अरुणाचल प्रदेश का उन्नीस वर्षीय किशोर नीडो तानियन किसी भी खुशनुमा, उत्साही तथा चंचल छात्र की तरह बहुत ही प्यारा और दुलारा बेटा था। उसके रंगे हुए लाल बाल, आंखों में जिंदगी के मस्त सपने और इटानगर में रह रहे माता-पिता के साथ लगभग रोज बातचीत उसके पांवों में गति और उमंग भरती थी। उसने सिर्फ दुकानदार से पता पूछा था, लेकिन उन्होंने उसका मजाक उड़ाया। इसकी उम्मीद नहीं थी। उसे गुस्सा आना ही था। जैसे प्यारा नटखट बच्चा गुस्सा करता है, वैसे ही नीडो तानियन ने किया-नतीजतन दुकान का एक कांच टूट गया। दुकानदार वहशी बन गए और उसे पीटने लगे। जो दुकानदार जानवरों की तरह उसे पीट रहे थे, क्या उन्हें मनुष्य कहा जा सकता है? कुछ लोग उसे पीट रहे थे और बहुतेरे लोग तमाशा देख रहे थे। दिल्ली में पूर्वोत्तर के युवाओं के साथ इस तरह का सुलूक अब आम हो चला है। पुलिस की भूमिका इस मामले में बहुत ही निंदनीय थी। वे नीडो तानियन की मदद करने, उसे अस्पताल ले जाने और दुकानदारों को डांटने के बजाय उलटे नीडो से ही सात हजार रुपये ले बैठे, जो उन्होंने दुकानदार को हर्जाने के रूप में दिलवाए और उससे यह भी लिखवा लिया कि उसे डॉक्टरी सहायता नहीं चाहिए।
लोगों को खाकी वर्दी वाले से इसीलिए चिढ़ होती है। उन्हें एक लाचार युवा की मदद करनी चाहिए थी। नीडो उनका भी बेटा हो सकता था। लेकिन उन्होंने कुछ नहीं किया। एक तो इस तरह की संवेदनहीनता उनकी आदत बन गई है। तिस पर पूर्वोत्तर के लोगों के प्रति उनकी मानसिकता भी आम लोगों की तरह ही है। जिस दिन नीडो की दिल्ली में दर्दनाक मृत्यु हुई, उस दिन अरुणाचल प्रदेश छात्र संघ के युवा नेताओं से मुलाकात के दौरान दिल्ली के पुलिस कमिश्नर भीमसेन बस्सी ने कार्रवाई का आश्वासन दिया और कहा कि वह खुद भी अरुणाचल प्रदेश में पुलिस अधिकारी रह चुके हैं।
नीडो की हत्या पर पूर्वोत्तर के साथ-साथ दिल्ली में भी विरोध प्रदर्शन हुए। राहुल गांधी जंतर-मंतर पर पूर्वोत्तर के छात्रों से मिले। उन्होंने गृह मंत्री से कहा, तो अगले दिन दो लोग पकड़े गए। पर क्षुब्ध छात्रों का कहना है कि असली गुनाहगार अब भी खुले घूम रहे हैं। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट या बाकी सब बातें अभी तक टालने वाली प्रतीत हो रही हैं। ऐसे में, पूर्वोत्तर में छात्रों का गुस्सा बढ़ता जा रहा है। इसका नतीजा क्या निकलेगा?
