आज जिसे देखो, वह दूसरे को कोसने में लगा रहता है। हमारे रिश्तेदार ठीक नहीं हैं, हमारे पड़ोसी ठीक नहीं हैं, और तो और, हमारी सरकार तो हमेशा गलत होती है। मैं दूसरों को कोसने के चक्कर में कभी पड़ता ही नहीं। इस दृष्टि का ही असर है कि खूंखार लोग मुझे कोमल दिखाई देते हैं, बदसूरत आदमी को मैं खूबसूरत मानता हूं। कीचड़ में मुझे कमल (भाजपा वाला नहीं) खिला हुआ दिखाई देने लगा है।
एक दिन में बीस-बीस घंटे के पावर कट पर भी मैं सरकार को नहीं कोसता। सोचता हूं, पावर कट न होने से हर समय बुद्धू बक्से से चिपका हुआ मैं बुद्धू बनता रहता। मुझे उसके काल्पनिक धारावाहिकों की बुरी आदत लग जाती, जो छूटती ही नहीं। अब मजबूरन पावर कट के कारण ही सही, मैं शाम को पार्क में टहलता हूं, प्राण वायु ऑक्सीजन प्राप्त करता हूं, पड़ोसियों के दुख-सुख में शरीक होता हूं और सरकार को धन्यवाद देता हूं कि वह जन स्वास्थ्य की कितनी चिंता करती है।
आजकल महंगाई पर रोना फैशन हो गया है। ऐसे रोनेवाले अकसर अपने स्वर्णिम अतीत को लेते हैं कि बीस-तीस साल पहले का जमाना कितना सस्ता, कितना अच्छा था। लेकिन ऐसे लोग कभी सोचते नहीं कि सस्ते के जमाने में गरीबी भी उतनी ही थी। आज की तरह तब न तो उतने पैसे थे, न खरीदने के लिए इतने विकल्प। जब रुपये में एक मन गेहूं मिलता था, तब दस रुपये कितने लोगों की जेब में पड़े होते थे? रोने के बजाय सोच बदलना ज्यादा जरूरी है।
इसलिए आज की महंगाई मुझे खुशहाली और तरक्की की निशानी लगती है। कुछ लोग महंगाई को डायन बताते हैं, लेकिन मुझे तो यह कैटरीना कैफ-सी दिखाई देती है। जब गैस सिलेंडर में कटौती की घोषणा हुई थी, तभी पत्नी ने बिटिया और बहू से कह दिया था कि हम अब बीच-बीच में तीर्थयात्रा पर जाएंगे और खाना बनाने में गैस का न्यूनतम उपयोग करेंगे।
इस नियम से अतिथि नियोजन तो होगा ही, साथ ही, हम अधपकी सब्जियां खाएंगे, जो अधिक पौष्टिक और विटामिन युक्त होंगी। सुबह-शाम कुल दो चाय पिएंगे, जो स्वास्थ्य के लिए हितकर होगा। पानी गरम नहीं करेंगे, तो नहाएंगे भी कम, जिससे साबुन का खर्च स्वतः कम हो जाएगा। इस तरह हम साधु-संतों की कोटि में आ जाएंगे, जो ऐसा ही संयमित जीवन बिताते हैं। यदि आप सुखी होना चाहते हैं, तो हमारा अनुसरण करें। शिकायत करने या रोने-धोने से कुछ नहीं होता।