की प्रस्तावना में शशि थरूर ने विस्तार से बताया है कि उन्होंने यह किताब क्यों लिखी। उनके मुताबिक उन्होंने एक हिंदू की सही रूपरेखा प्रस्तुत करने के लिए यह किताब लिखी, क्योंकि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ तथा भगवा ब्रिगेड ने अपने शब्दों और अपनी कार्रवाइयों से उसे नुकसान पहुंचाया है। उन्होंने एक विशुद्ध, मौलिक हिंदू प्रस्तुत किया है, जोकि उदार है और सभी धर्मों के प्रति सम्मान का भाव रखता है, लैंगिक समानता तथा समावेशन पर विश्वास करता है और जोकि न केवल प्रतिकूल दृष्टिकोण बर्दाश्त करता है, बल्कि उसका सम्मान भी करता है।
कोई भी समझदार व्यक्ति ऐसे श्रेष्ठ गुणों में कोई गलती नहीं ढूंढ़ सकता। लेकिन यदि आज के भारत को देखें, तो क्या ऐसा नहीं लगता कि सही साबित होने के लिए पूरी तरह से निष्कलंक होना चाहिए? यदि हम सदियों के हिंदू समाज पर शशि के मानदंडों को कड़ाई से लागू करके देखें, तो भारतीयों की बड़ी संख्या सही हिंदू होने की योग्यता पूरी नहीं कर पाएगी!
क्या महाभारत के द्रोणाचार्य जिन्होंने सिर्फ राजकुमारों को ही शिक्षा दी और जिन्होंने एकलव्य से उसका अंगूठा मांग लिया था, जबकि उन्होंने उसे कभी शिक्षा भी नहीं दी थी (उनके इस कृत्य को कुछ वर्ष पूर्व देश के एक प्रधान न्यायाधीश ने घृणास्पद तक करार दिया था) उन्हें क्या शशि की परिभाषा के आधार पर हिंदू कहा जा सकता है? क्या उस व्यक्ति को हिंदू कह सकते हैं, जिसने यह आदेश दिया था कि जो भी शूद्र वैदिक पाठ सीखने की कोशिश करे उसके कानों में पिघलता सीसा डाल देना चाहिए? ब्राह्णणवादी व्यवस्था को मानने वाले शुंग और सातवाहन शासनों के समय हिंदू समाज में शूद्रों का स्थान कहां था? क्या उन्हें संपत्ति का अधिकार और शिक्षा का अधिकार प्राप्त था?
चंद्रगुप्त विक्रमादित्य भारत के सर्वाधिक सफल और प्रबुद्ध राजाओं में से एक थे; कला, साहित्य और वास्तुकला उनके शासन में काफी फली-फूली। लेकिन इस प्रबुद्ध शासक के साम्राज्य में भी सकरी गलियों से गुजरते वक्त शूद्रों को अपने शरीर में बांस की बारीक लकड़ी और घंटी बांधनी पड़ती थी, ताकि घंटी की आवाज के जरिये वे वहां से गुजर रहे उच्च वर्ग के लोगों को आगाह करते थे, ताकि उन पर उनकी छाया तक न पड़े!