अरुणाचल प्रदेश पूर्वोत्तर के सभी राज्यों में अपनी देशभक्ति और हिंदी प्रेम के साथ-साथ विनम्रता के लिए भी जाना जाता है। अगर इस प्रदेश के बच्चों को भी गुस्सा आ जाए, तो नतीजे इतने भयानक हो सकते हैं, जिसकी दिल्ली में बैठे लोग कल्पना नहीं कर सकते। पूर्वोत्तर के बच्चे बहुत मेधावी, बुद्धिमान, अच्छे खिलाड़ी और भावुक हृदय के होते हैं। जबकि सच यह है कि शेष भारत में उन्हें ठीक से समझा नहीं जाता। हममें से कितने लोग अरुणाचल या नगालैंड के पांच नाम गिना सकते हैं? या पूर्वोत्तर के राज्यों से कारगिल में शहीद हुए महावीर चक्र विजेता किसी एक वीर सैनिक का नाम याद रख सकते हैं? परमवीर चक्र बाना सिंह, सोमनाथ शर्मा, अब्दुल हमीद या कैप्टन हनीफुद्दीन के नाम जितनी आसानी से हमारी जुबान पर चढ़े होते हैं, क्या उतनी सहजता से हम कारगिल में शहीद हुए नगालैंड के जांबाज कैप्टन नीकेझाकुओ केनगुरूज का नाम लेते हैं? क्या हम गाईदिन्ल्यू के बारे में जानते हैं, जिन्हें पंडित नेहरू ने रानी का खिताब और श्रीमती इंदिरा गांधी ने पद्मभूषण तथा स्वतंत्रता सेनानी का ताम्रपत्र दिया था? रुक्मिणी का अरुणाचल प्रदेश से क्या संबंध है? भीष्मक नगर और परशुराम कुंड का क्या इतिहास है?
बहुत से लोग तो यह भी नहीं जानते होंगे कि पूर्वोत्तर में कितने राज्य हैं। वहां के लोकप्रिय पर्यटन स्थलों की जानकारी भी देश के कम ही लोगों को होगी। वहां के चेहरे-मोहरे तथा पोशाक को लेकर भी या तो उपेक्षापूर्ण अज्ञान रहता है या संवेदनहीन मजाक की दृष्टि अपनाई जाती है। पूर्वोत्तर के युवा यहां शिक्षा और रोजगार की संभावनाओं के कारण आते हैं। लेकिन कदम-कदम पर उनकी खिल्ली उड़ाई जाती है। उनके नाक-नक्श, वेश-भूषा, भाषा और खान-पान पर छींटाकशी की जाती है। उन्हें इस तरह देखा जाता है, मानो वे दूसरे ग्रह से आए हुए प्राणी हों।
सच तो यही है कि दिल्ली के शासकों ने पूर्वोत्तर के लिए धन भले ही दिया हो, पर मन नहीं दिया। विकास के नाम पर पूर्वोत्तर को दिए जाने वाले धन का भी एक बड़ा हिस्सा भ्रष्टाचार और भारत-विरोधी उग्रवादी संगठनों के हिस्से में चला जाता है। वहां छोटे-बड़े अड़तीस उग्रवादी संगठन हैं, जो भारतीय राष्ट्र-राज्य के खिलाफ युद्ध ठाने हुए हैं। डिब्रूगढ़ के आगे कहीं रेल नहीं है, तो गुवाहाटी तक लड़खड़ाती विमान सेवा के अलावा पूर्वोत्तर के किसी राज्य की राजधानी के लिए दिल्ली सहित किसी महानगर से सीधे विमान सेवा नहीं है। खेल में श्रेष्ठ होते हुए भी ओलंपिक स्तर के स्टेडियम, तरणताल या क्रीड़ा प्रांगण पूर्वोत्तर में कहीं नहीं हैं। औसत जीवन दर और बाल मृत्यु दर में पूर्वोत्तर के राज्य आज भी राष्ट्रीय औसत से पीछे हैं।
हर माता-पिता अपने बच्चों को अच्छी जगह पढ़ाना चाहता है। अपने घर जैसा सुरक्षित स्थान अपने बच्चों के लिए ढूंढता है। नीडो तानियन के माता-पिता को अच्छी पढ़ाई के लिए उसे जालंधर क्यों भेजना पड़ा और दिल्ली अपने देश के होनहार किशोर के लिए सुरक्षित साबित क्यों नहीं हुई, इन सवालों के जवाब में ही राष्ट्रीय एकता पर हो रही चोट का समाधान छिपा है।
(लेखक भाजपा के राज्यसभा सदस्य हैं)