ग्राहक भगवान है, यह ज्यादातर दुकानों पर लिखा दिख जाता है। पर आधुनिक भारत में मार्केटिंग के उस्तादों ने इसे 'कंज्यूमर इज किंग' में बदल दिया है। उपभोक्ता राजा हो या ग्राहक भगवान, इसे अगर ठीक से समझ लिया जाए, तो 'मेक इन इंडिया' की प्रधानमंत्री की योजना अद्भुत तरीके से अर्थव्यवस्था के हक में असर दिखा सकती है। उदाहरण के लिए, भारत में कंज्यूमर ड्यूरेबल एक उद्योग है, जिसका सही इस्तेमाल अगर 'मेक इन इंडिया' की महत्वाकांक्षी योजना में हो जाए, तो चमत्कार हो सकता है। देश के कुल उपभोग में कंज्यूमर ड्यूरेबल्स की हिस्सेदारी 40 प्रतिशत है। यह उद्योग जबर्दस्त तरीके से रोजगार के मौके बढ़ाने वाला भी है। इस क्षेत्र में मिलने वाले रोजगार के प्रति एक मौके से तीन अप्रत्यक्ष रोजगार के मौके भी बनते हैं। यानी कंज्यूमर ड्यूरेबल इंडस्ट्री में 100 लोगों को रोजगार मिला दिखता है, तो इससे सीधे-सीधे चार सौ लोगों को रोजगार मिलता है। कंज्यूमर ड्यूरेबल सेक्टर औद्योगिक तरक्की के सूचकांक में 5.5% हिस्सेदारी रखता है।
देश में कंज्यूमर ड्यूरेबल का कारोबार 2015 आते-आते करीब एक लाख करोड़ रुपये का हो गया है। इस क्षेत्र से जुड़े चार सबसे महत्वपूर्ण उत्पाद हैं-टीवी, फ्रिज, वॉशिंग मशीन और एयरकंडीशनर। तेज शहरीकरण वाले भारत में इन चारों ही उत्पादों में चमत्कारिक वृद्धि की उम्मीद की जा सकती है। केंद्र सरकार ने सौ से ज्यादा स्मार्ट सिटीज की मंजूरी दी है। इसके अलावा तेजी से बढ़ती औद्योगिक गतिविधियों की वजह से भी कंज्यूमर ड्यूरेबल्स का बाजार तेजी से बढ़ा है और धीरे-धीरे गांवों में भी इनकी पहुंच बढ़ रही है। भारत में 60 प्रतिशत घरों में टेलीविजन है, जबकि दुनिया में औसतन 89 प्रतिशत घरों में टेलीविजन है। 21 फीसदी भारतीयों के घर में फ्रिज है, जबकि वैश्विक स्तर पर औसतन 85 प्रतिशत घरों में फ्रिज है। हालांकि नौ प्रतिशत से भी कम भारतीयों के घर में वॉशिंग मशीन है, जबकि दुनिया में सत्तर प्रतिशत लोग कपड़े धुलने के लिए मशीन का इस्तेमाल करते हैं। इसी तरह अपने यहां सिर्फ तीन प्रतिशत लोग ही एयरकंडीशनर का आनंद उठाते हैं, जबकि विश्व में औसतन साठ प्रतिशत लोगों के घरों में एयरकंडीशनर है। जाहिर है, वॉशिंग मशीन और एयरकंडीशनर के क्षेत्र में अभी व्यापक संभावनाएं हैं। हालांकि पिछले तीन वर्षों में टेलीविजन को छोड़ दें, तो बाकी तीनों उत्पादों का उत्पादन घटा ही है।
'मेक इन इंडिया' की सफलता के लिए कंज्यूमर ड्यूरेबल क्षेत्र को गति देने की जरूरत है। इसके अलावा इस क्षेत्र के उत्पादों के आयात-निर्यात का संतुलन बनाना भी जरूरी है। तभी 'मेक इन इंडिया' के जरिये चालू खाते का घाटा भी दूर हो सकेगा। हालांकि अभी तो यह असंतुलन बढ़ता ही जा रहा है। यानी इनसे संबंधित आयात तो बढ़ रहा है, पर निर्यात उस अनुपात में नहीं हो पा रहा। चिंतित करने वाली बात यह भी है इन उद्योगों के लिए ज्यादातर आयात चीन से किया जा रहा है। अब अगर आयात-निर्यात के इसी असंतुलन को 'मेक इन इंडिया' उलटने में कामयाब हो जाए-यानी भारतीय और वैश्विक कंपनियां भारत में सामान बनाएं और भारत की जरूरत पूरी करने के बाद दुनिया की भी जरूरत पूरी करें, तो इन्हीं चार उत्पादों से भारतीय अर्थव्यवस्था की तस्वीर बदल सकती है और चालू खाते का घाटा भी कम हो सकता है।
-वरिष्ठ आर्थिक पत्रकार और सीएनबीसी आवाज के पूर्व नॉन मार्केट प्रमुख