ज्ञान-वृद्धि और अनुभव-संचय के लिए देशाटन उपयोगी है। एक समय था, जब कवि के लिए और क्योंकि काव्यकार ही एकमात्र कृतिकार था, इसलिए समझ लीजिए कि अपने अर्थ में साहित्यकार मात्र के लिए देशाटन अनिवार्य समझा जाता था। किंतु देशाटन कैसे किया जाए, इसकी कोई विशेष पद्धति शास्त्रकारों ने नहीं बताई। तीर्थाटन की परंपरा थी, लेकिन उसका उद्देश्य अनुभव संचय नहीं, बल्कि पुण्य संचय था, और वह भी भवानुभव से मुक्ति पाने के लिए। यात्रा हमें वह सब कुछ सिखाती है, जो हमें पुस्तक नहीं सिखा पाती। यात्रा करने वाले कुछ ऐसे भी हैं, जो अंग्रेजी या दूसरी विदेशी भाषाएं जानते हैं और हिंदी भी पढ़ लेते हैं। कुछ ऐसे भी हैं, जो कोई विदेशी भाषा नहीं जानते या हिंदी के अतिरिक्त कोई दूसरी भाषा नहीं जानते। उनमें ऐसे लोग हैं, जो अनेक बार पश्चिम और पूर्व के विभिन्न देशों की सैर कर आए हैं। जब हम किसी यात्रा पर होते हैं, वहां अकेले बैठना, चुप बैठना-इस प्रश्न की चिंता से मुक्त होकर बैठना कि ‘क्या सोच रहे हो?’-यह भी एक सुख है। सोचने से ही सब कुछ नहीं होता-न सोचते हुए मन को चुपचाप खुला छोड़ देने से भी कुछ होता है-वह भी सृजन का पक्ष है। यह वैसे ही है, जैसे हमेशा कपड़े पहनने ही के लिए नहीं हैं-उतारकर रखना भी होता है-ताकि धुल सकें।
देशाटन तुम्हारी तुम्हीं से पहचान और गहरी करता है। तुम्हारी संवेदना की परतें उधेड़ता है, जिससे तुम्हारा जीना अधिक जीवंत होता है और यह सहारा देशाटन दे सकता है, उससे अलग कोई साहित्यकार व्यक्ति नहीं है, जो रास्ता बता सके। मानव जीवन का मुक्ति का एक साधन तो घूमना है। जीवन की संपूर्णता हासिल करनी है, तो घूमना जरूरी है। दुनिया में अनुभव द्वारा प्राप्त ज्ञान महत्वपूर्ण समझा जाता है। एक तो यह है कि आप पूरे मन से ध्यानपूर्वक पढ़ने लग जाएं। दूसरा तरीका यह है कि विपुल पृथ्वी की परिक्रमा पर निकल जाएं और यह चिंता छोड़ दें कि कब लौटना होगा या कब यात्रा पूरी होगी। मुझे यूरोप-भ्रमण के लिए छह मास का समय दिया गया, जिसे खींच-खांचकर मैंने दस मास तक बढ़ाया, लेकिन इतना समय भी केवल यही जानने भर पर्याप्त होता है कि कुछ भी जानने के लिए वह कितना अपर्याप्त है! लेकिन जानना ही सब कुछ नहीं है। देखना और जो देखा उसके बारे में सोचना बड़ी बात है। कभी-कभी यह भी हुआ कि विदेशी शहरों में जो बातें विशेष जान पड़ी थीं, भारत लौटकर पाया कि वे यहां भी पहुंच गई हैं।
सूत्र: एक पृष्ठ नहीं, पूरी किताब पढ़ें
दुनिया एक किताब है और जो लोग यात्रा नहीं करते, वे केवल एक पृष्ठ ही पढ़ते हैं। जब आप अपने हिस्से के पृष्ठ को पलटते हैं, यानी यात्रा करते हैं, तो यह आपको एक कहानीकार में बदल देती है। इसलिए जरूरी है कि आप एक पृष्ठ नहीं, बल्कि पूरी किताब पढ़ें, यों कहें तो पर्यटक न बनें, यात्री बनें। अंत में बहुत दूर तक यात्रा करें, आप स्वयं से मिलेंगे।