देश इस समय ऐसे जटिल मोड़ पर आकर खड़ा हो रहा है, जहां से रास्तों और दिशा को लेकर संभ्रम ज्यादा बढ़ गया है। पिछले कुछ वर्षों में सबसे ज्यादा हमला राजनीतिक प्रतिष्ठान पर हुआ है। राजनीति को लेकर आम लोगों की सोच का प्रतिबिंब यह है कि जब भी राजनीतिक दलों पर अंकुश लगाने का कदम शासन की कोई इकाई उठाती है, हम अजीब किस्म की खुशी प्रदर्शित करते हैं।
ऐसा लगता है, मानो राजनीति ही देश में तमाम बुराइयों की जड़ है। पहले राजनीतिक दलों के विरुद्ध चुनाव आयोग के कदम पर हम तालियां बजाते थे, पिछले महीने केंद्रीय सूचना आयोग द्वारा उन्हें सूचना कानून के कंटीले बंधन में बांधने की कोशिश पर हमने खुशियां मनाईं, अब सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दो वर्ष की सजा पाने या हिरासत में रहने वालों के चुनाव लड़ने को प्रतिबंधित करने तथा इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा जाति रैलियों पर रोक पर हम उछल रहे हैं। कुछ प्रतिक्रियाएं ऐसी हैं, मानो इनसे राजनीति में शुद्धिकरण की क्रांति हो जाएगी।
क्या वाकई ऐसा होगा? क्या सुधार और परिवर्तन के ये तरीके उचित हैं? राजनीतिक व्यवस्था का जो क्षरित, गलित और जननिरपेक्ष चेहरा व आचरण आज है, उसके लिए क्या आम जन यानी हम भी कहीं जिम्मेदार हैं? हम जो उम्मीदें कर रहे हैं, उसके संदर्भ में खुद आम जनों का रवैया कैसा है? सबसे पहले हमें इस सवाल का जवाब ढूंढना चाहिए कि देश चलाने और इसकी नियति संवारने की जिम्मेदारी किसकी है और किसकी होनी चाहिए। संसदीय लोकतंत्र में इसका संपूर्ण दायित्व राजनीति को दिया गया है। वे जनता के संगठन हैं, जनता द्वारा निर्वाचित होते हैं और उन्हें एक अंतराल के बाद जनता के बीच जाना ही पड़ता है। बेशक, राजनीतिक दल नेतृत्व, नीति, नीयत के स्तर पर क्षरण के शिकार हो चुके हैं। किंतु किसी अन्य संस्था का इस पर अंकुश या नियंत्रण इसका समाधान नहीं हो सकता। आखिर अन्य संस्थाओं का निर्माण भी इसी राजनीतिक प्रतिष्ठान ने किया है।
यह ठीक है कि जब नेतृत्व अपने कर्तव्यों से च्युत होता गया, तब ऐसे लोग आते चले गए, जो निजी या अपने समुदाय के हित के संकुचित दायरे में काम करने लगे। इसी कारण दूसरी संस्थाओं को इनके विरुद्ध सिर उठाने का अवसर मिला। लेकिन इससे निदान न हुआ, न हो सकता है। चुनाव आयोग ने तो 1991 से ही राजनीतिक दलों पर डंडा बरसाना आरंभ कर दिया। क्या उससे चुनावी राजनीति की सफाई हो गई? किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में ऐसी संस्थाओं की अपनी सीमाएं हैं। वास्तव में लोकतांत्रिक व्यवस्था में संस्थाओं के बीच असंतुलन अराजकता की स्थिति और बढ़ाने वाली साबित हो रही है।
न्यायालय खुद बढ़ते मुकदमों के बोझ से दबाव में है। क्या उसके लिए संभव है कि वह राजनीति एवं शासन के प्रत्येक अंग की गतिविधियों का संचालन कर सके? सर्वोच्च न्यायालय को संविधान की व्याख्या और उसके अभिभावक की भूमिका निभानी है, राजनीतिक सुधार और व्यवस्था शुद्धि का वाहक वह नहीं हो सकता। संसदीय लोकतंत्र की कल्पना करने वाले मनीषियों ने काफी सोच-विचार के बाद संसद की संप्रभुता और उसकी सर्वोच्चता का सिद्धांत तय किया। वस्तुतः शासन के तीनों अंगों के बीच जो संतुलन रेखाएं हैं, उनके पालन से ही यह प्रणाली स्वस्थ रह सकती है।
न्यायपालिका की चिंता वाजिब है। संविधान के अभिभावक होने के नाते उसे फैसला देने, पार्टियों व शासन की इकाइयों से प्रश्न पूछने और निर्देश देने का भी अधिकार है, लेकिन लोकतंत्र में न्यायिक सुधारों की अपनी सीमाएं हैं।
राजनीति की मौजूदा स्थिति ऐसी हो गई है, तो इसके लिए हम उतने ही जिम्मेदार हैं। अगर हम जातिवाद के संकुचित दायरे से बाहर रहने का निश्चय करें, तो दल या नेता जातिवाद को बढ़ावा कैसे दे पाएंगे? जातिगत समीकरण बनाकर सत्ता पर काबिज होने में नेता किसके कारण सफल हो रहे हैं? जाहिर है, व्यवस्था कोई भी हो, हमारा आचरण ही उसकी दिशा निर्धारण का आधार है। न्यायपालिका समाज सुधारक की भूमिका तो नहीं निभा सकती। यह राजनीतिक-सामाजिक परिवर्तन का मामला है। जन जागरण, आंदोलन, अभियान और बेहतर राजनीतिक विकल्प खड़ा करना ही इस दिशा में एकमात्र समाधान हो सकता है।