अधिकारी इस बात पर हैरान हैं कि मंत्री जी को पूरी जानकारी नहीं है, वरना वह यह बात कतई नहीं कहते कि प्रदेश में ऐसी सड़कें बनाई जाएंगी कि पेट का पानी भी नहीं हिलेगा। ऐसा तो आज भी हो रहा है। एक तो पूरे रास्तों में पानी की गुंजाइश ही नहीं रहने दी गई है, तो पेट में पानी हिलेगा कैसे? पानी को तरस रहा यात्री सड़क के गड्ढों में इतना गहरे उतर जाता है कि भूल ही जाता है कि उसके होंठ सूख रहे हैं, तो उसकी वजह यह है कि उसे पानी नजर ही नहीं आ रहा। आदमी या तो गड्ढे देख ले या पानी! अगर पानी पीने लगा, तो चार घंटे का रास्ता सुबह से शाम तक ही पूरा हो सकेगा।
अधिकारियों की नाराजगी वाजिब है कि जब पानी को ही तरसते रहते हैं सड़क पर चलने वाले, तो पेट में हिलेगा क्या। अच्छी या बेहतर सड़क की बात तो अधिकारी फूटे मुंह से भी नहीं करते। जो काम अपने बस का है ही नहीं, उधर हाथ डालना ही क्यों? रही बात पेट का पानी न हिलने की, तो इस दिशा में बहुत पहले काम शुरू कर दिया गया है। कहने को रास्ते में हर पांच किलोमीटर पर एक हैंडपंप है, मगर मजाल है कि वहां से एक बूंद पानी भी निकलता हो। जब तक सड़कें मुकम्मल नहीं होती हैं, इतनी तैयारी तो की ही जा सकती है कि पानी पेट तक तो क्या, मुंह तक भी नहीं पहुंचे।
बीच में कुछ हैंडपंपों में अपने आप पानी आने लगा था, हैंडल टूटे तो जमाना हो गया था। अब आप तो जानते हैं कि पानी बचाने की जिम्मेदारी भी सरकारी अधिकारियों के कंधों पर ही होती है। तो राष्ट्रीय अभियान का हिस्सा बनते हुए उन बहते हुए हैंडपंपों को बगैर हिचक के बंद कर दिया गया।
मीटिंग में भी यही तय पाया गया कि पेट का पानी, हो सकता है, उन स्वावलंबी हैंडपंपों की वजह से हिला होगा। वरना सरकार तो चाक-चौबंद है। लोगों को गड्ढों से निकलने की मोहलत नहीं देती कि रुककर गला तर कर लें। हां, रास्ते में सरकारी शराब के ठेके जरूर चालू हैं। उनकी वजह से भी पेट में शराब हिल जाती होगी, पानी की तो कतई गुंजाइश नहीं है। हां, ठेकेदार बदमाशी कर सकते हैं कि शराब में पानी इतना मिला देते हों कि प्यासे लोग उससे ही काम चला लेते हों। अधिकारी कहां-कहां हाथ लगाएं। यही वजह रही होगी कि मंत्री जी को शिकायत मिली होगी कि प्रदेश की सड़कों पर पेट का पानी हिलता है। वरना तो कोई वजह नहीं है ऐसी!