त्रिपुरा के चुनावी नतीजे निकलने के दूसरे दिन मूर्तिभंजन अभियान शुरू हो गया और तीन दिन में तीन महापुरुषों-लेनिन, आंबेडकर और परियार-की मूर्तियां तोड़ दी गईं। इन तीनों व्यक्तियों को एक सूत्र में बांधने वाली बात है समानता के प्रति उनकी निष्ठा, जिसमें स्त्री समानता भी शामिल है। लेनिन ने महिलाओं की मुक्ति के सवाल को निजी संपत्ति की सत्ता के खात्मे के साथ जोड़कर देखा और क्रांति के तुरंत बाद तमाम दिक्कतों के बावजूद उनकी सरकार ने महिलाओं की आजादी पर लगी बेड़ियों को तोड़ना शुरू किया। दुनिया में पहली बार महिलाओं को वोट देने का अधिकार, संपत्ति में बराबरी का अधिकार मिला। विवाह और तलाक, दोनों को सरल बना दिया गया। महिलाओं को शिक्षा और काम का, गर्भपात का, जमीन की मालकिन और परिवार की मुखिया बनने का अधिकार मिला। सबके लिए स्वास्थ सेवाएं नि:शुल्क कर दी गईं। राज्य को चर्च (धार्मिक सत्ता) से अलग कर विवाह और परिवार कानूनों को धार्मिक ताकतों के प्रभाव से मुक्त कर दिया गया। तमाम विकसित पूंजीवादी देशों ने सोवियत रूस की देखादेखी अपने यहां महिलाओं के अधिकारों के बारे में सोचना शुरू किया।
डॉ. आंबेडकर के बारे में हम काफी कुछ जानते हैं, पर महिलाओं के प्रति उनकी सोच पर कम विचार करते हैं। समानता की अपनी मुहिम में उन्होंने पत्रिकाओं का प्रकाशन शुरू किया, जिनमें महिलाओं की समस्याओं, लैंगिक समानता और महिला शिक्षा पर जोर दिया। उनके लिए महिलाओं का संपत्ति का अधिकार और राजनीति में हिस्सेदारी अनिवार्य थी। जुलाई, 1928 में मुंबई की विधानसभा में महिला मजदूरों के लिए आंबेडकर ने देश में पहली बार मातृत्व कल्याण कानून पारित करवाया। उन्होंने इस पर जोर दिया कि शिशु को जन्म देने के बाद मां को आराम की आवश्यकता होती है। वायसराय काउंसिल के श्रम मंत्री की हैसियत से उन्होंने खानों में कम करने वाली महिलाओं के लिए यह कानून पारित करवाया, जिसका लाभ 1961 में तमाम महिला मजदूरों को मिला।
न्याय मंत्री बनने के बाद बाबा साहब ने सबसे महत्वपूर्ण काम हिंदू महिलाओं पर लागू तरह-तरह के अन्यायपूर्ण नियमों को समाप्त करने की कोशिश करके की। हिंदू कोड बिल तैयार कर उन्होंने हिंदू महिलाओं को संपत्ति, विरासत और विवाह संबंधित क्षेत्रों में समानता प्रदान करने की कोशिश की। इसके लिए उन्हें जबर्दस्त प्रतिरोध का सामना करना पड़ा, क्योंकि सवर्ण समाज इन कानूनों को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था। ब्राह्मणवादी ताकतें, जिनमें पहले राष्ट्रपति राजेंद्र बाबू भी शामिल थे, हिंदू कोड बिल का रास्ता रोकने के लिए खड़ी हो गई थीं। अंततः आंबेडकर को इस्तीफा देना पड़ा।
पेरियार से मनुवादी लोग घृणा करते हैं। पेरियार ब्राह्मणवाद, हिंदू धर्म में मौजूद कर्मकांड और अंध भक्ति और बाल विवाह के जबर्दस्त विरोधी थे। वह हिंदू समाज की बुराइयों और जाति प्रथा के अन्याय के विरुद्ध खड़े हुए। उन्होंने अपनी बेबाक कलम और जुबान का इस्तेमाल एक आंदोलन को खड़ा करने के लिए किया, जिसका राजनीतिक प्रभाव तमिलनाडु में आज तक दिखाई देता है। उन्होंने विधवा विवाह और अंतर्जातीय विवाह का समर्थन किया, दहेज और देवदासी प्रथाओं का विरोध किया और अंधभक्ति का खंडन किया। यह आश्चर्यजनक नहीं है कि मनुवादी सोच के लोग इन महापुरुषों से इतनी घृणा करते हैं कि उनकी मूर्तियां ही तोड़ दे रहे हैं!
-लेखिका माकपा पोलित ब्यूरो की सदस्य हैं।