फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

मछली की जान आफत में

Sun, 29 Mar 2015 07:54 PM IST
सुनीता शानू
विज्ञापन
विज्ञापन
देखते-देखते विश्व कप खत्म हो गया। नए चैंपियन ऑस्ट्रेलिया को बधाई दी जा रही है। जबकि वह मछली सब कुछ छोड़-छाड़कर बैठी आंसू बहा रही है, जिसने सेमी फाइनल में भारत की जीत की भविष्यवाणी की थी। रोते-रोते वह सोच रही है कि ये लोग कितने चालू निकले, मेरे द्वारा भविष्यवाणी करवा दी, जो गलत साबित हो गई। ऐसे में, अब बचने का कोई भी चांस दिखाई नहीं दे रहा। मछली की जान आफत में है। वैसे भी मछली को पता होना चाहिए कि सिर्फ चाणक्य नाम रख देने से काम नहीं चलता, चाणक्य नीति का ज्ञान भी आवश्यक है। दूसरों का भविष्य बताते-बताते मछली अपना भविष्य नहीं जान पाई, कि जीतने वाली टीम उसे खुशी के मारे फ्राई करके खा जाएगी, और हारने वाली टीम तो कच्चा ही चबा जाएगी। अब क्या करे मछली? कौन-सी चाणक्य नीति अपनाए कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे?
विज्ञापन


सच मानें, तो इसमें मछली का कुसूर भी नहीं है। उसे तो बलि की मछली बना दिया गया है। मछली कब चाहती थी कि दुनियादारी के झमेले में पड़कर अपनी जान गंवाए। लेकिन यह लालच ही सबको डूबो देता है। अब यह लालसा प्रसिद्धि की रही हो या मुफ्त आता माल गटकने की। बड़े-बड़ों को इस लालच ने कहीं का नहीं छोड़ा है। वह तो एक मछली ही है।

कुछ लोग भविष्य बताने के लिए तोते का सहारा लेते हैं। कटी, तो तोते की गर्दन कटी, उनका क्या गया! ऐसे ही फुटबॉल विश्व कप के समय ऑक्टोपस बाबा महान हो गए थे। उसके बाद ऊंट महाराज की करवट बदलने पर लोग अटकलें लगाने लगे।
विज्ञापन


तो भैया, यह कहा गया कि मछली अंडे खाकर बताएगी कि किसे अंडा मिलेगा, किसे ट्रॉफी। अब इस अंडे के लालच में वह जाल में फंस गई है, उसे फ्राई होने से कोई नहीं बचा सकता। भविष्यवक्ता बनने की कीमत तो चुकानी ही होगी न। काश, यह मछली बोल पाती कि टीम की हार-जीत किसी की भविष्यवाणी पर नहीं, खिलाड़ियों के बल्ले पर टिकी होती है।
विज्ञापन

और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें