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एक महान सेनापति का जाना

अरुणेन्द्र नाथ वर्मा Updated Wed, 02 May 2018 07:19 PM IST
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अरुणेन्द्र नाथ वर्मा
देश के विभाजन के समय अन्य अखिल भारतीय सेवाओं के अधिकारियों की तरह वायुसेना अधिकारियों के सामने भी पाकिस्तान या भारत में से किसी एक को चुनने का प्रश्न खड़ा हो गया था। यही प्रश्न तरुण इदरीस हसन लतीफ के सामने भी था। नौ जून, 1923 को जन्मे लतीफ को केवल 19 वर्ष की आयु में रॉयल इंडियन एयर फोर्स में पायलट की हैसियत से नियुक्ति मिली थी।


उसके बाद 1947 तक के पांच वर्षों में इंग्लैंड में रॉयल एयर फोर्स के हरिकेन और स्पिटफायर जैसे लड़ाकू हवाई जहाज उन्होंने उड़ाए थे। इन्हीं दो लड़ाकू विमानों और उनके जैसे निडर एवं कुशल चालकों के बूते बैटल ऑफ ब्रिटेन के घमासान आकाशीय युद्ध में जीत हासिल कर के ब्रिटेन ने द्वितीय विश्वयुद्ध की दिशा बदल दी थी। इंग्लैंड से लौटकर इदरीस लतीफ ने विभिन्न तरह के लड़ाकू विमान उड़ाए। पहले कराची की नंबर दो कोस्टल डिफेंस फ्लाईट के वापिटी वायुयानों को उड़ाते हुए अरब सागर में दुश्मन की पनडुब्बियों को निशाना बनाने का किरदार निभाया।


फिर 1943-44 के बर्मा अभियान में जंगलों में छुपी जापानी सेना के जमीनी निशानों को हरिकेन लड़ाकू विमानों से नेस्तनाबूद करने के बिलकुल फरक किरदार में इतना सफल प्रदर्शन किया कि उनके तत्कालीन कमान अधिकारी स्क्वॉड्रन लीडर असगर खान और उनके सहायक फ्लाइट लेफ्टिनेंट नूरखान को आग्रह करना पड़ा कि वह भी उनके साथ पाकिस्तान जाने का विकल्प चुनें। लेकिन तत्कालीन हैदराबाद रियासत के चीफ इंजीनियर हसन लतीफ के इस पराक्रमी बेटे ने स्पष्ट कर दिया कि अपने देश की पहचान अपने निजी धर्म से बहुत बड़ी होती है। एक सैनिक का धर्म उसका देश और उसकी सेना होती है। 


स्क्वाड्रन लीडर असगर खान और फ्लाइट लेफ्टीनेंट नूर खान पाकिस्तानी वायुसेना में चले गए और आगे चलकर पाकिस्तानी वायुसेना के सेनापति भी बने। लेकिन जब उन्होंने 26 जनवरी 1950 के भारतीय गणतंत्र की स्थापना के पहले समारोह के फ्लाईपास्ट में इदरीस हसन लतीफ को भारतीय वायुसेना का विमान उड़ाते हुए भारतीय गणतंत्र के राष्ट्रध्वज को सलामी देने की खबर सुनी होगी, तो जरूर उन्होंने आगे भी उनके कैरियर पर नजर रखी होगी। उनकी भ्रामक भविष्यवाणियों को गलत करते हुए जब एयर चीफ मार्शल इदरीस हसन लतीफ ने 31 अगस्त1978 को भारतीय वायुसेनाध्यक्ष का पद संभाला, तो उनकी इस निजी सफलता ही नहीं, भारतीय गणतंत्र की परिपक्वता से भी उन्होंने रश्क किया होगा। 


वायुसेनाध्यक्ष के गरिमामय पद पर आसीन यह सज्जन सेनापति कॉकपिट के अपने साथी को पायलट, नेवीगेटर या फ्लाईट इंजीनियर को अपने पद की ऊंचाई का एहसास नहीं होने देता था। जो कोई उनके संपर्क में आता उनके निश्छल स्वभाव, सौम्यता, सज्जनता और उनका कायल हो जाता। 


1971 में भारत पाक युद्ध के पहले वे सहायक वायुसेनाध्यक्ष (योजना) रहे, जहां उनके प्रशंसनीय योगदान के लिए उन्हें परम विशिष्ट सेवा मेडल नवाजा गया। अगस्त 1978 में वायुसेनाध्यक्ष बनकर उन्होंने अपने पुराने साथियों नूर खान और असगर खान को दिखा दिया कि गणतांत्रिक भारत को अपने उन कर्तव्यनिष्ठ योद्धाओं पर गर्व है, जिनका धर्म केवल देशसेवा और देशभक्ति हो। तीन दिन पहले 30 अप्रैल को इस जांबाज ने हम सबको अलविदा कह दिया।


-लेखक सेवानिवृत्त विंग कमांडर हैं।
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