान खासकर टीवी, मोबाइल दोपहिये वगैरह की बिक्री बढ़ सकती है। त्योहारों का यह मौसम हमारी अर्थव्यवस्था को नई ऊर्जा दे सकता है और यह बेहद जरूरी भी है।