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अफवाह और हादसा: जलगांव दुर्घटना से सबक, आपातकालीन प्रक्रियाओं को लेकर यात्रियों को जागरूक बनाने की कवायद जरूरी

अमर उजाला Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Fri, 24 Jan 2025 05:51 AM IST

सार

पुष्पक एक्सप्रेस में आग की अफवाह के बाद कुछ यात्रियों के ट्रेन की चेन खींचकर बाहर कूदने और दूसरी तरफ से आ रही कर्नाटक एक्सप्रेस द्वारा उन्हें रौंदे जाने की घटना बेहद हृदयविदारक है, जो यह भी दर्शाती है कि एक छोटी-सी अफवाह किस तरह हादसे का रूप ले सकती है।
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जलगांव रेल हादसा - फोटो : पीटीआई


एक प्रत्यक्षदर्शी के अनुसार, जनरल बोगी यात्रियों से खचाखच भरी थी, तभी वहां मौजूद वेंडरों में से किसी एक ने ट्रेन में आग लगने की चीख लगाई। कुछ सेकंड बाद जब ट्रेन रुकी, तो कूपे के दोनों दरवाजों में से बाहर कूदने के लिए भगदड़ मच गई। दूसरी पटरी पर बंगलूरू से दिल्ली जा रही कर्नाटक एक्सप्रेस के लोको पायलट को मोड़ की वजह से पुष्पक के लोको पायलट द्वारा जलाई गई फ्लैश लाइट देर से दिखी और इससे पहले कि कोई कुछ समझ पाता पुष्पक एक्सप्रेस से कूदे यात्री इसकी चपेट में आ गए।


गनीमत है कि कर्नाटक एक्सप्रेस के लोको पायलट ने ब्रेक लगा दिए थे, वरना यह हादसा और भी भयावह हो सकता था। लेकिन यह भी है कि जलगांव खंड में ट्रेनों की औसत रफ्तार सौ किलोमीटर प्रति घंटे से ज्यादा ही होती है, लिहाजा ब्रेक लगाने के बाद भी ट्रेन को रुकने में समय लगा, जो एक अफवाह के मानवीय त्रासदी का रूप लेने के लिए काफी था। ये अफवाहें दरअसल सूचनाओं का अराजक प्रवाह होती हैं, जो मनुष्य में डर और असुरक्षा की भावना पैदा करती हैं। मुश्किल यह है कि जब कोई सूचना डर पैदा करती है, तो लोग बगैर पुष्टि किए, उस पर भरोसा भी कर लेते हैं। इसे ही मनोविज्ञान में फाइट या फ्लाइट रेस्पॉन्स कहा जाता है, जहां व्यक्ति त्वरित निर्णय लेकर खुद को सुरक्षित महसूस करना चाहता है।


ट्रेन में आग लगने की अफवाह ने भी कुछ ऐसा ही किया। भीड़ में अफवाह तेजी से फैलती है, और लोग ‘भीड़ मनोविज्ञान’ के अनुसार दूसरों का अनुसरण करने लगते हैं। इस मामले में भी यकीनन ऐसा ही हुआ, जब कुछ यात्रियों को ट्रेन से कूदते देख बाकी भी बगैर सोच-विचार किए कूद गए। जबकि ट्रेन में कहीं कोई आग नहीं लगी थी, जिसकी पुष्टि रेलवे भी कर चुका है। बहरहाल, ताजा हादसा सभी के लिए एक सबक होना चाहिए। रेलवे तंत्र की बेशक इसमें कोई चूक न हो, फिर भी यात्रियों को आपातकालीन प्रक्रियाओं को लेकर जागरूक बनाने के प्रयास तो किए ही जा सकते हैं।

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