उत्तर प्रदेश में भाजपा की प्रचंड जीत में देश के राजनीतिक दलों के लिए कई सबक हैं। मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा चालीस से कम उम्र का है, जो विकास और रोजगार चाहता है। उन्हें न जातिगत राजनीति चाहिए, न लालू-मुलायम ब्रांड समाजवाद और न ही धार्मिक संघर्ष। ऐसा प्रतीत होता है कि भारी संख्या में महिलाओं ने प्रधानमंत्री मोदी के नाम पर वोट किया है, क्योंकि वे मानती हैं कि वह सपा के गुंडाराज से न केवल उनकी सुरक्षा कर सकते हैं, बल्कि उन्हें सम्मान दिलाने के साथ आर्थिक अवसर भी प्रदान कर सकते हैं।
इसके अलावा हिंदू मतों का ध्रुवीकरण भी हुआ है, क्योंकि बहुसंख्यक होने के बावजूद उन्हें महसूस होता है कि कुछ दलों की मुस्लिम तुष्टीकरण की नीति के चलते अपने ही देश में उनकी उपेक्षा होती है। उनकी धर्मनिरपेक्षता की झूठी कहानी को अब देश भर में हिंदू-विरोध के रूप में देखा जा रहा है। यह एक ऐसा तथ्य है, जिसे 2014 में कांग्रेस की विफलता पर अपनी रिपोर्ट में एके एंटनी ने भी स्वीकार किया था। कुल मिलाकर यह जनादेश एक ताजा परिवर्तन, राज्य की दुर्दशा पर नियंत्रण पाने और विकास पर आधारित एक नई सरकार की खोज को लेकर है।
देश के सभी राजनीतिक दलों के लिए इसका संदेश स्पष्ट है। यदि आप राजनीतिक रूप से प्रासंगिक बने रहना चाहते हैं, तो युवाओं के साथ नागरिकों की आकांक्षाओं के आधार पर एक नई कहानी रचिए। जाति, समाजवाद, अल्पसंख्यक नीतियां, छद्म धर्मनिरपेक्षता, हिंदू-विरोधी विष वमन, अल्पसंख्यक तुष्टीकरण और बांटो और राज करो का सामाजिक समीकरण अब काम नहीं करने वाला। वाम दल पहले ही इतिहास के कूड़ेदान में जा चुके हैं, कांग्रेस अपनी ही दुनिया में चरम पतन की स्थिति में है और क्षेत्रीय दल अपनी शक्ति फिर से हासिल करने के लिए नए विचारों हेतु हाथ-पांव मार रहे हैं। भारत के युवा मतदाता रोजगार और विकास चाहते हैं। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव नजदीक ही हैं और जब तक राजनीतिक दल अपना रवैया नहीं बदलते, उनका भविष्य अंधकारमय है।
सपा-कांग्रेस गठबंधन ने जाति, मुस्लिम वोट और धर्मनिरपेक्षता के प्रति उनका प्रेम, खराब प्रशासन को चमकाने, सकल भ्रष्टाचार और तुष्टीकरण की पुरानी नीतियों के आधार पर चुनाव लड़ा। उसने अखिलेश एवं राहुल को नए युवा नेता के रूप में पेश किया और संतुलन बनाने के लिए वह डिंपल और प्रियंका को ले आया, लेकिन मतदाता उनकी नेकनीयती से आश्वस्त नहीं हुए। मायावती ने भी अपने प्रतिबद्ध मतदाताओं को रोके रखने के लिए वही पुराना दलित कार्ड खेला, लेकिन नए मतदाताओं को वह आकर्षित नहीं कर पाईं। अतीत पर भविष्य ने विजय पाई, क्योंकि मतदाता अतीत की विफलताओं से तंग आ गए थे। भाजपा ने उनमें चमकीले भविष्य की उम्मीद जगाई और उम्मीद आशाजनक रूप से जीत गई।
