जब भारत की आजादी की लड़ाई का इतिहास लिखा जाएगा, तो उसमें महिलाओं के त्याग का जिक्र सबसे पहले होगा। गांव की जो महिलाएं पर्दे में थीं, राष्ट्र की पुकार पर वे घर के बाहर निकल पड़ी हैं। उनके मनोबल को देखकर आज सारे विश्व को आश्चर्य है। यूरोप में थर्मोपाइले की लड़ाई को याद किया जाता है।
इस लड़ाई में 300-400 यूनानियों ने वीरगति को प्राप्त होकर लाखों ईरानियों की बढ़ती हुई सेना को पीछे कर दिया था, पर वहां केवल पुरूष थे। भारत में इस समय अनेक अहिंसापूर्ण थर्मोपाइले में पुरूषों के साथ-साथ स्त्रियां भी समान रूप से भाग ले रही हैं। भारतीय महिलाओं को हमेशा यह श्रेय मिलेगा कि उन्होंने स्वराज्य को अपेक्षाकृत निकट लाने में सहयोग दिया है।
उपरोक्त शब्द हैं, महात्मा गांधी के, जिनके आह्वान पर महिलाएं पूरी ताकत के साथ आजादी की लड़ाई में कूद पड़ी थीं। आंदोलन रॉलेट एेक्ट के विरुद्ध हो या नमक आंदोलन, विदेशी वस्त्रों की होली हो या नशाबंदी के खिलाफ, स्त्रियां कही भी पुरुषों से पीछे नहीं थीं।
गांधी का पूर्ण विश्वास था कि जिस देश की आधी आबादी सक्रिय नहीं होगी, उसका पतन सुनिश्चित है। दक्षिण अफ्रीका में जब गांधी मात्र 30 वर्ष के थे, उसी समय से उन्होंने नारी मुक्ति आंदोलन से जुड़े कार्यक्रमों की अगुआई करना प्रारंभ कर दिया था। वहां की महिलाएं गांधी के काम को जानती थीं। भारत लौटने के बाद उन्होंने गांव और शहरों में सभी जगह घूम-घूमकर स्त्रियों को सक्रिय करना प्रारंभ कर दिया था।
वह बिहार के एक गांव में कुछ उच्च कुलों की बहनों से मिलने गए, जो पर्दानशीं थीं। घर के बाहर की बैठक में उनके पुरुषों से तो गांधी की मुलाकात हो गई, पर बहनों से मिलने के लिए अलग कमरे में जाना था। जैसे बहन, भाई के सामने पर्दा नहीं करती, उन बहनों ने गांधी के सामने पर्दा हटा दिया।
गांधी ने विनोद में उन स्त्रियों से कहा कि चलो, हम सब चलकर वहीं बैठें, जहां सब पुरुष बैठे हैं। स्त्रियों ने उत्साहपूर्वक कहा कि ‘यह तो बड़ी खुशी की बात है, किंतु प्रथा के अनुसार उन्हें अनुमति नहीं दी जाती, जब कि पर्दा उन्हें तनिक भी नहीं रुचता।’ यद्यपि वे पढ़ी लिखी नहीं थी, किंतु सामान्य शिक्षा प्राप्त करने से पहले उन्हें अपनी स्थिति का ज्ञान था।
गांधी का मानना था कि स्त्रियों की मुक्ति की शक्ति स्वयं उनमें ही है। उनके कहने पर उन अशिक्षित महिलाओं ने भी यह माना कि यह शक्ति उनमें है। गांधी के अनुसार, स्त्री को अबला कहने का अभिप्राय पुरुष को स्त्री के प्रति उसके कर्तव्य की प्रतीति करवाना रहा है। अर्थात शरीर से बलवान होने के कारण उसे अपनी पाशविक वृत्ति से अबला को सताने का कोई अधिकार नहीं?
बल्कि उसका कार्य स्त्री की रक्षा करते हुए ऐसे साधनों को उसके हाथ में देना है, जिससे उसकी आत्मा का विकास हो। इसे इस्राइल की पूर्व प्रधानमंत्री गोल्डा मायर ने भी रेखांकित किया था। एक बार उनके सामने बलात्कार की समस्या रखी गई। सुझाव दिया गया कि अंधेरा होने के बाद स्त्रियां घर से न निकलें। प्रधानमंत्री का उत्तर था कि पुरुष क्यों नहीं? समस्या पैदा करने वाला तो वही है।
बलात्कार का दुष्प्रभाव केवल स्त्री पर नहीं, बल्कि संपूर्ण परिवार, समाज और संस्कृति पर पड़ता है। यह उस व्यवस्था के कारण है, जिसने उस प्रकार के भेदभाव को जन्म दिया है, जैसा दास प्रथा में देखने को मिलता है। दिल्ली की सामूहिक बलात्कार की घटना के बाद कुछ राजनेताओं, धर्म के ठेकेदारों तथा स्वयं को नैतिकता के संरक्षक मानने वाले लोगों द्वारा जो बेतुके बयान दिए गए, उनसे राष्ट्र का सिर शर्म से झुक जाता है।
प्रसन्नता की बात है, युवाओं में, विशेषकर महिला वर्ग में इस समय जो आक्रोश है, उसकी निरंतरता बनी हुई है। स्वतंत्र भारत में पहली बार नारी मुक्ति के लिए ऐसा आक्रोश देखने को मिलता है। केवल कानूनों से कुछ नहीं होता, सामाजिक दृष्टिकोण को बदलना पड़ेगा।
गांधी ने आजादी की लड़ाई के साथ-साथ सामाजिक परिवर्तन की भी लड़ाई लड़ी थी। उनका कहना था कि जब तक अन्याय पर आधारित सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था में बदलाव नहीं होता, राजनीतिक आजादी प्रभावहीन रहेगी। आइए, वर्ष 2013 में हम आधी आबादी की पूर्ण मुक्ति के लिए समर्पित हों।