इस घटना को संज्ञानात्मक पूर्वाग्रह कहा जाता है। इसका प्रशिक्षण भी दिया जा सकता है। इसमें सबसे पहले पशु को सिखाया जाता है कि कुछ संकेत प्रकट होने पर क्या होगा। मसलन, अगर हम कमरे के बाएं कोने में एक कटोरा रखते हैं, तो इसका मतलब है कि उन्हें एक बड़ा इनाम मिलेगा। जब कटोरा दाएं कोने में होता है, तो इसका मतलब है कि उसे कोई इनाम नहीं मिलेगा, या कुछ बुरा होगा। तार्किक रूप से, जानवर सकारात्मक संकेत की ओर तेजी से भागेगा और नकारात्मक संकेत की ओर बहुत धीमे। कटोरे को कमरे के बीच में रखने पर अगर कोई जानवर कटोरे की ओर तेजी से दौड़ता है, तो उसे ज्यादा 'आशावादी' माना जाता है, क्योंकि उसे अज्ञात घटना से कुछ सकारात्मक होने की उम्मीद होती है।
हालांकि, इन परीक्षणों को पहले कभी डॉल्फिन पर नहीं आजमाया गया था। मैंने यह पता लगाने के लिए एक अध्ययन किया कि क्या डॉल्फिनों में भी संज्ञानात्मक पूर्वाग्रह होते हैं। हमने आठ डॉल्फिनों को लक्ष्य को छूकर वापस लौटना सिखाया। डॉल्फिनों ने सीखा कि अगर लक्ष्य को पूल के एक तरफ रखा जाए, तो उन्हें उनकी पसंदीदा मछली मिलेगी। अगर लक्ष्य पूल की दूसरी तरफ होगा, तो उन्हें सिर्फ प्रोत्साहन ही मिलेगा।
परिणामों से पता चला कि वास्तव में, डॉल्फिनों में आशावाद और निराशावाद के स्तर अलग-अलग थे। लेकिन सबसे दिलचस्प जानकारी यह मिली कि डॉल्फिन हर परिस्थिति में सामाजिक व्यवहार में संलग्न होती हैं। हमने देखा कि जो डॉल्फिनें बार-बार एक साथ तैरती थीं, वे सबसे अधिक आशावादी निर्णय भी लेती थीं। चार महीनों तक रोजाना अध्ययन के बाद हमने पाया कि आशावाद के स्तर भावनात्मक स्थितियों से जुड़े हैं। भावनात्मक स्थितियां संभवतः समूह के भीतर होने वाले सकारात्मक सामाजिक व्यवहार से प्रेरित होती हैं। इस अध्ययन के अनुसार, तालमेल पूर्ण तैराकी के स्तर का उपयोग भावनात्मक स्थिति के संकेतक के रूप में किया जा सकता है, और इस प्रकार यह जानवरों की सामाजिक गतिशीलता की निगरानी और सुधार करने में मदद कर सकता है।