दिल्ली में एक परिवार के लिए सरकार छह सौ रुपये देने लगी है। इसे कम बताने वाले सरकार के ‘ड्रीम प्रोजेक्ट’ को पलीता लगा रहे हैं। कह रहे हैं, यह गरीबों के पेट पर सरकार का घूंसा है। कमाल है! अगर सब्सिडी घूंसा है, तो सरकार यह घूंसा बार-बार मारना पसंद करेगी। गरीबों को छह सौ रुपये देने का ड्रीम तो आया ही नहीं, फिर भी दे दिए हमने, यह क्या कम है। सरकार के ड्रीम छोटे-छोटे होते हैं, उनमें सौ-दो सौ देने का प्रावधन तो आता है, मगर छह सौ रुपये देने का सपना नहीं आता।
सरकार कहती है, और शायद सच ही कहती है कि हमारा देश विविधताओं वाला देश है। अमीरी-गरीबी साथ-साथ बनी रहें, तो समरसता झलकती है, वरना सरकार को करने के लिए कुछ बाकी ही नहीं रहेगा। मनरेगा क्या है, महज बासी रोटियों का खेल ही तो है। रोटियों के इस खेल में कौन किसको चूना लगा रहा है, इसे जानने की जरूरत सरकार महसूस नहीं करती। हमारे देश में एक कहावत बहुप्रचलित है- बासी रोटी में खुदा का क्या साझा। मगर इस देश के कारिंदों ने इस कहावत का कचूमर निकालकर साबित कर दिया कि बासी रोटी में भले ही खुदा का साझा न हो, सियासत का साझा जरूर होता है।
साहित्य से लेकर सियासत तक लॉबिंग हो रही है। जाहिर है कि यह लॉबिंग बासी रोटी में भी हो रही है। सियासत और साहित्य आम आदमी की रोटी के लिए काम कर रहे हैं, मगर डीलिंग के जरिये अपना पेट भी भर रहे हैं। ‘वालमार्ट’ को लेकर आप जितने स्मार्ट हैं, उससे ज्यादा स्मार्ट ‘वालमार्ट’ खुद है। अमेरिका में लॉबिंग को कानूनी मान्यता है, मगर हमारे देश में सब कुछ परदे के पीछे होता है। यहां संसद में हर रोज किसी न किसी घोटाले में जांच बिठाने की मांग होती है। स्मार्ट लॉबिंग स्मार्ट नेता ही कर सकता है। और जो नेता स्मार्ट नहीं है, वह घोटालों की जांच के अलावा जल-जंगल-जमीन के मुद्दे उठाकर सदन में हास्यरस का कवि हो जाता है।
आजकल बासी रोटी भी बिना लॉबिंग किए नहीं मिलती। हमारे देश की संपूर्ण व्यवस्था कानून से ज्यादा लॉबिंग पर टिकी है। कैश सब्सिडी हो या मनरेगा, वोट पाने के लिए लॉबिंग ही तो है। सीबीआई के जरिये भी लॉबिंग हो सकती है। भारतीय सियासत की बारहखड़ी लॉबिंग से शुरू होती है, अतः ‘वालमार्ट’ प्रकरण को भूलकर बासी रोटी को कमीशनखोरों से बचाने का प्रयास करना ज्यादा जरूरी है।