तीन साल पहले जब केविन रड को प्रधानमंत्री पद से हटाकर जूलिया गिलार्ड ऑस्ट्रेलिया की मुखिया बनीं, तो राजनीतिक विश्लेषकों की राय थी कि गिलार्ड जैसी महिला का मजबूती से उभरना रड युग की समाप्ति है। लेकिन उस 'तख्तापलट' के बाद जिस तरह रड ने फिर से वापसी की है, वह उनकी शख्सियत को ही प्रतिबिंबित कर रहा है। कभी उन पर निष्क्रिय होने का आरोप लगाने वाले पार्टी कार्यकर्ता आज उनके साथ खड़े हैं और उम्मीद जता रहे हैं कि उनके नेतृत्व में पार्टी आगामी सितंबर में होने वाले चुनाव में बेहतर प्रदर्शन करेगी।
आखिर ऐसा क्या है कि खुद को 'दृढ़ संकल्पी खोटा सिक्का' बताने वाले रड एक बार फिर लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचे हैं। इसका जवाब उन्होंने खुद एक इंटरव्यू में दिया है। वह कहते हैं, हर प्रतिकूल परिस्थितियों से सबक सीखना उनका स्वभाव रहा है। इसमें रड के बचपन के गरीबी के दिनों के संघर्ष को महसूस किया जा सकता है।
आम बच्चे की तरह रड भी बचपन में जब अपने खेतों में घोड़े को दौड़ते अथवा पिता को शिकारी बंदूक का इस्तेमाल करते देखते थे, तो बेहतर घुड़सवार बनने का सपना पालते थे। लेकिन ग्यारह की उम्र में जब पिता का साया उठ गया, तो वह सपना भी कहीं गुम हो गया। हालात इतने प्रतिकूल हो गए कि सिर छिपाने के लिए रात कार में गुजारनी पड़ती थी। बाद में मां ने नर्स की नौकरी शुरू की।
स्कूल की पढ़ाई के बाद रड ने पब में बीयर परोसने से लेकर अस्पताल में वार्ड बॉय तक का काम किया। लेकिन नौकरी का उनका सबसे बुरा अनुभव शौचालय साफ करने का था, जो उन्होंने एक बार लकड़ी चीरने की मिल में काम करने के दौरान किया था। उसी दौरान उनका जुड़ाव 'सामाजिक न्याय की पार्टी' यानी लेबर पार्टी से हुआ।
क्वींसलैंड लोक सेवा को पुनर्व्यवस्थित करने की वजह से राजनीतिक हलकों में डॉ डेथ के नाम से मशहूर रड की शख्सियत का दूसरा पहलू चीनी सभ्यता-संस्कृति से उनका प्यार है, जो महज दस वर्ष की उम्र से ही परवान चढ़ने लगा था। राजनीतिक लोकप्रियता की यह भी एक बड़ी वजह रही। हालांकि कुछ 'गलत' फैसलों ने उन्हें पार्टी कार्यकर्ताओं का ही विरोधी बना दिया था, लेकिन एक बार फिर जब वह प्रधानमंत्री बने हैं, तो भरोसा यही है कि उनकी लोकप्रियता वैसे ही परवान चढ़ेगी, जैसे 2010 में प्रधानमंत्री बनने के दौरान थी, जिसे राजनीतिक विश्लेषक 'रड युग की शुरुआत' बताया करते थे।