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कुपोषण की जड़ कहीं और

Wed, 16 Jul 2014 01:24 AM IST
गार्डनर हैरिस
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एक वर्ष के विवेक की आंखों में मां काजल लगाना नहीं भूलती, ताकि उसे किसी की बुरी नजर न लगे। मगर, बिहार के शिवहर जिले के एक गांव में रहने वाले इस परिवार के लाख जतन करने के बावजूद उसे कुपोषण का शिकार होने से नहीं बचाया जा सका है। पूरे भारत में कुपोषण अभिशाप से कम नहीं है। बेशक, विवेक का परिवार मिट्टी की झोंपड़ी में रहता है, लेकिन मां उसे अपना दूध पिलाना नहीं भूलती। घर में छह बकरियां हैं। भैंस भी है। घर में गेहूं की ढेरी और आलू का भंडार भी दिख जाता है। यह परिवार जिस राज्य में रहता है, पिछले कुछ वर्षों में उसने दूसरे राज्यों की तुलना में कहीं तेजी से आर्थिक तरक्की की है। नेपाल की सीमा से लगे इस गांव में हरियाली दिखाई देती है। विवेक के पैदा होने से पहले घर में बिजली भी आ गई।
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इतना सब होने के बावजूद आखिर विवेक कुपोषित क्यों है? यह सवाल पूरे भारत के बच्चों के बारे में पूछा जा सकता है। आर्थिक तरक्की के बावजूद कुपोषण को कम करने में किसी तरह की मदद नहीं मिली है। नतीजतन, बड़ी संख्या में बच्चे कुपोषण का शिकार हैं। वे शारीरिक और मानसिक रूप से कमजोर हैं और पूरी जिंदगी इससे उबर नहीं पाएंगे। हालांकि, वैज्ञानिक शोध से जुड़े एक संगठन का कहना है कि विवेक और उसके जैसे दुनियाभर के पांच वर्ष से कम उम्र के कुपोषण के शिकार 16.2  करोड़ बच्चों की यह हालत अपर्याप्त भोजन की वजह से नहीं, बल्कि अस्वच्छता के कारण हुई है। दरअसल गांव के दूसरे परिवारों की तरह विवेक के घर पर भी शौचालय नहीं है। यह परिवार जिस जिले में रहता है, वह खुले में शौच जाने के मामले में सबसे ऊपर है। इससे बच्चे ऐसे बैक्टरिया के संपर्क में आ जाते हैं, जो उन्हें अक्सर बीमार कर देता है। इससे वे जरूरी वजन हासिल ही नहीं कर पाते, फिर चाहे कितना भी क्यों न खाएं। जॉन्स हॉपकिंस ब्लूमबर्ग स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ में ह्यूमन न्यूट्रीशन के प्रोफेसर ज्यां हम्फ्रे कहते हैं, इन बच्चों के शरीर में ऊर्जा और पौष्टिक तत्व शारीरिक वृद्धि और उनके मानसिक विकास के बजाय संक्रमण से लड़ने में खर्च हो जाते हैं। शुरू के दो वर्षों में जब यह हो रहा होता है, बच्चे की वृद्धि अवरुद्ध हो जाती है। चिंता की बात यह है कि शारीरिक और मानसिक विकास में यह रुकावट स्थायी होती है।

