फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

जानना जरूरी है: महर्षि ऊर्व ने कैसे दिया पुत्र को जन्म

आशुतोष गर्ग
Updated Sun, 23 Aug 2026 07:40 AM IST

सार

ऊर्व मुनि एक कुश से अपनी जांघ का मंथन करने लगे। कुछ ही समय में उनकी जांघ विदीर्ण हो गई और उसमें से एक दिव्य व तेजस्वी बालक प्रकट हुआ।
विज्ञापन
विज्ञापन
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला प्रिंट


परंतु, ऊर्व मुनि ने उनकी बात नहीं मानी और बोले, ‘तपस्वियों का धर्म गृहस्थ जीवन नहीं, बल्कि ब्रह्मचर्य, तप और योग है। ब्रह्मचर्य ही ब्राह्मण का सर्वोच्च धर्म है। इसी से ब्रह्मतेज की प्राप्ति होती है और इसी से ब्रह्मलोक प्राप्त होता है। जिसने इंद्रियों को वश में कर लिया, उसके लिए संसार के भोगों का कोई महत्व नहीं रह जाता। यदि तपस्वी भी विषय-भोगों में पड़ जाए, तो उसका तप निष्फल हो जाता है।’ उन्होंने आगे कहा कि सृष्टि के आरंभ में स्वयं ब्रह्मा जी ने मानस संतानों की रचना की थी। उस समय न स्त्री की आवश्यकता थी, न दांपत्य जीवन की। इसलिए, तपस्वी भी अपने संकल्प और तपोबल से संतान उत्पन्न कर सकता है। उन्होंने घोषणा की, ‘मैं बिना स्त्री के सहयोग के अपने शरीर से ऐसा पुत्र उत्पन्न करूंगा, जो मेरे ही समान तेजस्वी होगा।’ यह कहकर ऊर्व मुनि ने अपनी जांघ को अग्नि के समान तप्त किया। वह एक कुश से अपनी जांघ का मंथन करने लगे। कुछ ही समय में ऊर्व मुनि की जांघ विदीर्ण हो गई और उसमें से एक दिव्य और तेजस्वी बालक प्रकट हुआ। उसका तेज ऐसा था, मानो वह संपूर्ण सृष्टि को भस्म कर देगा। जांघ (ऊरु) से उत्पन्न होने के कारण वह और्व नाम से प्रसिद्ध हुआ।


जन्म लेते ही बालक ने अपने पिता से कहा, ‘पिताश्री! मुझे भूख लगी है। भोजन के लिए संपूर्ण जगत मुझे दे दीजिए।’ उसकी प्रचंड ज्वालाएं दसों दिशाओं में फैलने लगीं।


देवता, ऋषि और समस्त लोक भयभीत हो उठे। ऐसा प्रतीत होने लगा कि सृष्टि का अंत निकट है।


उसी समय भगवान ब्रह्मा प्रकट हुए। उन्होंने ऊर्व मुनि से कहा, ‘महर्षि! लोकों की रक्षा के लिए अपने पुत्र के तेज को संयमित कीजिए। मैं इसके लिए उपयुक्त भोजन और निवास की व्यवस्था करता हूं।’ ऊर्व मुनि ने पूछा, ‘प्रभो! जब यह युवा होगा, तब इसकी भूख कैसे शांत होगी? इसकी अपार शक्ति के योग्य आहार और निवास कहां होगा?’ तब ब्रह्मा जी ने कहा, ‘समुद्र के भीतर एक दिव्य स्थान है और वही इसका निवास होगा। यह समुद्र के जल को ही आहार बनाएगा। प्रलयकाल आने पर इसी की अग्नि, समुद्र से प्रकट होकर देवताओं, दानवों और समस्त प्राणियों के संहार में सहायक बनेगी।’ यही अग्नि आगे चलकर वडवानल (बड़वानल) के नाम से प्रसिद्ध हुई, जिसके बारे में कहा जाता है कि वह समुद्र के गर्भ में स्थित है। ब्रह्मा जी की आज्ञा सुनकर और्व ने अपनी प्रचंड ज्वालाओं को समेट लिया और समुद्र के भीतर चला गया। इस प्रकार तीनों लोक विनाश से बच गए। इस अद्भुत घटना को दैत्यराज हिरण्यकशिपु ने भी देखा। उसने ऊर्व मुनि से कहा, ‘भगवन्! आपने जो कार्य किया है, वह समस्त लोकों के लिए आश्चर्य का विषय है। कृपया मुझे अपना सेवक और शिष्य स्वीकार करें।’


हिरण्यकशिपु की विनम्रता से प्रसन्न होकर ऊर्व मुनि ने उसे आशीर्वाद दिया और कहा, ‘दैत्यराज! मैं तुम्हें अपने पुत्र और्व द्वारा रचित मायाशक्ति प्रदान करता हूं। यह दिव्य मायाशक्ति, तुम्हारे जीवनकाल तक तुम्हारे वंशजों की रक्षा करेगी और युद्ध में सदैव तुम्हारी सहायता करेगी।’ वरदान पाकर हिरण्यकशिपु ने ऊर्व मुनि को प्रणाम किया और अपने लोक लौट गया।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next