राष्ट्रीय मीडिया ने विमुद्रीकरण की नीति को ऐसे पेश किया, मानो लोग इससे बहुत नाराज और हताश हैं, जबकि गरीबों ने इसे धनी वर्ग, कालाबाजारी और भ्रष्ट लोगों के एक झटका माना। बेशक गरीबों को इससे परेशानी हुई, पर गरीब इससे खुश थे कि भ्रष्ट लोगों को ज्यादा परेशानी हुई। उनकी नजर में मोदी चैंपियन थे। गरीबी रेखा से नीचे की महिलाओं के लिए मुफ्त रसोई गैस की योजना ने महिलाओं को काफी प्रभावित किया। प्रधानमंत्री मोदी उत्तर प्रदेश में अपने व्यक्तिगत करिश्मा और समावेशी विकास के संदेश के कारण सफल हुए। उन्होंने भारी भीड़ को आकर्षित किया, जिसने उन्हें 312 सीटें दीं। ऐसा पिछले चालीस वर्षों में नहीं देखा गया था।
यह मोदी की निजी जीत है, जिसने बिहार के झटके से उन्हें उबारा। लगता है कि बिहार जातिगत राजनीति में उलझा रह गया, जबकि उत्तर प्रदेश 'न्यू इंडिया' के निर्माण के लिए जातिगत निष्ठा से उबर गया है। हो सकता है कि यह आशावादी सोच हो, लेकिन पहले लोकसभा और अब विधानसभा चुनाव का जनादेश और कुछ नहीं, सतत परिवर्तन के लिए है।
जीत के बाद प्रधानमंत्री ने 'न्यू इंडिया' के निर्माण की बात की, जो उच्च आकांक्षाओं पर बनेगा, जहां युवा, महिला और गरीबों को बदलाव, रोजगार और विकास की उम्मीद है। देश की 17 फीसदी आबादी वाला उत्तर प्रदेश निश्चित रूप से हमारी आर्थिक और राजनीतिक ताकत है। राजनीति के क्षेत्र में केंद्र और राज्य में भाजपा को स्थापित कर उसने अपनी ताकत दिखा दी है। आर्थिक मामले में पिछले दस वर्षों में उत्तर प्रदेश की विकास दर निम्न रही है। इसे अब व्यापक दृष्टि, निर्णायक नेतृत्व के साथ एक नए आर्थिक एजेंडे की जरूरत है, ताकि यह देश के विकास का वाहक बन सके।
प्रधानमंत्री मोदी के लिए यह निश्चित रूप से पूर्ण विश्वास का वोट है, जो संभवतः उन्हें और ज्यादा क्रांतिकारी सुधारों के लिए प्रोत्साहित करेगा। नई सरकार की प्राथमिकताएं स्पष्ट हैं। शांति और न्याय इसमें सबसे ऊपर रहेगा। गुंडाराज को खत्म कर कानून के राज की बहाली होनी चाहिए, ताकि महिलाएं और गरीब सुरक्षित महसूस कर सकें।
मुसलमानों को नए आर्थिक अवसरों में भागीदारी की जरूरत है। प्रदेश के साठ से ज्यादा जिलों में गांवों को शहरों से जोड़ने के लिए बेहतर सड़क नेटवर्क की जरूरत है। यहां हर घर में बिजली, पेयजल, शौचालय चाहिए, ताकि जीवन स्तर में सुधार आए। सभी कार्यक्रमों के लिए एनडीए प्रतिबद्ध है। युवाओं में पचास फीसदी बेरोजगारी है, जिन्हें रोजगार देने के लिए विशेष कार्यक्रम चाहिए। पूर्वी उत्तर प्रदेश गरीबी, पानी की कमी, शहरीकरण के अभाव और उपेक्षा का शिकार है। उत्तर प्रदेश चूंकि बड़ा राज्य है, इसलिए यह अप्रभावी शासन से ग्रस्त है। विकास के लिए प्रदेश के प्रशासनिक बुनियादी ढांचे को व्यापक रूप से बढ़ाने की जरूरत है। देश के लिए मानव संसाधन की पूंजी बढ़ाने के लिए शिक्षा को प्रोत्साहन देने की जरूरत है। वास्तव में नई सरकार के सामने बड़ी चुनौती है। भारत तभी विकास करेगा, जब उत्तर प्रदेश और बिहार शेष राज्यों से तेज गति से विकास करेगा।