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मैक्रों और यूरोप का पुनर्जीवन

Tue, 09 May 2017 10:06 AM IST
रोजर कोहेन
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इमैनुएल मैक्रों
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यह सिर्फ इमैनुएल मैक्रों की जीत नहीं है, जो 39 वर्ष की उम्र में फ्रांस के सबसे युवा राष्ट्रपति बनेंगे। उन्होंने सिर्फ मारीन ली पेन को ही नहीं हराया, जो कट्टर राष्ट्रवाद की प्रबल समर्थक थीं। इसी कट्टर राष्ट्रवाद का फायदा अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने उठाया। मैक्रों की जीत बदनाम कर दिए गए यूरोपीय संघ के प्रति साहसिक रुख की जीत है और इसलिए उनकी जीत ने यूरोपीय विचार और विश्व में यूरोप के स्थान की पुष्टि की है, जिसे मजबूत और मूल्यवान बनाने की जरूरत है।
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पिछले साल ब्रिटेन के यूरोपीय संघ छोड़ने के निराशाजनक फैसले के बाद और ट्रंप के शत्रुतापूर्ण यूरोप-विरोधी अज्ञानता को देखते हुए यह बहुत महत्वपूर्ण था। पेरिस में अपने समर्थकों को संबोधित करने आए मैक्रों ने फ्रांस के राष्ट्रीय गीत के बजाय यूरोपीय गान बीथोवन के ओड टू जॉय के साथ अपना संदेश दिया, जो खुलेपन का सशक्त संकेत है।
 
ली पेन की अगुआई में चल रहे राष्ट्रवाद और नस्लवाद के अनियंत्रित कदम को यूरोप में रोक दिया गया है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने ली पेन को समर्थन दिया, उसका एक खास कारण है-वह यूरोपीय संघ की एकता और यूरोपीय संघ के साथ अमेरिका के रिश्ते को तोड़ना चाहते हैं।
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संघीय यूरोप उसकी स्थिरता और समृद्धि की नींव है। यह युवा यूरोपीयों को अपना वायदा पूरा करने का बेहतर अवसर प्रदान करता है। जैसा कि मैक्रों ने अपने स्वीकृति भाषण में कहा कि यह यूरोपीयों की साझा नियति है कि वे फ्रांस और यूरोपीय संघ के झंडे के साथ खड़े हों। इससे अलग सोचना इतिहास को भूल जाने जैसा है। हैरानी की बात नहीं है कि जर्मन चांसलर एंगेला मर्केल ने अपने प्रवक्ता के माध्यम से तत्काल 'मजबूत और एकजुट यूरोप' की जीत की घोषणा की। 

इसके लिए सुधार की आवश्यकता होगी। मैक्रों ने पहचान लिया है कि आत्मसंतुष्ट यूरोप का आकर्षण खो गया है। उन्होंने घोषणा की कि मैं यूरोप और नागरिकों के बीच के रिश्ते को फिर से जोड़ना चाहता हूं। इसके लिए ज्यादा पारदर्शिता, ज्यादा जवाबदेही और ज्यादा रचनात्मकता की जरूरत होगी। यूरोपीय संघ जैसे चमत्कार का विज्ञापन जिस दयनीय ढंग से किया गया, उतना और किसी चीज का नहीं।

मैक्रों ने, जो साल भर पहले कहीं नहीं थे, एक नए राजनीतिक आंदोलन का नेतृत्व किया और उन्होंने आसान वायदे नहीं किए या गढ़ी गई कहानियां लोगों को नहीं सुनाईं। वह शरणार्थियों के साथ खड़े हैं, वह यूरोप की साझा मुद्रा यूरो के साथ खड़े हैं और वह फ्रांस के लोगों को यह बताने के लिए तैयार हैं कि वह अपनी आधुनिकता या समृद्धि से पीठ नहीं फेर सकते। तर्कसंगत दलीलों के माध्यम से उन्होंने ली पेन पर बढ़त हासिल की। ट्रंप के नकली समाचारों, फर्जी दावों और समग्र नकलीपन के युग में यह महत्वपूर्ण है, जिसने दिखाया कि तर्क और सुसंगति का अब भी राजनीति में मतलब है।

