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प्यार की मिट्टी, मूल्यों का घरौंदा

Sat, 15 Jun 2013 09:50 PM IST
सुनील मिश्र
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एक गीतकार के रूप में इब्राहिम अश्क को पहली बार रितिक रोशन की पहली फिल्म `कहो न प्यार है के’ गाने “क्यों चलती है पवन, क्यों झूमे हैं गगन, क्यों मचलता है मन, न तुम जानो न हम" से जाना। लकी अली ने इसे बड़ी छुई-छुई सी आवाज में गाया था।
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जाहिर है राजेश रोशन का संगीत भी इसके पीछे महत्वपूर्ण था। इब्राहिम अश्क ने इसके बाद भी बहुत से गीत लिखे। राकेश रोशन ने ‘कहो न प्यार है’ के बाद उनसे ‘कोई मिल गया’ और ‘कृष’ फिल्म के गाने भी लिखवाए। और दूसरी फिल्मों के लिए भी उन्होंने लिखा, लेकिन फिर एक बार मन को छूने वाले गाने सुभाष घई की फिल्म ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ में सुनने को मिले, बिल्कुल सूफियाना अंदाज के।

इब्राहिम अश्क मध्य प्रदेश के बडनगर के रहने वाले हैं। शुरू से शायरी और लिखने-पढ़ने में उनका रुझान रहा है। मंच पर अनेक गरिमापूर्ण जगहों में उन्होंने अपने लिखे से, अपने सुनाये से श्रोताओं को चमत्कृत किया है। उनकी खासियत यह है कि वे आत्मप्रचार से हमेशा दूर रहते हैं।
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जिस तरह की विनम्रता को वे जीते हैं, वो मंच की कविता और कवियों से, खासकर कई बार जिस तरह की तानाकशी, उत्तेजना, परस्पर विद्वेष और उपहास के साथ-साथ काट-छांट की वृत्तियां देखने को मिलती हैं, उनसे उनका रिश्ता कभी नहीं रहा है।

उनको जब भी मंच पर पढ़ते देखता हूं, तो इस बात का ताज्जुब होता है कि एक आदमी केवल अपने सृजन से सामने वाले से जुड़ रहा है, उस सामने वाले से, मुरीद से, जिससे उसका यों कोई रिश्ता नहीं है, मगर शायरी जो अपनी निष्कपट धारा से बहकर जाती है, जिसका स्वर बड़ा विनम्र और शालीन है, उसे दर्शक जैसे अपनी गोद में भर लेता है, अपने दिल में बैठा लेता है।

इब्राहिम अश्क यह काम बड़ी सज्जनता से कर जाते हैं। बहुत से अंतर्मुखी उनको सुनकर फिर उनका परिचय प्राप्त करते हैं, वह भी अपनी जानकारी की सीमाओं के लिए लगभग खेद सा प्रकट करते हुए। लेकिन इब्राहिम अश्क तब भी उतने ही सहज और विनम्र होते हैं और घुल-मिल जाते हैं।

हाल की ही मुलाकात में, बातचीत में एक किस्सा उन्होंने इस्माइल मर्चेन्ट की फिल्म ‘इन कस्टडी’ का बताया, जिसकी शूटिंग लगभग बीस साल पहले भोपाल में हुई थी। इब्राहिम अश्क एक तरह से फिल्म के कलाकारों के लिए नैरेटर की तरह थे। खासतौर पर शशि कपूर के किरदार के लिए उन्होंने उनके साथ संवाद-अभिव्यक्ति का उत्तरदायित्व संभाला था। इन कस्टडी की पटकथा और संवाद लेखन में भी उनकी भूमिका रही।

वे बताते हैं कि शशि कपूर उनसे इतना प्रभावित हुए थे कि साथ ही भोपाल आए और पूरी शूटिंग में साथ रहे, जबकि ठहरने की उनकी व्यवस्थाएं अलग-अलग थीं। एक दृश्य जिसमें शशि कपूर के सामने ओम पुरी थे, ओम पुरी को एक संवाद बोलना था।

