जी-20 में ‘एक पृथ्वी, एक कुटुंब, एक भविष्य’ का संदेश देने वाले भारत ने इस बार ब्रिक्स सम्मेलन में भी स्वास्थ्य को लेकर ऐसी पहल की है, जिसमें इलाज से ज्यादा बीमारी को रोकने पर जोर देने की सोच सामने आई है। अब सवाल केवल यह नहीं कि बीमारी का बेहतर इलाज कैसे मिले, बल्कि यह भी है कि बीमारी की नौबत ही कम कैसे की जा सकती है। अस्पताल, दवाएं और इलाज जरूरी हैं, लेकिन क्या स्वास्थ्य का मतलब सिर्फ इतना ही है कि बीमार होने के बाद हमें बेहतर इलाज मिल जाए?
ब्रिक्स के स्वास्थ्य एजेंडे में अब इसी सवाल का जवाब तलाशने की कोशिश दिखाई दे रही है। हाल ही में, चंडीगढ़ में हुई ब्रिक्स स्वास्थ्य मंत्रियों की बैठक में जारी घोषणापत्र में 2029 तक का रोडमैप सामने रखा गया। इसमें मोटापा और दूसरी गैर-संचारी बीमारियों से बचाव के लिए खानपान, शारीरिक गतिविधि और व्यवहार में बदलाव को महत्व दिया गया है। इस योजना में स्वस्थ खानपान को खास तवज्जो दी गई है। अधिक चीनी, नमक, अस्वास्थ्यकर वसा और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों के सेवन को कम करने के लिए नीतिगत व जागरूकता संबंधी कदम उठाने की बात कही गई है। इसका मतलब सिर्फ लोगों को यह बताना नहीं है कि क्या खाना चाहिए, क्या नहीं। बात इससे आगे की है। इसलिए, घोषणापत्र में आने वाले वर्षों के लिए अलग-अलग अभियान प्रस्तावित किए गए हैं। घोषणापत्र के मुताबिक 2027 में चीनी, नमक और तेल की खपत कम करने, 2028 में सभी के लिए शारीरिक गतिविधि और 2029 में स्वस्थ भोजन और खाद्य लेबल की समझ बढ़ाने जैसे विषय अभियान का हिस्सा होंगे।
भारत के लिए यह सोच इसलिए भी अहम है, क्योंकि गैर-संचारी बीमारियों का बोझ लगातार बढ़ा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, 2021 में भारत में हुई कुल मौतों में 49 फीसदी गैर-संचारी बीमारियों के कारण हुईं। इसके अलावा, देश में करीब 22 करोड़ लोग उच्च रक्तचाप से प्रभावित हैं, पर इनमें केवल 12 फीसदी का रक्तचाप नियंत्रण में है। यानी बीमारी का इलाज करने की क्षमता बढ़ाने से पहले उसके जोखिम को कम करना कहीं ज्यादा जरूरी हो जाता है। खानपान, शारीरिक गतिविधि और नियमित जांच जैसी चीजें सुनने में बहुत सामान्य लग सकती हैं, लेकिन इन्हीं का असर आगे चलकर अस्पतालों पर पड़ने वाले बोझ पर दिखाई दे रहा है। इसलिए, रोडमैप में स्वास्थ्य, शिक्षा, खाद्य व्यवस्था, शहरी विकास, मीडिया, अकादमिक संस्थानों और समाज की भागीदारी की बात की गई है।
इसके अलावा, ब्रिक्स ने मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को समुदाय के करीब लाने, प्राथमिक स्वास्थ्य व्यवस्था और डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाने तथा मानसिक स्वास्थ्य की समझ, शुरुआती पहचान और समय पर मदद पर जोर दिया है। यह बदलाव इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि मानसिक परेशानी को अक्सर तब गंभीरता से लिया जाता है, जब वह काफी बढ़ चुकी होती है। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में वर्तमान मानसिक स्वास्थ्य संबंधी समस्या का प्रसार 10.6 फीसदी था और अलग-अलग मानसिक विकारों में उपचार का अंतर 70 से 92 प्रतिशत तक पाया गया। यानी बड़ी संख्या में जरूरतमंद लोगों तक इलाज या सहायता पहुंच ही नहीं पा रही।
दिल्ली के भारत मंडपम में सामने आए दस्तावेजों के मुताबिक, ब्रिक्स का यह रोडमैप केवल संदेश देने तक सीमित नहीं है। 2029 तक इसका लक्ष्य ऐसा सहयोगी तंत्र तैयार करना है, जिसमें सफल प्रयासों को दूसरे देशों में दोहराया जा सके, तकनीकी क्षमता बढ़े, शोध और निगरानी में सहयोग हो और स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा देने में डिजिटल तकनीक का ज्यादा इस्तेमाल हो। लेकिन, यहां सबसे जरूरी बात है कि यह अभी शुरुआत है, मंजिल नहीं। रोडमैप में सदस्य देशों के लिए कई कदम स्वैच्छिक रखे गए हैं और उन्हें अपनी परिस्थितियों के अनुसार इन्हें अपनाने की गुंजाइश भी दी गई है।
इसलिए असली सवाल आने वाले वर्षों में सामने आएगा कि क्या यह सोच सरकारी अभियानों से निकलकर लोगों की आदतों तक पहुंच पाएगी? क्या स्वस्थ भोजन आसान विकल्प बनेगा? क्या शहरों में चलने और खेलने की जगह बढ़ेगी? क्या मानसिक स्वास्थ्य पर बात करना सामान्य होगा? अस्पतालों की जरूरत हमेशा रहेगी। आधुनिक इलाज भी जरूरी रहेगा। लेकिन अगर स्वास्थ्य व्यवस्था का एक हिस्सा ऐसी दुनिया बनाने में लग जाए, जहां लोग कम बीमार पड़ें, बीमारियों की पहचान जल्दी हो और स्वस्थ रहना आसान हो, तो यह बदलाव कहीं बड़ा होगा।
ब्रिक्स का इलाज से बचाव की ओर बढ़ता यह कदम फिलहाल एक विचार और शुरुआत है। इसकी असली सफलता तब होगी, जब स्वास्थ्य केवल अस्पताल का विषय न रहकर जीवन जीने का तरीका बन जाए।