ड्रोन खराब संपर्क वाले, बाढ़, भूकंप और भूस्खलन की आशंका वाले प्रभावित क्षेत्रों का नक्शा तैयार कर चिकित्सा आपदाओं का रियल टाइम आकलन कर सकते हैं। हाई-रेजोल्यूशन कैमरों और सेंसरों से लैस ड्रोन तेजी से क्षति के पैमाने का आकलन कर सकते हैं और सर्वाधिक प्रभावित क्षेत्रों की पहचान कर सकते हैं, जिससे बचाव दल कुशलतापूर्वक संसाधनों का आवंटन कर सकें। भविष्य में ड्रोन मच्छरों के आवास जैसे रोग वाहकों की निगरानी के लिए जरूरी हो सकते हैं, जिससे वेक्टर जनित बीमारियों से निपटने में सहायता मिलेगी।
आपातकालीन स्थितियों में समय का बहुत महत्व होता है और ड्रोन प्रतिक्रिया समय को काफी कम कर सकते हैं, जिससे पीड़ितों के बचने की संभावना बढ़ जाती है। ड्रोन तेजी से दवाइयां, सांप के जहर को रोकने वाली दवाएं और रक्त उत्पादों को दुर्गम स्थानों तक पहुंचा सकते हैं। आपदा की स्थिति में प्राथमिकता निर्धारण में ड्रोन बहुत जरूरी हो सकते हैं। मेडिकल किट और संचार उपकरणों से लैस ये ड्रोन घायलों की स्थिति का आकलन कर सकते हैं और उस डाटा को आपातकालीन टीमों तक पहुंचा सकते हैं, ताकि वे चोटों की गंभीरता के आधार पर उपचार को प्राथमिकता दे सकें।
पूर्वोत्तर जैसे दूरदराज के क्षेत्रों में ड्रोन टीकों, दवाओं की विश्वसनीय आपूर्ति सुनिश्चित कर सकते हैं और जांच के सैंपलों का परिवहन कर सकते हैं। ड्रोन कोल्ड चेन बनाए रखकर टीकों का सुरक्षित परिवहन कर सकते हैं और सबसे अलग-थलग पड़े क्षेत्रों में उपलब्धता सुनिश्चित कर सकते हैं। टीकों के परिवहन के लिए 2021 में तेलंगाना के विकाराबाद जिले में 'मेडिसिन फ्रॉम द स्काई' नामक एक परियोजना शुरू की गई थी। आईसीएमआर ने पूर्वोत्तर भारत के दुर्गम क्षेत्रों में टीके और चिकित्सा आपूर्ति के लिए ड्रोन की व्यवहार्यता का आकलन करने के लिए ‘आई-ड्रोन’ नामक पहल शुरू की, जिसे अब हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना और दिल्ली-एनसीआर तक बढ़ा दिया गया है।
भारत में अपनी तरह का पहला ड्रोन स्टेशन मेघालय के वेस्ट गारो हिल्स की जेंगजाल सब-डिवीजनल अस्पताल में खोला गया, जो 50 किलोमीटर के दायरे में नियमित और आपातकालीन प्रसव को सक्षम बनाते हैं। प्रत्यारोपण के लिए अंगों को भी ड्रोन द्वारा जल्दी से पहुंचाया जा सकता है। ड्रोन की मदद से दूरदराज के क्लीनिकों से शहरी डायग्नोस्टिक सेंटरों तक जांच के नमूनों को तेजी से पहुंचाया जा सकता है, जिससे मेडिकल जांच और उपचार में देरी कम हो सकती है।
एम्स बिलासपुर ने ड्रोन के जरिये मिनटों में दूरदराज के इलाकों से एम्स बिलासपुर तक रक्त के नमूने पहुंचाने की व्यवहार्यता का प्रदर्शन किया। 'ड्रोन पर प्रयोगशाला' की अवधारणा एक रोमांचक नवाचार है, जहां निदान उपकरणों से लैस ड्रोन उड़ान के दौरान जैव रासायनिक विश्लेषण कर सकते हैं। यह स्वास्थ्य सेवा के बुनियादी ढांचे की कमी वाले क्षेत्रों में रियल टाइम जांच को सक्षम बनाता है। भारत में तपेदिक (टीबी) नियंत्रण पर ड्रोन का महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ रहा है।
तेलंगाना के यदाद्री भुवनगिरी जिले में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर तैनात ड्रोन संदिग्ध टीबी रोगियों के बलगम के नमूने जांच के लिए जिला अस्पतालों तक पहुंचाते हैं, जिससे निदान और उपचार में तेजी आती है। यह पहल राष्ट्रीय टीबी उन्मूलन कार्यक्रम (एनटीईपी) का हिस्सा है। ड्रोन तकनीक के साथ टेलीमेडिसिन दूरदराज के क्षेत्रों तक पहुंचने का समाधान प्रदान करता है। वे सार्वजनिक स्वास्थ्य निगरानी, सार्वजनिक घोषणाएं करने या महामारी में दूर से ही स्क्रीनिंग और निदान करने में भी सहायता करते हैं, जिससे संपर्क जोखिम कम होता है।
ड्रोन गंभीर रोगियों के लिए दवाओं की नियमित डिलीवरी सुनिश्चित कर सकते हैं और आपदाग्रस्त क्षेत्रों में भोजन, पानी और दवाओं जैसी आवश्यक आपूर्ति कर सकते हैं। चिकित्सा सेवाओं को विकेंद्रीकृत करके स्वास्थ्य सेवा को स्थानिक बनाने की उनकी क्षमता ग्रामीण आबादी के लिए बेहतर पहुंच सुनिश्चित करती है। कुल मिलाकर, कह सकते हैं कि ड्रोन भारत के दुर्गम और वंचित क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवा के लिए एक आशाजनक भविष्य प्रस्तुत करते हैं।
-लेखक पीजीआईएमईआर, चंडीगढ़ में मेडिसिन विभाग के पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष रहे हैं।