धीरे-धीरे उनकी गाड़ी चल पड़ी। एक्टर तो अच्छे थे ही, हैंडसम भी। शुरुआती फिल्में कुछ चलीं, कुछ नहीं, पर उनका काम सराहा गया और फिल्मों की लाइन लग गई- ‘हिमालय की गोद में’, ‘वो कौन थी’, ‘गुमराह’, ‘दो बदन’ आदि। जब स्टारडम की सीमा तक पहुंच गए, तब उनके मन ने चाहा कि कुछ और भी करूं और आई उनकी घोस्ट निर्देशित फिल्म ‘शहीद’, जो क्रांतिकारी भगत सिंह पर बनी थी। फिल्म की खूब सराहना हुई। इस फिल्म में उन्होंने प्राण को अलग हटकर पहचान दी। यहीं से शुरू हुई उनकी और प्रेम चोपड़ा की दोस्ती। वह मनोज जी की हर फिल्म में होते और लगभग 19 फिल्में दोनों ने साथ में कीं।
मनोज कुमार ने जब दिल्ली में प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री को ‘शहीद’ दिखाई तो शास्त्री जी ने उन्हें राय दी कि एक फिल्म ‘जय जवान जय किसान’ के नारे पर बनाएं और वहीं से शुरुआत हुई ‘उपकार’ की। फिल्म प्रदर्शित हुई और खूब कामयाब हुई। प्राण के कॅरिअर ने नया मोड़ लिया। वह खलनायक न होकर कैरेक्टर आर्टिस्ट हो गए। राज कपूर ने फिल्म देखने के बाद मनोज जी को बधाई दी और कहा, “मुझे तुम पर गर्व है और आगे चलकर इंडस्ट्री में मेरी जगह तुम लोगे।”
यहां से मनोज कुमार को फिल्मों में एक नया स्थान मिला- एक्टर, राइटर, प्रोड्यूसर, डायरेक्टर और वह जो भी फिल्म बनाते, सुपरहिट होती- ‘रोटी कपड़ा और मकान’, ‘शोर’, ‘क्रांति’ आदि, पर उसके बाद उनकी अपनी बनाई फिल्मों का जादू दर्शकों पर न चल सका।
मैं मनोज जी का बड़ा फैन रहा हूं और 70 के दशक में जब मैं दिल्ली से मुंबई आया तो नटराज स्टूडियो में उनसे मिलने गया। उनकी तस्वीरें लीं और इच्छा जाहिर की कि मैं मुंबई लौटना चाहता हूं। प्रेम चोपड़ा, जो मुझे पहले से जानते थे, ने मेरी सिफारिश की। मनोज जी ने कहा, “मैं अगली फिल्म के सिलसिले में दिल्ली में रहूंगा। फोन करके आ जाना। रुकता तो हमेशा अशोका होटल में हूं, पर वहां नहीं तो ओबेरॉय में चेक करना।” वहीं अगली मुलाकात हुई। उनके पास ही बैठे थे एक अंग्रेज टॉम आल्टर, जिन्होंने ‘क्रांति’ में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मुझे काम तो नहीं मिला, पर मेरी तस्वीरें साप्ताहिक हिंदुस्तान में छप गईं।
उस वक्त मनोज कुमार की अपनी बनाई फिल्में बेशक न चल रही हों, पर 1975-76 में जब राजेश खन्ना और अमिताभ बच्चन का राज था, तब भी मनोज जी की फिल्में ‘संन्यासी’ और ‘दस नम्बरी’ सुपरहिट रहीं।
शायद चार साल पहले मैं उनके एक मित्र राज ग्रोवर के साथ उनसे मिलने उनके घर गया। वह एक तरफ सिर करके लेटे-लेटे हमसे बातें करते रहे। राज खोसला की उन्होंने अल्फ्रेड हिचकॉक से तुलना की। जब चाय आई तो मैंने पूछा, “मनोज जी, आपसे ऐसे ही बात होगी या आप बैठेंगे?”
हंसते हुए उन्होंने कहा, “मैं बैठता हूं...” और बड़ी-सी तकिया गोद में लेकर बातें करने लगे। घने बाल डाई किए हुए, चेहरे पर मनोज कुमार एक्टर का लुक। थोड़ी देर में मूड में आ गए और ढेर सारी फिल्मों की बातें कीं। यह भी बताया कि ‘उपकार’ के लिए राजेश खन्ना को साइन किया था, जो रोल बाद में प्रेम चोपड़ा को मिला। अमिताभ बच्चन को जब ‘रोटी कपड़ा और मकान’ के लिए साइन किया, तब वह इतने सक्सेसफुल नहीं थे।
शशि कपूर की खूब बातें कीं- “हमारी बहुत अच्छी दोस्ती थी और है भी। मैंने उनसे वादा किया था कि जब फिल्म बनाऊंगा, तुम्हे लूंगा।”
मैंने पूछा, “अब कोई फिल्म बनाने का इरादा नहीं है? आप मिस नहीं करते?” वह बोले, “मन तो करता है। कई बड़े स्टूडियोज वाले भी आकर मिलकर गए। उन्होंने पूछा, आपके पास कौन-कौन से एक्टर हैं? मैंने कहा, राम मोहन और प्रेम चोपड़ा। फिर लौटकर नहीं आए।”