अर्जुन ने हनुमान को साधारण वानर समझकर हंसते हुए कहा, ‘मूर्ख मैं नहीं, तुम हो! अभी तुमने मेरे बाणों की शक्ति नहीं देखी। मेरा बनाया पुल कितना भी भार सहन कर सकता है।’
हनुमान ने अर्जुन का अहंकार तोड़ने का निश्चय किया। वह बोले, ‘तुम पुल बनाओ। मैं उसकी जांच करूंगा। यदि तुम्हारा सेतु मेरा भार सहन कर पाया, तो मैं तुम्हारा दास बन जाऊंगा। परंतु पुल टूट गया तो?’
अर्जुन ने आवेश में उत्तर दिया, ‘यदि मेरा बनाया पुल टूट गया, तो मैं प्राण त्याग दूंगा!’ यह कहकर अर्जुन ने गांडीव-धनुष संभाल लिया। अंहकार से ग्रस्त अर्जुन ने धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाई और फिर बाणों की ऐसी सतत वर्षा की कि बाण, पानी की सतह पर फैल गए और कुछ ही देर में बाणों का सेतु बनकर तैयार हो गया।
सेतु को देखकर हनुमान मुस्कराए और पुल की ओर चल पड़े। हनुमान ने ज्यों ही पुल पर पहला पैर रखा, सेतु चरमराकर ढह गया। यह देखकर अर्जुन को विश्वास नहीं हुआ। एक वृद्ध वानर के पैर रखने से संसार के सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर का बनाया सेतु ढह गया! अर्जुन लज्जित महसूस कर रहा था। यह उसके लिए अपमान से कम नहीं था। वह शर्त हारने पर प्राण त्यागने का वचन दे चुका था।
अर्जुन अपने लिए चिता तैयार करने लगा। हनुमान ने अर्जुन को रोकने का प्रयास भी नहीं किया, क्योंकि हनुमान चाहते थे कि अर्जुन को अहंकार का दंड मिले। अर्जुन चिता में प्रवेश करने ही वाला था कि तभी एक नवयुवक आ पहुंचा।
युवक ने अर्जुन से उसके प्राण त्यागने का कारण पूछा, तो अर्जुन ने युवक को पूरी घटना विस्तार से बताई, जिसे सुनकर युवक बोला, ‘तुम दोनों की शर्त का कोई साक्षी नहीं था, इसलिए वह शर्त वैध नहीं ठहरती। अब मैं साक्षी हूं। मेरे सामने तुम एक बार फिर अपने बाणों से पुल बनाओ। फिर मैं इस वानर को अपनी शक्ति प्रदर्शन का अवसर दूंगा। उसके बाद ही शर्त का निर्णय होगा।’
हनुमान और अर्जुन ने युवक की बात मान ली। इस बार अर्जुन घबराया हुआ था। उसने बाणों से सेतु बनाने से पहले श्रीकृष्ण का स्मरण किया। इसके बाद युवक के संकेत पर हनुमान पुल पर चढ़ गए। परंतु इस बार पुल गिरा नहीं, अपितु मजबूती से टिका रहा। हनुमान जोर-जोर से सेतु पर कूदने लगे। परंतु सेतु तनिक भी नहीं हिला। उन्होंने जिस रूप में लंका जाते समय छलांग लगाई थी, वही उग्र और विशाल रूप धारण कर लिया। अर्जुन को अपनी आंखों पर विश्वास नहीं हुआ। हनुमान ने कई बार पुल तोड़ने का प्रयास किया, किंतु उन्हें सफलता नहीं मिली।
अर्जुन और हनुमान दुविधा से भरे एक-दूसरे को देख रहे थे, जबकि पास खड़ा युवक मुस्करा रहा था। दोनों समझ गए कि वह साधारण युवक नहीं था। फिर युवक ने अपना असली रूप प्रकट किया, तो पता लगा कि वह दरअसल, भगवान विष्णु थे!
विष्णु ने अर्जुन और हनुमान से कहा, ‘मैंने जब देखा कि मेरे दोनों भक्त अहंकार से पीड़ित हैं, तो मुझे यह लीला करनी पड़ी।’