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इस बार लड्डू स्थगित ही समझें

Thu, 13 Nov 2014 07:47 PM IST
पूरन सरमा
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सर्दियों में लड्डू देसी घी वाले हों, तो स्वाद और स्वास्थ्य की बन आती है। पहले मेरे यहां भी लड्डू बनते थे। मेरे बच्चों की मां इस लड्डू निर्माण परियोजना से सदैव डरती रहती है। इसके पीछे दो कारण हैं। एक तो लड्डू हासिल करने के लिए बच्चों की लड़ाई और दूसरा इस परियोजना के क्रियान्वयन में होने वाला शारीरिक कष्ट। लेकिन इस बार मेरे बेटे ने उस दिन जिद पकड़ ली, जब एक मासिक पत्रिका से रचना प्रकाशनोपरांत धनादेश प्राप्त हुआ। बेटा मेरे पास आकर बोला, पापा, आप इतने बड़े लेखक हैं। क्या हमारे घर में देसी घी के लड्डू नहीं बन सकते? देसी घी के लड्डू से बच्चा कुशाग्र होता है। मैं कुशाग्र हो गया, तो बीए प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण कर सकता हूं।
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मैं बोला, बेटा, अगर लड्डुओं के भरोसे ही तुम्हारी प्रथम श्रेणी अटकी हुई है, तो तुम मां को तैयार करो, मैं अभी घी और मेवा लेकर आता हूं। तभी पत्नी भी वहीं आ गई और बोली, लड्डू तो मैं बना दूंगी, पर आपको भी निर्माण कार्य में हाथ बंटाना होगा। आप यह भी वायदा कीजिए कि मैं जिस तरह लड्डू बनाऊंगी, उस पर एक लेख अखबार में लिखेंगे?

मैं बोला, सर्दियों में घर में लड्डू बनाने की परंपरा अब रही नहीं। इसलिए लड्डू पर लेख भी अब कोई नहीं छापता।

पत्नी बोली, आपके नाम से सब छप जाता है। पिछले साल आपने आलू के रायते की विधि लिखकर एक महिला पत्रिका से दो सौ रुपये प्राप्त किए थे। लड्डू निर्माण विधि पर लेख से तो कम से कम चार सौ रुपये मिल जाएंगे। बल्कि लेख छप जाए, चेक आ जाए, तो लड्डू बनाने में आनंद भी ज्यादा आएगा।
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बेटा बोला, लिखने के भरोसे रह गए, तो लड्डू पता नहीं, किस साल बनेंगे। आपकी रचनाएं कई बार महीनों नहीं छपतीं। पारिश्रमिक भी छपने के छह महीने बाद ही प्राप्त होता है। पापा, क्यों न हम देसी घी और मेवा लाने अभी बाजार चलें? पर बेटे की गुस्सैल मां रास्ता रोके खड़ी थी। मैं बाजार जाता भी तो कैसे? इस साल तो लड्डू स्थगित ही समझें।
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