उद्धव ठाकरे और उनके सलाहकारों को लगता है कि आयोग ने जान-बूझकर जल्दबाजी में फैसला लिया। जबकि आयोग ने फैसले तक पहुंचने में पर्याप्त समय लिया है। जून में एकनाथ शिंदे ठाकरे से अलग हुए और 30 जून को उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। आयोग ने 78 पृष्ठों के आदेश में इसका आधार भी स्पष्ट किया है। ऐसे मामलों में पहला आधार यही होता है कि विधानसभा और लोकसभा में पार्टी के कितने विधायक और सांसद किस गुट में हैं। आयोग ने भी कहा है कि विधानसभा व लोकसभा के साथ ही संगठन में बहुमत के आधार पर पार्टी पर अधिकार का फैसला होता है।
चुनाव आयोग पार्टी पदाधिकारियों के आधार पर फैसला नहीं करता, क्योंकि उनका चयन होता है, वे चुनाव के जरिये निर्वाचित नहीं होते। इसलिए इसके आधार पर यह निर्णय नहीं हो सकता कि कितने पार्टी पदाधिकारी शिंदे के और कितने उद्धव के साथ रहे। शिवसेना के कुल 55 विधायकों में से 40 विधायक और 19 सांसदों में से करीब 13 सांसद शिंदे के साथ हैं। उद्धव के साथ केवल 15 विधायक और तीन सांसद ही बचे हैं। आयोग ने दोनों पक्षों के विधायकों और सांसदों को मिले मत की भी गणना की है, जिसके मुताबिक, वर्ष 2019 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में शिवसेना के 55 विजयी उम्मीदवारों में से एकनाथ शिंदे का समर्थन करने वाले विधायकों के पक्ष में लगभग 76 प्रतिशत मत पड़े थे, जबकि 23.5 प्रतिशत मत उद्धव ठाकरे धड़े के विधायकों को मिले थे। इस अंकगणित के रहते चुनाव आयोग इसके विपरीत फैसला किस आधार पर दे सकता था?
आयोग ने एक और बात यह कही है कि बहुमत के अलावा फैसले में पार्टी के राजनीतिक संगठन की संरचना पर भी विचार किया जाता है। उसके अनुसार विचारधारा से परे जाकर एक गुट ने गठबंधन किया और यही पार्टी में टूट का आधार बना। इस पर बहस हो सकती है कि चुनाव आयोग विचारधारा पर फैसला कर सकता है या नहीं। पर यह सच्चाई है कि शिवसेना ने विधानसभा चुनाव भाजपा के साथ मिलकर लड़ा था और दोनों को जनता ने बहुमत भी दिया था। पर उद्धव ने भाजपा का साथ छोड़ राकांपा और कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार बनाई। सत्ता के लिए स्वाभाविक गठजोड़ से अलग होकर उद्धव विरोधी विचारधारा के साथ अस्वाभाविक गठजोड़ की ओर पार्टी को ले गए, जिसे शिंदे ने फिर स्वाभाविक गठजोड़ की स्थिति में ला दिया।
ठाकरे के लिए दूसरा झटका शीर्ष अदालत की ओर से आया है। अरुणाचल प्रदेश के नबम रेबिया मामले को अदालत ने पुनर्विचार के लिए सात सदस्यीय पीठ को भेजने से इनकार कर दिया। उद्धव गुट की ओर से पेश वकीलों ने नबम रेबिया मामले को बड़ी पीठ को भेजने की मांग की थी। 2016 में अरुणाचल प्रदेश के नबम रेबिया मामले में फैसला सुनाते हुए पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा था कि विधानसभा स्पीकर सदन में अपने विरुद्ध रिमूवल का पूर्व नोटिस लंबित रहते हुए विधायकों की अयोग्यता की याचिका पर फैसला नहीं कर सकता। यह फैसला शिंदे के नेतृत्व वाले शिवसेना के लिए सुरक्षा कवच की तरह आया है। उद्धव समूह ने शिंदे के साथ गए विधायकों को अयोग्य ठहराने की मांग की थी। उसके पहले ही शिंदे पक्ष की ओर से विधानसभा उपाध्यक्ष नरहरी सीताराम जिरवाल को हटाने का नोटिस दे दिया था। तो यहां से भी उद्धव ठाकरे के लिए उम्मीद काफी कम हो गई है।
अब भी समय है कि उद्धव और उनके सलाहकार यथार्थ को समझें तथा उसके अनुरूप राजनीतिक व्यवहार करें। वरिष्ठ और अनुभवी नेता शरद पवार का सुझाव सर्वथा उचित है कि इसे भूलकर ठाकरे नए सिरे से पार्टी की पुनर्रचना करते हुए आगे बढ़ें।