पिछले दिनों एक नामी-गिरामी अंग्रेजी स्कूल ने अपने सालाना आयोजन में लॉर्ड मैकाले की आत्मा को विशिष्ट अतिथि के रूप में आमंत्रित किया। अंग्रेजों की आदत के मुताबिक, जब वह सही समय पर पहुंचे, तब तक प्रिंसिपल और दूसरे लोग भी नहीं आए थे।
इस पर मैकाले की आत्मा नाराज तो हुई, लेकिन भारत चूंकि आजाद हो चुका था, ऐसे में वह ज्यादा कुछ नहीं कह सकती थी। लेकिन उसके भाषण में भारतीयों के प्रति खुन्नस साफ झलक रही थी। उसने अपना भाषण कुछ इस तरह शुरू किया,
सज्जनो और देवियो,
मुझे यहां बुलाना ऐसा ही है, जैसे संघ की सभा में किसी कांग्रेसी या कम्युनिस्ट नेता को बुलाना। मैं अभी एक अंग्रेजी मीडियम स्कूल से आ रहा हूं। हिंदी बोलने पर वहां पनिशमेंट है। उस स्कूल में फीस, ड्रेस, किताबें मिलाकर कुल खर्च एक लाख सालाना है। वहां मौजूद गार्जियन से जब मैं बोला कि इस देश की गरीबी को देखते हुए यह बहुत महंगा है, तो वह बोले, एक नहीं, दो लाख ले लो, पर अपने बेबी को अंग्रेजी बोलना मांगता।
आजादी के बाद यहां दूसरे देशों से जो नेता आए, वे अपनी भाषा बोलते थे। लेकिन भारत के नेता अंग्रेजी में बोलते हैं। क्या आपकी कोई भाषा नहीं है? आज एक हिंदुस्तानी बेटा अपनी मां को मम्मी या मॉम बुलाता, पिता को डैड बोलता है। यहां तक कि अपनी हमवतन लड़की से मोहब्बत का इजहार करता, तो ‘आई लव यू’ बोलता। गनीमत है कि आप लोग मुर्दे को फेयरवेल देते समय, राम नाम सत्य है, बोलते हैं।
हम मुट्ठी भर अंग्रेजों ने करोड़ों की आबादी वाले इस देश पर डिवाइड ऐंड रूल से रूल किया। आपके नेताओं ने भी हमारी ही नकल की। आप सबका कल्चर एक है, हिंदी सब देशी भाषाओं की बहन की तरह है। फिर भी हिंदी को उसका हक नहीं मिल पाया। जब हमने आप पर राज किया, तो अपना सिस्टम चलाने के लिए देसी बाबुओं की जरूरत थी। पर आपकी क्या मजबूरी है कि अंग्रेज बनना चाह रहे हैं? आप अपने नेशन, अपनी मदरटंग के लिए कुछ क्यों नहीं करते? आपके देश में हिंदी पढ़ना, बोलना फालतू क्यों हो गया?
विशिष्ट अतिथि के भाषण पर तालियां बजाना मजबूरी है। नहीं तो मैकाले से तब भी भारत के लोग नफरत करते थे, और अब उनकी आत्मा के भाषण पर भी लोग नाराज हैं। अब शायद ही किसी आयोजन में उसे बुलाया जाए।