लेकिन मुश्किलें अब शुरू होती हैं। फ्रांस में यह पहली बार है कि धुर दक्षिणपंथी धड़े को एक तिहाई से ज्यादा वोट मिला है, जो देश में रोजगार खोने, विफल अप्रवासी एकीकरण और आर्थिक ठहराव के प्रति गुस्से का इजहार है। मैक्रों ने बताया कि वह इस 'गुस्से, असंतोष और संदेह' को जानते थे और इस संबंध में उन्होंने कहा कि फ्रांस की संभावनाओं को पुनर्जीवित करके सामाजिक असंतोष को दूर करने की आवश्यकता है। अगर मौजूदा हालात में परिवर्तन नहीं हुआ, तो ली पेन का समर्थन बढ़ता जाएगा। फ्रांस में बदलाव प्रत्यक्ष तौर पर बहुत मुश्किल है। यह एक ऐसा देश है, जो अपने व्यापक कल्याणकारी राज्य में अर्जित अधिकारों से जुड़ा हुआ है। कई लोगों ने कोशिश की है और अनेक विफल रहे हैं।

मजबूत संसदीय समर्थन के बिना बदलाव कठिन है, मैक्रों को उसकी जरूरत होगी। संसदीय चुनाव अगले महीने होने वाले हैं। उन्हें अपने आगामी आंदोलन को इस जीत के आधार पर तैयार करना होगा। इसमें असाधारण गति है। पांचवें गणराज्य के पारंपरिक राजनीतिक परिदृश्य (बारी-बारी से सेंटर-लेफ्ट सोशलिस्ट और सेंटर राइट रिपब्लिकन ) को दूर कर दिया गया है।

संभवतः यह बहुत बड़ी उपलब्धि है, क्योंकि हाल के यूरोपीय राजनीतिक इतिहास में इसके समानांतर कोई घटना नहीं है और एक स्वतंत्र मध्यमार्गी के रूप में मैक्रों का कद उन्हें फ्रांस के लोगों को मनाने का अनूठा अवसर प्रदान करता है। आखिरकार एक लचीला श्रम बाजार निर्मित करते हुए वह जर्मनी, हॉलैंड, स्वीडन और डेनमार्क के लोगों की तरह अपने कल्याणकारी राज्य के तत्वों को बचाकर रख सकते हैं, जो युवाओं को उम्मीद देता है। अपने 25 फीसदी बेरोजगार युवाओं के साथ फ्रांस ने खुद को बर्बाद कर दिया है।

यदि फ्रांस फिर से आगे बढ़ता है, तो उसके साथ यूरोप भी बढ़ेगा। यह निर्विवाद रूप से राष्ट्रवादी खेमे के लिए एक झटका होगा-अपनी नकली राजनीतिक छवि के साथ ली पेन, ब्रिटेन के विदेशीद्रोही मसखरे निगेल फारेज (ट्रंप के मित्र), मॉस्को में पुतिन, तुर्की में एर्दोगन और अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के लिए यह बड़ा धक्का होगा, जिनकी अमेरिका के यूरोपीय सहयोगियों के मुद्दे पर गैरजिम्मेदारी भयावह रही है।

मैक्रों के साथ कई चीजों की जीत हुई है। उन्होंने दिखा दिया कि फ्रांस वह देश नहीं है, जहां नस्लवाद और यूरोप-विरोधी कट्टर राष्ट्रवाद चुनाव जीत सकता है। उन्होंने यूरोपीय विचार को फिर से स्थापित किया है, और इस संभावना को बढ़ाया है कि फ्रांस और जर्मनी यूरोपीय आदर्शवाद को पुनर्जीवित करेंगे। उन्होंने तुच्छ इंग्लैंडवासियों को फटकार लगाई है, जिन्होंने ब्रेग्जिट के पक्ष में मतदान किया। सबसे बड़ी बात अपनी बुद्धिमत्ता और विनम्रता, संस्कृति और खुलेपन के माध्यम से मैक्रों ने भौंडेपन और अशिष्टता, जहालत और संकीर्णता के खिलाफ एक बड़ी बाधा खड़ी की है, जो ट्रंप के ओवल ऑफिस से निकलकर वैश्विक मामलों के भ्रष्ट संचालन की धमकी देता है। फ्रांस अमर रहे, यूरोप अमर रहे, अभूतपूर्व!
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