मुझे ऐसा लगा कि मैं राजमोहन गांधी की रचनाओं के बारे में अच्छी तरह से जानता हूं, लेकिन हाल ही में एक मित्र ने मुझे राजमोहन का वह भाषण दिखाया, जिसे मैंने पहले नहीं पढ़ा था। यह भाषण उन्होंने सितंबर 1991 में राज्य सभा का सदस्य रहते हुए दिया था। राजमोहन गांधी द्वारा उस समय की टिप्पणियां भारत के लिए आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं।
राजमोहन पूजा स्थल विधेयक पर बहस में बोल रहे थे। इस विधेयक का उद्देश्य ‘किसी भी पूजा स्थल के रूप को 15 अगस्त 1947 की स्थिति जैसा बनाए रखने’ का था। हालांकि, इस विधेयक में एक अपवाद था; अयोध्या में जहां बाबरी मस्जिद खड़ी थी, जिसे कई हिंदू राम जन्मभूमि मानते थे, इसे इस विधेयक से बाहर रखा गया था। उस समय केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी। यह बिल लोकसभा में तो भाजपा के विरोध के बावजूद पास हो गया, जिसने यह कहा था कि यह संघवाद के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है। ऐसे में राज्य सरकारों को इस बात की स्वतंत्रता होनी चाहिए कि उसके नियंत्रण में आने वाले धार्मिक स्थलों के साथ जैसा वह चाहे व्यवहार करे। अब यह विधेयक संसद के ऊपरी सदन में चर्चा के लिए था।
राजमोहन गांधी ने उस समय राज्यसभा में जनता दल के सदस्य के रूप में बहस की शुरुआत की थी। उनकी टिप्पणियां भारत के अतीत के प्रति उनकी गहरी समझ को दर्शाती थी। उन्होंने उस समय ही पुराने घावों को कुरेदने से आज पैदा होने वाले खतरों के बारे में आगाह किया था। उन्होंने अपने भाषण की शुरुआत महाभारत का उदाहरण देते हुए की, जिसमें बताया गया है कि किस तरह से बदला लेने के लिए लाखों लोगों की हत्या कर दी गई थी। राजमोहन ने कहा था, महाभारत का यह सबक एक उदाहरण है कि ‘जब भी कोई प्रतिशोध की भावना के साथ गलतियों को सुधारने की कोशिश करता है, तो वह सिर्फ और सिर्फ विनाश करता है।’
विपक्ष में होने के बाद भी राजमोहन गांधी ने पूजा स्थल विधेयक का समर्थन किया था। उन्होंने कहा था कि जो लोग इस विधेयक को हिंदू विरोधी बता रहे हैं, वे वास्तव में ‘नया अलगाववाद’ फैला रहे हैं। उन्होंने इसे ‘हिंदू अलगाववाद’ और ‘हिंदू धर्म का एक भयावह और विकृत रूप’ कहा। उन्होंने कहा कि जो लोग इसके पीछे हैं, उनके बारे में मुझे यकीन है कि वे हिंदुओं का हित चाहते हैं, लेकिन अपनी भावनाओं और जुनून की वजह से बहक गए हैं।
राजमोहन गांधी ने कहा कि अतीत के अपराधों को इतनी गंभीरता से उठाकर इस ‘नए अलगाववादी हिंदू धर्म’ ने जानबूझकर वर्तमान की समस्या, गरीबी और भुखमरी, भ्रष्टाचार और हिंसा को नजरअंदाज कर दिया है। राजमोहन गांधी ने विधेयक का विरोध करने वालों को चेतावनी दी कि अतीत की लड़ाई से आपको छोटी या बड़ी राजनीतिक सफलता हासिल करने में मदद मिल सकती है, लेकिन इससे नई भावनाएं पैदा होंगी। यदि हम पुरानी गलतियों का प्रतिकार करना चाहते हैं, तो इससे राजनीतिक लाभ तो हो सकता है, लेकिन नए विवाद भी पैदा होंगे और यह लगातार नए संघर्षों का कारण बनेगा। उन्होंने स्पष्ट रूप से टिप्पणी की कि ‘जब हम हिंदू गौरव की भावना और अस्तित्व को नकदी, वोट या डरा-धमका कर बदलना चाहते हैं, तो भी हम हिंदू नाम का अपमान करते हैं।’
राजमोहन गांधी ने अपना भाषण भारतीय जनता पार्टी और उसके समर्थकों से यह अपील करते हुए समाप्त की थी कि हमें विधेयक की उस भावना को देखना चाहिए, जिसके तहत इसे सदन में लाया जा रहा है। ‘आइए हम इसे एक राष्ट्रीय संकल्प बनाएं : अभी तक, आगे नहीं। हां, विवाद होंगे, लेकिन हिंसा को रोका जाएगा। हम साथ मिलकर भविष्य और वर्तमान को देखेंगे न कि अतीत को।’ राजमोहन गांधी के वे शब्द आज फिर से सुनने योग्य हैं। अगस्त 2021 में, वाराणसी के कुछ हिंदुओं ने यह दावा किया कि वे ज्ञानवापी मस्जिद में पूजा करने का अधिकार रखते हैं, क्योंकि उनमें पुराने समय से हिंदू मूर्तियां होने का दावा किया गया था। एक स्थानीय अदालत और फिर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने सर्वेक्षण की अनुमति दी। इस निर्णय को मई 2022 में सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई। उस समय के मुख्य न्यायाधीश, डी.वाई. चंद्रचूड़ ने कहा कि 1991 के कानून के तहत ‘किसी स्थान के धार्मिक स्वरूप की पहचान’ की जांच पर कोई रोक नहीं है। दूसरे शब्दों में, यदि निचली अदालतें और अधीनस्थ न्यायाधीश ऐतिहासिक गलतियों को ठीक करने के प्रयास में (चाहे वह वास्तविक हो या काल्पनिक) कुछ कदम उठाना चाहते हैं, तो उन्हें ऐसा करने की पूरी स्वतंत्रता थी।
जैसा कि लेखक हर्ष मंदर ने संकेत किया है, मुख्य न्यायाधीश चंद्रचूड़ के इस अवलोकन ने ‘संभल में सिविल जज के आदेश को अनुमति दी, जिसके परिणामस्वरूप छह लोगों की मृत्यु हो गई। इसने उन “धार्मिक रूप से चुनौतीपूर्ण स्थानों” की एक शृंखला को बढ़ावा दिया, जिन्हें ज्ञानवापी के बाद उठाया गया।’ इन चुनौतियों को विशेष रूप से भाजपा शासित राज्यों में लागू किया गया है, जहां निचली अदालतों के मजिस्ट्रेट हिंदुत्व के दबाव के वातावरण में रहते हैं और अक्सर उन्हें कानून को निष्पक्षता से और बिना डर या पक्षपात के लागू करने में विश्वास नहीं किया जा सकता है।
12 दिसंबर को, जबकि इस कॉलम को अंतिम रूप दिया जा रहा था। सर्वोच्च न्यायालय ने पूजा स्थल अधिनियम को लेकर एक नई चुनौती पर सुनवाई शुरू की। हालांकि, जो कुछ अदालतों में हो रहा है, उससे परे, आज का व्यापक राजनीतिक माहौल भी हमें राजमोहन गांधी की 1991 की चेतावनियों को फिर से याद दिलाता है।
1998 से 2004 के बीच, पहले एनडीए शासन के दौरान, पार्टी के बड़े नेताओं ने खुले तौर पर कभी घृणा और कट्टरता का प्रचार नहीं किया था। यह बात सही है कि 1990 में लाल कृष्ण आडवाणी की रथ यात्रा अपने पीछे खून की धार छोड़ गई थी, लेकिन 1998 से 2004 तक एक गृह मंत्री के रूप में उन्होंने, अन्य केंद्रीय मंत्रियों और प्रधानमंत्री ने भी अपने सार्वजनिक बयानों में संयमित भाषा का उपयोग किया।
एनडीए के पहले शासनकाल के दौरान, विशेष रूप से ‘संघ परिवार’ के अंदर, कुछ ऐसे नेता शामिल थे, जिन्होंने अपने हिंदुत्व को गैर-हिंदुओं के खिलाफ घृणा से परिभाषित किया था। इनमें विश्व हिंदू परिषद, बजरंग दल और कुछ अन्य सांसद शामिल थे। आज के परिप्रेक्ष्य में गैर हिंदुओं ने नफरत करने वाले ही देश के सबसे शक्तिशाली राजनेता हैं। मैं अंत में राजमोहन गांधी द्वारा महाभारत से सीखे सबक को फिर से याद दिलाना चाहूंगा: ‘जो लोग इतिहास की गलतियों को प्रतिशोध की भावना से ठीक करने का प्रयास करते हैं, वे सिर्फ और सिर्फ विनाश का माहौल तैयार करते हैं।’