हमारी सेना की ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ के फौरन बाद विपक्ष का पूरा समर्थन सरकार को मिला। फिर जब ऐसा लगने लगा कि मोदी सरकार को जनता का कुछ ज्यादा ही समर्थन मिलने लगा है, तो अजीब-अजीब सवाल उठने लगे। कांग्रेस के कुछ नेताओं ने हमारे सैनिकों के नियंत्रण रेखा के उस पार जाने के सबूत मांगकर शुरुआत की। फिर यही मांग दिल्ली के मुख्यमंत्री ने इसलिए की, क्योंकि उन्हें यकीन है कि भावी प्रधानमंत्री वही हैं, सो राष्ट्र की सुरक्षा और विदेश नीति पर उन्हें हमेशा अपनी राय व्यक्त करनी चाहिए।
कांग्रेस के युवराज ने इन शब्दों में अपनी बात रखी, पिछले दो वर्षों में पहली बार मोदी ने प्रधानमंत्री बनकर दिखाया है। लेकिन इसके बाद कांग्रेस की तरफ से कई अन्य आवाजें उठने लगीं। मैं खुद यह समझ नहीं पा रही कि कांग्रेस आखिर कहना क्या चाहती है। कांग्रेस के कई बड़े नेताओं ने सैन्य कार्रवाई की प्रशंसा करने के साथ यह भी कहा कि उनके दौर में सेना ऐसा हमला पहले भी कर चुकी है। फर्क सिर्फ यह है कि कांग्रेस ने चुपके से काम किया। यह कहते हुए कांग्रेसी नेताओं ने शायद समझा नहीं कि नियंत्रण रेखा के उस पार चुपके से और खुलकर हमला करने में कितना फर्क है। जब हमारी सेना घोषित करती है कि उन्होंने पाक अधिकृत कश्मीर में आतंकियों के अड्डों पर हमला किया है, तो पाक जनरलों के बीच यह संदेश जाता है कि भारत उनकी परमाणु धमकियों से नहीं डरता।
इस संदेश के असर का सबूत यह है कि पाकिस्तान हमारी ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ के बाद ऐसी हरकत में आया है, जैसे भारत ने युद्ध घोषित कर दिया हो। इसमें उसकी उतनी ही बौखलाहट दिख रही है, जितनी हमारे विपक्षी दलों में दिख रही है। एक ओर पाकिस्तान के राजनेता और सैनिक प्रवक्ता कह रहे हैं कि सिवाय थोड़ी-सी फायरिंग के कुछ नहीं हुआ है, दूसरी ओर सीमा पर युद्ध स्तर पर सैन्य तैयारी है। सीमांत गांवों को खाली कराया गया है। अगर हमारी सेना की तरफ से कुछ नहीं हुआ, तो यह सब क्यों हो रहा है? फिर विदेशी पत्रकारों को एलओसीा तक ले जाने की क्या जरूरत थी?
हमारे विपक्षी दलों की समस्या यह है कि वे भी उसी तरह बोल रहे हैं, जैसे दुश्मन बोल रहा है। सर्जिकल स्ट्राइक होने के बाद भी सरकार से सबूत मांगा जा रहा है, जबकि भारत ने हर आतंकी हमले के बाद पाकिस्तान को सबूत दिए हैं, जिन्हें उसने सिर्फ कूड़ेदान में फेंका है। इस्लामाबाद ने अगर सबूतों का सम्मान किया होता, तो उन लोगों को वह जेल में बंद कर चुका होता, जो वैश्विक स्तर पर आतंकवादी घोषित किए गए हैं। परवेज मुशर्रफ ने पिछले दिनों स्वीकारा कि जिन्हें आज दुनिया आतंकवादी कहती है, वही कल तक पाकिस्तान में सबसे बड़े हीरो माने जाते थे। इस्लामाबाद ने इन जेहादी संस्थाओं का ईजाद कश्मीर को आजाद करने के लिए किया था, लेकिन इनमें से कई ऐसी तनजीमें हैं, जो पाकिस्तान को ही नुकसान पहुंचाने में लग गई हैं, लिहाजा इन्हें काबू में लाने की जरूरत है।
काश, हमारे विपक्षी दल यह स्वीकार कर पाते कि पाकिस्तान हमारे देश के खिलाफ युद्ध कर रहा है। काश, वे समझते कि जब तक भारत अपनी शक्ति नहीं दिखाएगा, तब तक भारत को कमजोर माना जाएगा। माना कि हमारे लोकतंत्र में विपक्षी दलों को सरकार पर सवाल उठाने की पूरी आजादी है,पर वे सैन्य कार्रवाई पर तो शक न करें।