यह सच है कि बेबीलोनिया में सताए गए यहूदी ईसा मसीह के जन्म से छह सदी पहले भारत में पहुंचे और आज भले ही उनकी संख्या एक हजार रह गई हो, मगर वह भारत में यहां के 1.3 अरब लोगों से खुद को असुरक्षित महसूस नहीं करते। ईरान से यहां आए पारसियों की संख्या दस लाख से भी कम होगी, मगर वे भारत की जीडीपी में तकरीबन 19 फीसदी का योगदान करते हैं। और हमने अल्बेनियाई नन को न केवल अपनाया उन्हें मदर टेरेसा कहा और देश के सर्वोच्च नागरिक अलंकरण भारत रत्न से नवाजा।
इस भूमि में मिसाल दी जा सकने वाली ऐसी उदारता और सहिष्णुता कहां से आई, जबकि निचली जातियों के साथ हम अमानवीय तरीके से पेश आते रहे हैं और कई बार तो गुलामों से भी बद्तर? त्रावणकोर में निचली जाति की महिलाओं को अपने स्तन ढंकने और अपने शिशुओं को दुग्धपान कराने के लिए कर देना पड़ता था! दुनिया में कोई और दूसरा देश नहीं मिलेगा, जहां महिलाओं पर इस तरह का कर लगाया गया हो।
चूंकि अस्पृश्यता आज भी सैकड़ों गांवों में दंड मुक्ति के साथ कायम है, लाखों भारतीयों को बंधुआ या बाल मजदूर के रूप में जीवन यापन करना पड़ रहा हो, हर छत्तीस मिनट में किसी दलित महिला के साथ बलात्कार होता हो, दलित दूल्हे को अपनी बारात घोड़े या हाथी पर बैठ कर निकालने के लिए अदालत के हस्तक्षेप की जरूरत पड़ती हो, सिर्फ मूंछे बढ़ाने के कारण किसी दलित पर हमला किया जाता हो, ऊना, उन्नाव, बदांयु जैसी शर्मनाक घटनाएं होती हों, ऑनर किलिंग होती हो, लाखों कन्या भ्रूणों को गर्भ में मार डाला जाता हो, दहेज के नाम पर हत्याएं होती हों, ऐसे में क्या भारत वैधानिक तरीके से खुद के एक सहिष्णु समाज होने का दावा कर सकता है? हिंदुओं की वह बहुप्रचारित सहिष्णुता कहां गायब हो गई? कहीं ऐसा तो नहीं कि वह हमेशा से किताबों में तो रही है, मगर व्यवहार में गायब?
महमूद गजनवी ने भारत पर 17 बार हमले किए और उसने सोमनाथ सहित अनेक मंदिरों को लूटा, लेकिन हैरत है कि बहादुर समझे जाने वाले हिंदू राजा 17 वर्ष तक उसे पराजित नहीं कर सके थे। ब्रिटिश साम्राज्य का शासन जब चरम पर था, उस वक्त भी सिर्फ डेढ़ लाख ब्रिटिश नागरिक भारत में थे। इतने कम लोगों के साथ इतने बड़े देश पर शासन औपनिवेशिक शासन के योग्य प्रशासनिक और सैन्य अधिकारियों के दम पर किया गया था, क्योंकि हिंदू समाज विभिन्न वर्गों और सामाजिक पदानुक्रम में बंटा हुआ था और इन सबको निष्फल करने वाले राष्ट्रवाद की भावना का अभाव था।
यहां आए मुगल दूसरे हमलावरों की तरह यहां से माल लूट कर गए नहीं, बल्कि यहां रहकर उन्होंने अपना साम्राज्य स्थापित करने का फैसला किया। दुनियाभर के अपने समकालीन शासकों की तरह अत्याचारी और निरंकुश शासक थे। लेकिन उन्होंने कीमती स्मारकों, साहित्य, कला, संगीत, पेंटिग के साथ ही खानपान की समृद्ध विरासत छोड़ी जिसका प्रभाव हमारे दैनंदिन जीवन पर देखा जा सकता है। क्या अकबर या दारा शिकोह ने नहीं, बल्कि औरंगजेब ने रामायण, महाभारत और उपनिषद का पर्सियन भाषा में अनुवाद नहीं करवाया जोकि मुगल दरबार की आधिकारिक भाषा थी?
दुर्भाग्य से सत्तर वर्ष बाद भी विभाजन के जख्मों को लोकतंत्र की अनेक कामयाबियों के बाद भी भरा नहीं जा सका है। गोरक्षा से लेकर अल्पसंख्यकों को भारत छोड़ने की धमकी देने वाले कुछ भाजपा समर्थकों के ऐसे कृत्यों को खारिज किया जाना चाहिए, लेकिन इसके साथ ही क्या यह भी सच नहीं है कि भाजपा ने दूसरे दलों को भी खुद की हिंदू साख को रेखांकित करने को मजबूर कर दिया है? आखिर अधिकांश मतदाता हिंदू जो हैं! यह हिंदुइज्म की जीत है या फिर चुनावी राजनीति?