कश्मीर के राजा चंद्रापीड़ ने राज्य में भगवान त्रिभुवनेश्वर का मंदिर बनवाने का आदेश दिया। जिस भूमि पर मंदिर का निर्माण शुरू किया गया, उसी के पास एक चर्मकार की झोपड़ी थी।
राजा के मंत्री ने उस चर्मकार को समझाया, तुम इस जमीन के बदले धन ले लो या तुम्हारे लिए अन्यत्र एक मकान बनवा कर दे देंगे। चर्मकार ने कहा, यह झोपड़ी मेरे परदादा ने बनवाई थी। अपने पुरखों की इस जमीन से मेरा मोह है। मैं इसे नहीं छोड़ सकता।
एक दिन राजा ने चर्मकार को अपने दरबार में बुलाकर जमीन मंदिर के लिए देने को कहा। जब उसने आनाकानी की, तो राजा के मुंह से निकला, मैं अपने महल के लिए तो जमीन मांग नहीं रहा हूं। भगवान के मंदिर के लिए मांग रहा हूं। तुम्हें कुछ तो धर्म का ध्यान रखना चाहिए।
यह सुनकर चर्मकार ने कहा, महाराज, आपको भी तो धर्म के नियमों का पालन करना चाहिए। मेरे घर आकर मंदिर के लिए जमीन मांगनी चाहिए थी। आपने तो उल्टे मुझे दरबार में बुलाकर एक प्रकार से जमीन देने के लिए दबाव ही डाला है।
राजा यह सुनकर हतप्रभ रह गए। वह उसी शाम मंत्री के साथ उस गरीब की झोपड़ी पर गए। चर्मकार ने हाथ जोड़कर कहा, अब मुझे जमीन मंदिर को देते हुए पूर्ण संतोष हो रहा है। भगवान के लिए मंदिर के निर्माण में मेरी छोटी झोपड़ी का भी योगदान है, क्या यह मेरे लिए कम गौरव की बात है!