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चिंतन: नए कानून बनाना सही दिशा में एक कदम लेकिन अनसुलझे मुद्दों पर भी बात हो

प्रकाश सिंह
Updated Mon, 08 Jul 2024 06:26 AM IST

सार

औपनिवेशिक विरासत को खत्म करने और कानूनों को वर्तमान समय के अनुरूप बनाने का यह सही दिशा में उठाया गया एक ऐतिहासिक कदम है, जिसकी प्रशंसा होनी चाहिए, लेकिन कुछ मुद्दे ऐसे हैं, जो अब भी अनसुलझे हैं।
 
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आपराधिक कानून (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : iStoke


औपनिवेशिक विरासत को खत्म करना और कानूनों को वर्तमान समय के अनुरूप बनाने का यह ऐतिहासिक कदम प्रशंसनीय है, पर कुछ मुद्दे ऐसे हैं, जो अब भी अनसुलझे हैं। औपनिवेशिक काल के कानूनों में 1162 धाराएं थीं, जबकि नए कानूनों में 1059 धाराएं हैं। जाहिर है, अब कानून प्रवर्तन एजेंसियों को 2,221 धाराओं से जूझना होगा। बीएनएस जैसे मूल कानून को पहले दर्ज किए गए मामलों पर लागू नहीं किया जा सकता, इसलिए नए कानून के लागू होने से पहले के अपराधों को आईपीसी (भादंसं) के तहत निपटाया जाएगा, जबकि नए आपराधिक कानून लागू होने के बाद किए गए अपराधों को बीएनएस के तहत निपटाया जाएगा। हालांकि बीएनएसएस एवं बीएसए जैसे प्रक्रियागत कानूनों को पहले दर्ज किए गए मामलों पर लागू किया जा सकता है। ऐसे में न्यायालय में उन सभी मामलों में विवाद होने की आशंका है, जो नए कानून के लागू होने से पहले दर्ज किए गए थे, लेकिन उनमें नए प्रक्रियात्मक कानून को लागू किया जाएगा।


तीनों प्रमुख कानूनों में अलग-अलग राज्यों द्वारा अलग-अलग समय पर संशोधन किए गए हैं। मसलन, सीआरपीसी की धारा 357 (मुआवजा देने के आदेश से संबंधित) में आंध्र प्रदेश, बिहार, गोवा, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल की सरकारों द्वारा संशोधन किए गए। पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न राज्यों द्वारा ऐसे कई संशोधन किए गए। ये संशोधन राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित और लागू किए गए, क्योंकि राज्य की विशेष जरूरतों के लिए ऐसा करना जरूरी पाया गया। नए लागू किए गए कानूनों में राज्यों द्वारा किए गए संशोधनों को शामिल नहीं किया गया है। कई गैर-भाजपा शासित राज्यों ने जब इन नए कानूनों का विरोध किया, तो केंद्र सरकार के अधिकारियों ने कहा है कि राज्य सरकारें सुरक्षा संहिता में अपनी ओर से संशोधन करने को स्वतंत्र हैं।


नए कानून में गैर-कानूनी कृत्य और आतंकवादी कृत्य की परिभाषा एवं दंड को बीएनएस के दायरे में लाया गया है। तीन वर्ष से सात वर्ष के बीच कारावास की सजा वाले मामलों में प्रारंभिक जांच का प्रावधान समस्याओं का पिटारा खोल देगा, जहां पुलिस जांच करने से इन्कार कर सकती है, जिससे जनता में असंतोष पैदा होगा। बीएनएसएस की धारा 173(3) में कई अस्पष्टताएं हैं। इस बात की आशंका है कि इससे व्यापक भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलेगा। इसके अलावा, कानूनी बिरादरी की तरफ से भी सवाल उठाए जा रहे हैं कि जब वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये अदालत की सुनवाई होगी, तो बचाव पक्ष के वकील, जो अदालत में गवाहों से पूछताछ करेंगे, वे उस आरोपी के सीधे संपर्क में नहीं रह पाएंगे, जिसका वे प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। बीएनएसएस कानून के तहत कई प्रगतिशील प्रक्रियाओं के लिए डिजिटल तकनीक अनिवार्य है, जैसे तलाशी की वीडियोग्राफी और ई-कोर्ट कार्यवाही। जबकि अभी थानों, जांच अधिकारियों, अदालतों और जेलों में अब भी आवश्यक बुनियादी ढांचे, उपकरण और प्रशिक्षण उपलब्ध नहीं हैं। इसके लिए बड़े पैमाने पर डिजिटलीकरण, प्रणालियों और प्रोटोकॉल का विकास, विशेष तकनीकी कर्मचारियों की भर्ती और प्रशिक्षण जरूरी हैं। ऐसे में ई-कोर्ट कार्यवाही और इलेक्ट्रॉनिक समन जैसे बीएनएसएस के प्रावधानों को लागू करना एक बड़ी चुनौती होगी।


 इसके अलावा, कई राज्यों में पुलिसकर्मियों को नए कानूनों के बारे में पूरी तरह से प्रशिक्षित नहीं किया गया है। इससे उन्हें नए कानूनों को प्रभावी ढंग से लागू करने में बाधा आएगी और प्रक्रियागत देरी तथा कानूनी जटिलताएं पैदा हो सकती हैं। ऐसी खबरें भी आई हैं कि नए मामले दर्ज करने में पुलिसकर्मियों के पसीने छूट रहे हैं। अपराध एवं अपराधी ट्रैकिंग नेटवर्क एवं सिस्टम तथा आईसीजेएस के साथ इसके इंटरफेस को भी नए कानूनों के अनुरूप अपडेट नहीं किया गया है, जिससे परिचालन एवं तकनीकी संबंधी गंभीर चुनौतियां पैदा हो रही हैं। जांच के लिए फोरेंसिक साक्ष्य जुटाने को अनिवार्य करना स्वागतयोग्य है और विभिन्न जांच प्रक्रियाओं में ऑडियो-वीडियो इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों तथा इलेक्ट्रॉनिक संचार को मंजूरी देना एक सकारात्मक कदम है। लेकिन प्रशिक्षण के अभाव में इन प्रक्रियाओं को अगर गलत तरीके से निष्पादित किया गया, तो अपराधी दोषमुक्त हो सकते हैं।


नए कानून बनाना सही दिशा में एक कदम है, मगर अफसोस केवल इसका है कि इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए जिस गहन चिंतन व व्यापक विमर्श की आवश्यकता थी, जो नहीं किया गया। इंडियन पुलिस फाउंडेशन जैसी संस्था को भी पार्लियामेंट्री कमिटी के सामने पेश होने का समय नहीं मिला। विरोधी दलों को यह शिकायत है कि जब उनके अधिकांश सदस्य सदन से निलंबित थे, उस समय इन्हें संसद में पारित किया गया। यह भी एक विरोधाभास है कि हमने क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम के तीन बड़े कानून तो बदल दिए, परंतु पुलिस ऐक्ट, 1861 अब भी देश की जनता के गले की फांस बना हुआ है। नेशनल पुलिस कमीशन ने इसे बदलने की सिफारिश की थी, परंतु अभी तक यह कानून जैसे का तैसा बना हुआ है। नए कानून को लागू करने के लिए जो इंफ्रास्ट्रक्चर चाहिए, वह अभी उपलब्ध नहीं है। पुलिसकर्मियों को ट्रेनिंग देने के बारे में बड़े-बड़े दावे किए जा रहे हैं, यह कहां तक सही है, यह तो समय ही बताएगा। संक्षेप में, सही दिशा में एक ठोस कदम उठाया गया है, परंतु जल्दबाजी में।

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