बाजार का असीम विस्तार भारतीय समाज में हो रहा है। बाजार एक प्रक्रिया के रूप में एवं एक प्रकृति के रूप में हमारे घर-घर तक पहुंच गया है। यह बाजार लोभ, लालच का असीम विस्तार कर रहा है। ऐसे बाजार में कवि और कविता कहां है? इसे आज समझने की जरूरत है। हिंदी के अत्यंत महत्वपूर्ण कवि एवं विचारक मुक्तिबोध के शब्दों में ‘कविता एक प्रकार की सभ्यता समीक्षा है।’ इसकी मूल शक्ति है- इसमें निहित आलोचना चेतना! प्रतीकों में कहें तो कविता के तीक्ष्ण दांत होते हैं, जो माया, लोभ, लालच एवं भ्रम को काटते रहते हैं। एक तरफ बाजार प्रलोभनों के माध्यम से माया एवं लालच सृजित करती है, दूसरी तरफ कविता लोभ एवं माया काटने का काम करती है। इसीलिए कबीर, रविदास, गोरखनाथ जैसे हमारे संत ने बाजार की गहन आलोचना अपनी कविताओं में प्रस्तुत की है। इनकी कल्पनाओं में मायापुर नगरिया में लगले बजरिया, जहां हीरा, रतन बिकाय का जिक्र बार-बार आता है। बाजार की आलोचना भारतीय कविता का एक मूल उत्स रहा है।
लेकिन रोचक यह है कि बाजार को भी कविता चाहिए। बाजार को विज्ञापन के लिए प्रतीक चाहिए। विज्ञापन की शक्ति प्रतीक शक्ति से जुटकर कई गुना ज्यादा प्रभावी हो जाती है। प्रतीक कविता का मूल उत्स है। ऐसे में बाजार को एक दंतहीन, नखविहीन कविता चाहिए, जिसे वह अपने में एप्रोप्रियट कर सके। ऐसे प्रतीक, जो हममें लालच तो जगाए, परंतु चेतना न जगाए। जो हमें उपभोग के नशे से भर दे, परंतु हमें लालच से मुक्त न करे। पैसे की शक्ति, सजावट एवं इलेक्ट्रॉनिक चैनल्स के कविमंच एवं अन्य लोकप्रिय मंच ऐसे सार्वजनिक वृत्त बनाने में मदद करते हैं, जिसमें कविता के नख-दंत अपने-आप क्षरित होते जाते हैं। इसमें बाजार की शक्तियां प्रायोजक के रूप में जुड़ जाती है। प्राक्-आधुनिक भारत में सामंत, राजा एवं धनवान व्यापारी कई बार कविता के पैट्रन (संरक्षक) बनकर उभरते थे, जिसके कारण कविता का रूप, रंग, गुण बदल जाता था। आधुनिक काल में जनतांत्रिक सत्ता के विकास के साथ जनता कविता के पैट्रन के रूप में उभरी, जिससे कविता में आलोचना भाव प्रखर हुआ। किंतु बाजार के आने बाद एक नई स्थिति पैदा हुई।
1990 के बाद नवउदारवादी अर्थव्यवस्था में बाजार कविता के पैट्रन बनकर उभरने लगी। इसने न केवल अप्रत्यक्ष रूप से ‘कविता’ को प्रभावित किया, वरन प्रत्यक्ष ढंग से एक नख-दंत विहीन चमक-दमक से भरी कविता को सृजित एवं निर्मित करना प्रारंभ किया। इस बाजार ने कविता को कॉमोडिटी में बदल दिया। ऐसे में लगता है कि हमारे समाज एवं जीवन में कविता के लिए जगह बढ़ रही है, परंतु यदि सोचकर देखें, तो इस रूप में कविता ने फॉर्म तो प्राप्त किए, परंतु अपनी विषयवस्तु धीरे-धीरे खोती गई। हालांकि छोटी पत्रिकाओं, साहित्यिक गोष्ठियों एवं हिंदी के कुछ गिने-चुने प्रकाशकों के कारण वह कविता अब भी जी रही है, जिसकी समाज के दबे-कुचले लोगों को जरूरत है। कविता की आलोचना शक्ति ही आक्रामक लोभ-लालच के दौर में बाजार शक्ति की माया को भेद सकती है। हमारी कविता का यही भाव बोध इन्हें कविता बनाए रखेंगी, एवं हमें मानुष बनाए रखेंगी।
ऐसी स्थिति ही हमें फिर से निराला, मुक्तिबोध, रघुबीर सहाय, केदारनाथ सिंह, अरुण कमल एवं राजेश जोशी को बार-बार पढ़ने-गुनने की जरूरत पैदा करेगी। बाजार में आज कविता धन एवं शक्ति के चक्रव्यूह में घिर गई है। देखना है कि हमारा साहित्य जगत, हमारी जनता किस प्रकार इस प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष, सत्य एवं मिथकीय, यथार्थ एवं मायापूर्ण बाजार जगत में कविता को बचाए रख पाती है!