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विवाह से भी जरूरी वफादारी

Sat, 15 Mar 2014 09:34 PM IST
तस्लीमा नसरीन
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मनुष्य शादी क्यों करता है? मनुष्य को छोड़कर दूसरे जीवों में विवाह का प्रचलन नहीं है, इसके वावजूद वे एक साथ रहते हैं, संतान पैदा करते हैं, संतानों को बड़ा करते हैं। एक दूसरे के प्रति वफादार होने के लिए शादी करना जरूरी नहीं है। अनेक प्राणी हैं, जो यौवन की शुरुआत में अपने लिए जो साथी चुनते हैं, उसी के साथ पूरा जीवन बिता देते हैं। मनुष्य शादी करता है अपने साथी के साथ सुख-शांति से जीवन बिताने के लिए, लेकिन कितने लोग इसमें सफल हो पाते हैं? अनेक मामले ऐसे होते हैं, जिनमें शादियां टूट जाती हैं या वे बगैर प्रेम और संवेदना के मशीनवत टिकी रहती हैं। बच्चों को असुविधा होगी, पैसों की तंगी होगी या लोग क्या कहेंगे-इस भय से शादियों को जबरन बचाए रखा जाता है।
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लगभग सभी धर्मों ने विवाह को पुरुष और नारी का 'पवित्र मिलन' घोषित किया है। ईश्वर पहले से ही पति या पत्नी तय करके रखता है। वही ईश्वर हमें आगाह कर चुका है कि पति-पत्नी के बीच विच्छेद न हो। लेकिन परम आस्तिक भी ईश्वर का यह उपदेश आज नहीं मानता। ईश्वर द्वारा तय कर दी गई पत्नी को तलाक देकर वह दूसरी पत्नी चुनता है। लगभग हर धर्म ने विवाह में हस्तक्षेप किया है। शादी जैसे व्यक्तिगत मामले को जबर्दस्ती सामाजिक मामला बना दिया गया है। लड़कियों को तो सामाजिक संपत्ति ही बना दिया गया है। शादी से पहले वह किसी से प्रेम करती थी या नहीं, शादी के बाद पति के अलावा उसका और किसी से तो संबंध नहीं, वह किसके साथ बाहर जाती है, कब लौटती है, बाहरी पुरुष घर आता है या नहीं, इस पर बाहर के लोग भी नजर रखते हैं। समाज के कुछ लोगों को जैसे ही कुछ मामलों में आपत्ति होती है, लड़की के पिता, चाचा और भाई समाज में मुंह दिखाने के काबिल नहीं रह जाते। वे लड़कियों की हत्या कर परिवार की मर्यादा बचाते हैं।

सभ्य, शिक्षित दुनिया में शादी का चलन कम होता जा रहा है। अनेक प्रेमी-प्रेमिकाएं विवाह बंधन में न बंधकर भी गृहस्थी चला रहे हैं। संतान का पालन-पोषण कर रहे हैं। विवाह के पितृसत्तात्मक स्वरूप पर वे हंसी-ठट्ठा भी करते हैं। उत्तर यूरोपीय देशों में अलबत्ता शादी करने के पीछे एक कारण है। वहां शादी करने पर टैक्स कम देना पड़ता है, बच्चों के पालन-पोषण का खर्च भी सरकारें ही देती हैं। वहां लोग शादी करना नहीं चाहते, बच्चों के प्रति भी उत्साह नहीं है। विवाह प्रथा खत्म हो जाने पर संतान उत्पादन की धीमी दर और कम हो जाएगी, फिर उन देशों का अस्तित्व ही नहीं रहेगा-इस आशंका के कारण सरकारों ने शादी को प्रोत्साहित करने के लिए टैक्स छूट देने का कदम उठाया है।
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बंगाली समाज में शादी के बाद लड़कियों के पर काट दिए जाते हैं। अपना घर-आत्मीय स्वजन-बंधु-बांधव छोड़ना पड़ता है। नाम के साथ पति की पदवी जोड़नी पड़ती है। बालिग और शिक्षित होने के बावजूद वह नौकरी करेगी या नहीं, यह फैसला पति और उसके परिवार वाले ही लेंगे। पत्नी घर साफ करेगी, खाना बनाएगी, सबको परोसेगी, सबकी सेवा करेगी और बच्चे पालेगी। आजकल हालांकि पति और उसके आत्मीय स्वजन चाहते हैं कि पत्नी नौकरी करे, घर में आय का अतिरिक्त स्रोत बने। पति की तुलना में पत्नी का वेतन अधिक होने पर भी समाज उसे अतिरिक्त आय मानता है! पत्नी के वेतन के पैसे किस मद में खर्च होंगे, यह फैसला लेने का अधिकार भी पति को होता है। इसके पीछे धारणा यह है कि पैसा कमाने के बावजूद औरतें रुपये-पैसे के बारे में बहुत समझदारी नहीं रखतीं। कोलकाता में पति-पत्नी का प्रेमहीन संबंध देख मैं कभी-कभी सिहर उठती थी। लगातार तकलीफ भरा जीवन जीते-जीते महिलाएं इसका अभ्यस्त हो जाती हैं। जिन बच्चों के लिए वे शादी को बचाए रखती हैं, वे घर में होते झगड़ों के बीच बड़े होते हैं। आर्थिक आत्मनिर्भरता और सामाजिक सुरक्षा के अभाव में महिलाओं के लिए अकेला रहना कठिन है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि संवेदनहीन पति के साथ समझौता ही किया जाए। पत्नियों पर अत्याचार और उनकी हत्या के आंकड़े जिस रफ्तार से बढ़ रहे हैं, वे डरावने हैं।

जिस समाज में शिक्षित, आत्मनिर्भर और सचेतन लड़कियों की संख्या ज्यादा है, वहां तलाक के आंकड़े अधिक हैं, विवाह के कम। अलबत्ता भारतीय उपमहाद्वीप में उपार्जनहीन परनिर्भर लड़कियों की तरह आत्मनिर्भर, शिक्षित लड़कियों को भी निरंकुश पतियों को चुपचाप सहना पड़ता है। यहां विवाह पुरुष के लिए अर्जन है, तो महिला के लिए विर्सजन। यहां विवाह एक का अकेलापन दूर करता है, पर दूसरे के पैरों में जंजीर डाल देता है! समाज में बर्बरताएं अभी बची हुई हैं-कहीं जाति-वर्ण का गणित है, कहीं दहेज का हिसाब है, कहीं औरत को दासी समझने की मनोवृत्ति है, कहीं बेटी न पैदा करने का दबाव है, और बेटा न पैदा कर पाने पर तलाक और पुनर्विवाह के विकल्प हैं।

खुले समाजों में विवाह के उद्देश्य बदले हैं और तरीके भी। पाश्चात्य समाज में महिलाओं की स्वाधीनता और अधिकार की लड़ाई लंबे समय से चल रही है। इसलिए वहां शादी पुरुषों के लिए वंश चलाने का उपक्रम नहीं है, न ही विवाह का उद्देश्य पत्नियों से घर चलाना है। वहां संतान न पैदा करने पर भी मुश्किल नहीं है। आपसी संबंध को सुखी बनाने के लिए विवाह जरूरी नहीं है, एक दूसरे के प्रति प्यार और विश्वास जरूरी है। विवाह अगर वफादारी का ही रिश्ता होता, तो इतने परकीया संबंध नहीं पनपते। विधिवत शादी न करके जो लोग लिव-इन में रह रहे हैं, उनके बीच भी वफादार बने रहने की यह अलिखित शर्त आयद होती है। 
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