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व्यवस्था को चुनौती देते माफिया

शिवदान सिंह Published by: Raman Singh Updated Wed, 06 Feb 2019 06:31 PM IST
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शिवदान सिंह

सोशल मीडिया पर 'जिले के मुखिया को ही लगता है डर, तो आप लोग कैसे लड़ेंगे' शीर्षक से जिलाधिकारी गौतमबुद्धनगर की सुरक्षा के बारे में जोर-शोर से चर्चा है। यह विचार का विषय है कि जिले में प्रदेश सरकार के सबसे बड़े प्रतिनिधि को स्वयं की सुरक्षा की चिंता है! गौतमबुद्धनगर में बिल्डरों तथा भू-माफियाओं की गैरकानूनी गतिविधियां लंबे समय से चल रही थीं, पर यह पिछले साल तब प्रकाश में आई, जब जिले के शाहबेरी गांव में एक बहुमंजिला भवन के गिरने से नौ लोग मारे गए। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में होने के कारण इस पर खूब शोर-शराबा हुआ, तब जिला प्रशासन ने 17 संस्थाओं एवं व्यक्तियों के विरुद्ध पुलिस रिपोर्ट की। गैंगस्टर ऐक्ट तथा रासुका के अंतर्गत भी कार्रवाई की गई। इसी कारण अवैध निर्माणों में लगे माफिया से जिलाधिकारी को स्वयं की सुरक्षा की चिंता सता रही है। जिलाधिकारी की स्वयं की सुरक्षा की मांग ने बिहार के गोपालगंज की याद ताजा कर दी है, जहां के जिलाधिकारी की हत्या वहीं के लोकसभा सांसद ने, जो माफिया सरगना भी था, दिन दहाड़े कर दी थी!



राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का अहम हिस्सा तथा दिल्ली से सटे होने के कारण बीती सदी के 80 के दशक में उत्तर प्रदेश सरकार ने इसे औद्योगिक क्रांति का केंद्र बनाने के लिए यहां पर नवीन ओखला औद्योगिक विकास प्राधिकण की स्थापना की, जिसे नोएडा के नाम से पुकारा जाता है। इसके लिए 1984 के भूमि अधिकार कानून का प्रयोग किया गया तथा बड़े पैमाने पर भूमि का अधिग्रहण हुआ। इसको आगे बढ़ाकर ग्रेटर नोएडा और यमुना विकास प्राधिकरण को भी इसमें जोड़ा गया। इस पूरे क्षेत्र को मिलाकर अलग जिला गौतमबुद्धनगर बना दिया गया! इन तीनों में मुख्य उद्देश्य औद्योगिकीकरण था और यहां पर अधिकृत भूमि का उपयोग 70 प्रतिशत  उद्योगों तथा 30 प्रतिशत व्यावसायिक तथा आवास के लिए होना था। पर राजनेताओं तथा बिल्डर माफियाओं ने नौकरशाहों की मदद से लैंड यूज बदल कर इसे रियल एस्टेट की मंडी बना दिया। इससे पूरे गौतमबुद्धनगर तथा पड़ोसी गाजियाबाद में ज्यादातर भूमि पर घर बन गए और थोड़ी-सी भूमि पर नाममात्र के लिए औद्योगिक यूनिटें स्थापित हुईं, जिनमें रोजगार के अवसर न के बराबर हैं।


पूरे गौतमबुद्धनगर जिले में अधिकतर कृषि भूमि रियल एस्टेट के लिए अधिकृत की जा चुकी है। अब यहां लाल डोरा यानी गांव की आवासीय क्षेत्रों की जमीन बची है, जहां पर जन कल्याण की योजनाओं के लिए नामित जमीनों पर माफिया द्वारा कब्जा कर गैरकानूनी बहुमंजिला भवन घटिया सामग्री से बना दिए हैं, जिन्हें वे विज्ञापनों के सहारे भोली-भाली जनता को बेच रहे हैं। गौतमबुद्धनगर जिले में हिंडन एवं यमुना नदी के डूब क्षेत्र की जमीनों पर भी अवैध कब्जा कर उसे जनता को बेचने का धंधा किया जा रहा है। इस तरह गौतमबुद्धनगर बिल्डर, भूमि तथा खनन माफिया का अड्डा बन गया है। इस कारण इस क्षेत्र का उम्मीदों के अनुरूप औद्योगिकीकरण नहीं हुआ और न ही रोजगार के साधन पैदा हुए।


इस पूरे घोटाले में राजनेता, नौकरशाह तथा भू-माफिया शामिल हैं, इसलिए सरकार अगर रोजगार के साधन देश में उपलब्ध कराना चाहती है, तो उसे रियल एस्टेट की इस साठगांठ को खत्म करना होगा। इसके लिए पहले इन घोटालों में राजनेताओं, नौकरशाहों तथा भू-माफिया के विरुद्ध शीघ्र अति शीघ्र कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए। उसके बाद इन क्षेत्रों में दोबारा से उद्योग को स्थापित करने की कोशिश की जानी चाहिए, जिससे रोजगार के अवसर पैदा हो सकें।

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