दो वर्ष पूर्व यूनिसेफ, विश्व स्वास्थ्य संगठन और विश्व बैंक ने बच्चों के कुपोषण पर एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट जारी की थी, जो पूरी तरह से भोजन की कमी पर केंद्रित थी। इसमें स्वच्छता का जिक्र नहीं था। मगर अब यूनिसेफ के अधिकारी और अनेक बड़े दानदाता संगठन स्वीकार कर रहे हैं कि अस्वच्छता आधी दुनिया में कुपोषण की सबसे बड़ी वजह हो सकती है। यूनिसेफ इंडिया में पानी, स्वच्छता और स्वास्थ्य की प्रमुख सुई कोट्स कहती हैं, हमें अभी एहसास हुआ है कि स्वच्छता और कुपोषण के बीच संबंध हो सकता है। अभी यह सिर्फ अनुमान ही है, लेकिन व्यापक प्रभाव के कारण यह अहम है। पौष्टिकता और दान से जुड़े अनेक संगठन इस शोध को सही बता रहे हैं, क्योंकि इसने एक बड़ी गुत्थी को सुलझा दिया है कि आखिर भारतीय बच्चे अपेक्षाकृत गरीब उप सहारा अफ्रीका के बच्चों की तुलना में अधिक कुपोषित क्यों होते हैं?
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वास्तव में भारत में पलने वाले किसी बच्चे के कुपोषित होने की आशंकाएं, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो, जिंब्बावे या सोमालिया जैसे दुनिया के सबसे गरीब देशों की तुलना में अधिक होगी। पांच वर्ष की उम्र तक के 6.5 करोड़ भारतीय बच्चे कुपोषण का शिकार हैं, जिनमें से एक तिहाई समृद्ध परिवारों के हैं। संपत्ति और कुपोषण के बीच यह असंबद्धता इस कदर है कि अर्थशास्त्रियों का निष्कर्ष है कि आर्थिक विकास ने कुपोषण कम करने में कोई मदद नहीं की।

भारत की आधी आबादी यानी तकरीबन 62 करोड़ लोग अपने घरों का कूड़ा बाहर फेंकते हैं। पिछले दशक में इसमें कुछ गिरावट आई है, पर जनगणना के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि जनसंख्या में तेजी से होने वाली वृद्धि के कारण पहले से कहीं अधिक भारतीय अब मानव अपशिष्ट के संपर्क में आते हैं। मसलन, शिवहर को ही लीजिए। वहां 2001 से 2011 के दौरान ऐसे घरों की संख्या 87 फीसदी से घटकर 80 फीसदो हो गई, जहां शौचालय नहीं थे। मगर, इसी अवधि में हुई जनसंख्या वृद्धि के कारण पहले की तुलना में दोगुना लोग मानव अपशिष्ट के संपर्क में आने लगे। पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया के वाइस प्रेसिडेंट रामन्नन लक्ष्मीनारायण कहते हैं कि भारत में कुपोषण की समस्या किसी भी देश के इतिहास में मानवीय क्षमता के सर्वाधिक नुकसान को प्रदर्शित करती है। पूरी दुनिया में एड्स और एचआईवी से प्रभावित लोगों की तुलना में अकेले भारत में कुपोषण से 20 गुना लोग प्रभावित हैं। ग्रामीण इलाकों में महिलाओं को शौच जाने के लिए अंधेरा होने का इंतजार करना पड़ता है। खुले में शौच भारत की एक बड़ी समस्या है। खुद महात्मा गांधी ने इसके खिलाफ अभियान चलाया। उन्होंने लिखा भी कि हमारी कई बीमारियों की जड़ खराब शौचालय और खुले में शौच जाने की हमारी खराब आदत में निहित है।

किसी भी भारतीय शहर में कोई वृहत कचरा प्रबंधन प्रणाली नहीं है। नतीजतन भारत की अधिकांश नदियां खुले नाले में तब्दील हो गई हैं। सबसे पुराने और पवित्र शहर वाराणसी में मानव अपशिष्ट हाल के चुनाव में मुद्दा ही बन गया था। गंगा सेवा अभियान के ट्रस्टी रमेश चोपड़ा कहते हैं कि शहर के सीवेज संयंत्र सिर्फ 20 फीसदी गंदगी का ट्रीटमेंट कर पाते हैं। जाहिर है, बाकी गंदगी गंगा में या फिर खुले गड्ढों और तालाबों में बहा दी जाती है। शहर के बड़े हिस्से में गंगा से ही पानी की आपूर्ति की जाती है। वास्तव में आधे भारतीय घरों में प्रदूषित पानी की आपूर्ति होती है। लक्ष्मीनारायण कहते हैं, भारत की समस्या सिर्फ शौचालयों तक सीमित नहीं है।
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