इब्राहिम अश्क ने उस डायलॉग को नैरेट किया। ओम पुरी ने उनकी भूमिका को जाने बगैर अपनी असहमति व्यक्त की और कहा मुझे जैसा बोलना है, वैसा ही बोलूंगा। जवाब में सहज ही उन्होंने कहा, `ठीक है, जैसा आपको ठीक लगे।’ शशि कपूर इस प्रसंग के साक्ष्य थे, लेकिन वे चुप रहे, हुआ फिर यह कि वह सीन आधे दिन तक ओके नहीं हुआ।

लंच ब्रेक में फिर जब ओम पुरी को मालूम हुआ कि समझाने वाला एक बड़ा शायर है और फिल्म को उसके मूड के हिसाब से वर्कआउट करने के लिए निर्देशक की तरफ से उत्तरदायी भी, तो फिर उन्होंने खेद व्यक्त किया। बाद में शॉट ओके हुआ और ये रिश्ते लंबे चले। शशि कपूर से तो उनका स्थायी रिश्ता ही बन गया था। इब्राहिम अश्क ने ही बताया कि अपने स्लिम और स्फूर्त रहने का राज बताते हुए शशि ने कहा था कि जब तक जेनिफर थीं, तब तक लगभग पच्चीस साल मैंने लंच नहीं किया था, दोपहर में सिर्फ लस्सी पीता था और खाना एक टाइम। ये उनका अनुशासन था।

कुछ समय पहले ही शेरी अकादमी, भोपाल ने उनकी शायरी की एक किताब `अलमास’ का प्रकाशन किया है। इसके पहले `इलहाम’, `आगही’, `कर्बला’, `अलाव’, `अन्दाज़े बयां और तकीदी शऊर’, `रामजी का दुख’, `बिजूका’, `नया मंजरनामा’, `आसमां अकेला’, `मुहाफिजे मिल्लत’, `अल्लामा इकबाल’, `आसमाने-गजल’, `सरमाया’, `मुंबईनामा’ किताबें आ चुकी हैं।

राकेश रोशन और सुभाष घई की फिल्मों के अलावा ‘दस कहानियां’, ‘वेलकम’, ‘आप मुझे अच्छे लगने लगे’, ‘कोई मेरे दिल से पूछे’, ‘ये तेरा घर ये मेरा घर’, ‘बहार आने तक’, ‘जीना मरना तेरे संग’, ‘दो पल’, ‘इन कस्टडी’, ‘तृष्णा’, ‘समझौता एक्सप्रेस’ फिल्मों के गाने भी उन्होंने लिखे हैं। इब्राहिम अश्क कहते हैं, `मैं शायरी को खुदा की देन और उसका नायाब तोहफा समझता हूं, जो खुदा अपने खास बंदों को ही अता करता है।

यही वजह है कि मैं अपने फन के मैयार और विकार को कभी गिरने नहीं देता, इससे कभी बेईमानी नहीं करता, सस्ती शोहरत और छोटी-छोटी ख्वाहिशों के लिए अपने फन को नीलाम नहीं करता। मैं गजल के शेर में उस बात का बेबाकी से इजहार करता हूं जो मेरा दिल कहता है।’

इब्राहिम अश्क की शायरी उनकी आत्मा का शाब्दिक बिंब है। वे बहुत चुप रहकर दुनिया को देखते हैं, बहुत सारे अनुकूलनों और विरोधाभासों के साक्ष्य होते हैं, जानते हैं मगर उनका आकलन बड़ा शांत होता है। उनकी सृजनात्मकता के कई छिपे पहलू भी हैं, जब वे बताते हैं कि कुछ दिनों पहले मिर्जा गालिब की जिंदगी पर एक नाटक में मुख्य भूमिका निभाई है, तो सुखद आश्चर्य होता है। मुंबई में इस नाटक के शो हुए हैं और बहुत पसंद किए गए हैं। 
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