इसमें हैरानी नहीं होनी चाहिए कि नोटबंदी के फैसले के बाद सोशल मीडिया पर जिस काल्पनिक सोनम गुप्ता की बेवफाई के जमकर चर्चे हो रहे थे, उस सोनम ने हाल में गूगल इंडिया की टॉप-10 पर्सनैलिटी लिस्ट में तीसरे नंबर पर जगह बनाई है। वैसे तो इस काल्पनिक किरदार का नाम काफी पहले दस रुपये के नोट पर नजर आया था और लोगों के जेहन में इसके अटके रहने की एकमात्र वजह यह थी कि नोट पर लिखा था, ‘सोनम गुप्ता बेवफा है’। नोटबंदी के बाद सोनम गुप्ता एक बार फिर अपनी पुरानी बेवफाई के साथ कई और नोटों पर दिखाई दी। इसे लेकर चुटकुले गढ़े गए, वीडियो बनाए गए और इंटरनेट पर इसकी जमकर खोज हुई कि आखिर यह सोनम गुप्ता कौन है, जो अंतत: बेवफा निकली?
हो सकता है कि सोनम गुप्ता नामक कोई स्त्री सच में बेवफा निकली हो या हो सकता है कि यह महज एकतरफा प्यार का मामला हो। पर जरा सोचिए कि अगर सोनम की जगह मामला किसी पुरुष की वेवफाई का होता, तो क्या उसकी भी इसी तरह चर्चा होती? क्या उसे भी इंटरनेट पर सर्च किया जाता, उस पर चुटकुले गढ़े जाते? यह मामला असल में बेवफाई के मर्दवाद का है। ज्यादातर मर्दवादी समाजों में पुरुष के बेवफा निकल जाने, एक या ज्यादा महिलाओं से प्यार में धोखा करने को सामान्य माना जाता है, लेकिन अगर एक स्त्री ऐसा करती है, तो उससे बदला लेने की नीयत से पूरा पुरुष समाज उस पर टूट पड़ता है।
बेवफाई के मर्दवाद की एक पोल पिछले साल तब खुली थी, जब शादी से बाहर पार्टनर ढूंढने में मदद करने वाली वेबसाइट ऐश्ले मैडिसन को एक हैकर समूह (द इंपैक्ट टीम) ने हैक कर लिया था। इस घटना का एक पक्ष यह था कि दुनिया के जिन 3.7 करोड़ लोगों की निजी जानकारी हैक कर ली गई थी, उनमें से ज्यादातर मर्द ही थे, जो अपनी शादी से बाहर कोई और रिश्ता खोज रहे थे। इस काम में भारत में सबसे अव्वल थे दिल्ली वाले। इसके बाद मुंबई, हैदराबाद, चेन्नई, कोलकाता, पुणे और बंगलूरू आदि शहरों के लोगों के नाम शामिल थे।
हैकरों द्वारा किए गए भंडाफोड़ के अतिरिक्त भी कई सर्वेक्षण यह साबित कर चुके हैं कि हमारा समाज जीवनसाथी से बेवफाई के मामले में पश्चिमी समाजों से होड़ ले रहा है और रिश्तों में ऐसी बेईमानी के मानकों पर पुरुष महिलाओं से काफी आगे हैं। रिश्तों में टूटन की वजह हमारी जिंदगी में भागदौड़ का बढ़ना हो सकता है। यह भी संभव है कि टीवी, मोबाइल, इंटरनेट ने हमें स्वाभाविक रिश्तों से विमुख करते हुए आभासी रिश्तों की तरफ मोड़ दिया है। पर इतना तय है कि स्त्री-पुरुष संबंधों में अब असंतोष की मात्रा कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है। अपने रिश्तों में खामियां निकालने के लिए लोगों को इन तकनीकी इंतजामों ने तुलना के कई माध्यम उपलब्ध करा दिए हैं, जिससे वे अपने साथी की अपूर्णताओं को नोटिस करने लगते हैं और नए साथी की तलाश करने लगते हैं। यह आकलन महिला और पुरुष- दोनों पर समान रूप से लागू होता है, पर हमारे समाज का विद्रूप यह है कि वह इसे सिर्फ महिलाओं के संदर्भ से जोड़ता है और जब भी मौका पड़ता है, स्त्री को बेवफा बताने से नहीं चूकता है।
अच्छा होगा कि किसी ‘सोनम गुप्ता’ को बेवफा बताने से पहले कोई ‘असंतुष्ट कुमार’ संबंधों में बरती खुद की ईमानदारी की भी जांच ले। बेहतर होगा कि रिश्तों में जितनी आजादी की मांग पुरुष अपने लिए कर रहे हैं, उतनी नहीं, तो थोड़ी-बहुत स्वतंत्रता लेने का हक अपनी पार्टनर को भी दें।