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सुंदरता के चश्मे से औरत को देखना

Fri, 07 Aug 2015 08:10 PM IST
मनीषा सिंह
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पश्चिमी सामाजिक मनोविज्ञानी नाओमी वुल्फ ने अपनी शोधपूर्ण किताब द ब्यूटी मिथ : हाउ इमेजेज ऑफ ब्यूटी आर यूज्ड अगेंस्ट विमेन में लिखा है कि यदि कोई पुरुष किसी स्त्री की सुंदरता का उद्धरण देता है, तो ज्यादातर मामलों में वह स्त्री को कोई यौन संदेश देने की कोशिश करता है। इस संदर्भ में अगर दिल्ली के पूर्व कानून मंत्री सोमनाथ भारती के हालिया बयान को देखें, तो उसे लेकर उठी आपत्तियों का मर्म समझ में आ जाता है।
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यों तो सोमनाथ भारती को अपने इस बयान में कोई समस्या नजर नहीं आती, जिसमें उन्होंने दावा किया था कि अगर पुलिस दिल्ली सरकार के हाथों में आ जाए, तो गहनों से लदी सुंदर से सुंदर महिला रात को 12 बजे बेखौफ सड़कों पर अकेली घूम सकती है। भारती के मुताबिक, वह चाहते हैं कि दिल्ली में पुलिस और कानून का ऐसा खौफ हो कि महिलाओं पर हमला न हो सके। मगर महिलाओं को उनकी सुंदरता या उनके शारीरिक सौंदर्य से आंकने की उनकी मानसिकता इस सदिच्छा के बावजूद कठघरे में है। इस बयान को दो साल पहले अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा द्वारा दिए गए एक बयान के संदर्भ में भी देखना चाहिए। कैलिफोर्निया में आयोजित एक समारोह में ओबामा ने अटार्नी जनरल कमला डी हैरिस की प्रशंसा करते हुए कहा था कि कमला बेहद मेहनती हैं और दूसरे अटार्नी जनरलों से ज्यादा सुंदर भी हैं। मेहनती और काम में कुशल होने की योग्यता उनकी सुंदरता से जोड़ी गई, तो काफी हंगामा मचा। सवाल उठे कि क्या कभी स्त्रियां किसी पुरुष की योग्यता का आकलन उनके शारीरिक सौष्ठव के आधार पर करती हैं? आखिरकार ओबामा की माफी के बाद ही मामला शांत हुआ।

दरअसल मुद्दा उस सामाजिक व्यवहार का है, जिसमें स्त्री-पुरुष के बीच टीका-टिप्पणियों और परस्पर बर्ताव से सवाल उठ खड़े होते हैं। पुरुषों को लगता है कि अगर किसी स्त्री को सुंदर कहा जाए और देहयष्टि के आधार पर उसकी तारीफ की जाए, तो वह प्रसन्न होगी। मगर कामयाबी या स्त्री के आगे बढ़ने की प्रक्रिया को देह की सुंदरता से जोड़े रखने की मानसिकता रखने वाले पुरुष यह देख नहीं पाते कि जिन ऊंचे मुकामों पर स्त्रियां हैं, वहां वे अपनी जेहनियत की वजह से हैं। इंदिरा नूई, चंदा कोचर, निशा देसाई बिस्वाल, किरण मजूमदार, सानिया मिर्जा, साइना नेहवाल जैसे तमाम उदाहरण हमारे सामने हैं। अगर इन हस्तियों की प्रशंसा देह की सुंदरता से की जाए, तो यह उनके लिए कितना कष्टकारी होगा? एक आम स्त्री को भी सिर्फ उसकी सुंदरता से आंकने का सीधा मतलब यही है कि उसकी वास्तविक योग्यताओं और क्षमताओं को कम अथवा नगण्य करके देखा जा रहा है।
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हालांकि इस पूरे संदर्भ में स्त्री की सुंदरता का मुद्दा खारिज नहीं हो जाता है। यह तय करने का वक्त आ गया है कि आखिर स्त्री की कैसी सुंदरता को देखना-परखना चाहिए। स्त्री के सौंदर्य को हम दो पैमानों पर आंक सकते हैं- एक है उसकी देह का सौंदर्य, और दूसरा है, उसकी सांस्कृतिक देह (कल्चरल बॉडी)। वक्त की जरूरत स्त्री की सांस्कृतिक देह को तवज्जो देने की है, जिसमें उसकी योग्यता, समझदारी और तरक्की को जांचा जाता है। भारत जैसे देश में, जहां अभी तक स्त्री को सिर्फ शारीरिक सुंदरता के पैमाने से देखा जाता है, स्त्री को उसकी सांस्कृतिक देह में ढालकर देखने की सख्त जरूरत है, अन्यथा किसी भी मसले पर टिप्पणी करते वक्त खुद को समझदार मानने वाला शख्स वही गलतियां कर सकता है, जो सोमनाथ भारती और उनकी तरह के तमाम अन्य राजनेता करते रहे हैं।
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